BLOG

यूसुफ खान मतलब दिलीप कुमार

दिलीप कुमार पाकिस्तान में भी बहुत लोकप्रिय हैं, पाकिस्तान के दर्शक भी उन्हें अपना कलाकार मानते हैं। पाकिस्तान की धरती और वहां के लोगों के प्रति दिलीप कुमार ने हमेशा प्रेम दर्शाया है। वे कभी भूल नहीं...

मैं राधा बन जाऊं और तुम कृष्ण

उदय शंकर, महान भारतीय नर्तक कहा जाता है, बिना डूबे मोती हासिल नहीं होता। वह युवा भी अपने हिस्से के मोती की खोज में लगा था। कला दुनिया में ही रहता था, लंदन में रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट में शिक्षा ले रहा था।...

एक नाच हुआ करता था

मेरी 13 साल पुरानी रिपोर्ट मैं लौंडे की बात करने वाला हूँ , माफ कीजिएगा, मैं कोई अश्लील टिप्पणी नहीं करूंगा। जो लोग बिहार की नाट्य शैली नाच को जानते हैं, उनके लिए लौंडा वह है, जो स्त्री पोशाक पहनकर...

अच्छे समाज को ही अच्छा सिनेमा देखने का अधिकार

(आदिपुरुष के बहाने दक्षिण और भक्ति) भारत में सनातन की भौतिक बुनियाद भले उत्तर में मजबूत हो, पर धर्म का संचालन दक्षिण से ही होता आया है। आदि शंकराचार्य केरल से आए थे, रामानुजाचार्य तमिलनाडु से और...

एक मनोज वाजपेयी काफी हैं

फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ आम लोगों के खास संघर्ष की बेमिसाल कहानी है। अब तक जो बायोपिक फिल्में बनी हैं, उनमें यह एक बेहतरीन पेशकश है। गाजे-बाजे, तामझाम, बनावटीपन से दूर रहते हुए भी यह फिल्म...

हृदय वही, जो कोमल है

दिलीप कुमार उपाध्याय (मेरे बड़े भैया की कलम से) दशरथनंदन श्रीराम के प्रति आदर्श भक्ति के बारे में यों तो श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास के साथ-साथ अन्य पूर्ववर्ती और परावर्ती भगवत भक्तों और महामुनियों तथा...

क्रोध का इतिहास : शिव, परशुराम और एंग्री यंगमैन

(अपनी पुस्तक ‘ सिनेमा हिन्दुस्तानी’ के अमिताभ बच्चन पर केंद्रित अध्याय ‘हम जहां खड़े हो जाते हैं’ से) अभिनय की दुनिया में अमिताभ बच्चन को उनके गुस्से के लिए ही ज्यादा जाना जाता है। गुस्सा अर्थात क्रोध...

जोधपुर जफर बिना… जंचै ई कोनी

जफर खान सिंधी को श्रद्धा अर्पित आजकल कुछ ऐसे लोग गए हैं, जो मेरे अंदर से भी कुछ ऐसा ले गए हैं कि शब्द कम पड़ने लगे हैं। लिखने के लिए कलम की नीब को ठोस होना पड़ता है, पर जब नीब ही पिघलने लगे, तो क्या...

यह गुलमोहर शर्मिला नहीं है

भाग – एक गुलमोहर फिल्म कुछ दिन पहले ही देख लिया था। चकित था, बहुत दिनों बाद एक ऐसी आधुनिक, पारिवारिक और मनोरंजक फिल्म आई है। फिर एक दिन सुबह प्रिय माननीय वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण जी का एक...

अच्छा कैसे लिखा जाए – 7

लेखन व लेखकों से जुड़ी नकारात्मक प्रवृत्तियां अखबारों में लिखने वालों से जुड़ी अनेक तरह की नकारात्मक प्रवृत्तियां यदा-कदा नजर आ जाती हैं, जिससे पत्रकारिता के संपूर्ण न हो पाने का अहसास गाढ़ा हो जाता...

एक प्यारे साथी को पाने की जंग

सिलवेस्टर स्टेलौन, विश्व प्रसिद्ध अभिनेता, फिल्मकार बेशक, जिंदगी इम्तहान लेती है। नौबत ही ऐसी आ गई थी कि जिंदगी एक दड़बे में बसर करनी पड़ रही थी। कभी भोजन तलाशते-तलाशते रात हो जाती, तो कभी पेट समेटे इस...

अच्छा कैसे लिखा जाए – 6

भारत की दरिद्रता भारत में समाचार संस्थान लिखने वालों को उतना पारिश्रमिक नहीं दे पाते हैं, जिनसे लेखक का काम चल जाए। ज्यादातर हिन्दी व भाषायी अखबारों में मानदेय इतना कम है कि अच्छे लेखकों के मान-सम्मान...

हिम्मत है तो चल मार के दिखा

सैम मानेकशॉ, भारत के पहले फील्ड मार्शल वह नाराज सैनिक जोर से चीखा था, ‘कंपनी कमांडर को मार डालूंगा।’ यह बात उस सैन्य कंपनी के शिविर में आग की तरह फैल गई थी। मात्र पदोन्नत न होने पर इतनी अनुशासनहीनता?...

अच्छा कैसे लिखा जाए – 5

समाचार, टिप्पणी, लेख और फीचर समाचार टिप्पणी, लेख और फीचर अलग-अलग लेखन सामग्री है। इन्हीं चारों की सर्वाधिक जरूरत समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में पड़ती है। इन तीनों को लिखने का अभ्यास शुरू में ही कर लेना...

‘अर्जेंटीना, 1985’ फिल्म और भारत में आपातकाल

‘अर्जेंटीना, 1985’ हमारे दौर की एक बेहतरीन फिल्म है। इसी फिल्म को सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म का गोल्डन ग्लोब अवार्ड मिला है। यह वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्म है। अर्जेंटीना देश में अंतिम नागरिक-सैन्य...

अच्छा कैसे लिखा जाए?-4

अपूर्वता नयापन बहुत जरूरी है। अगर एक ही विषय पर एक ही तरह की बात बार-बार लिखी जाए, तो यह अच्छे लेखक की निशानी नहीं है। ध्यान रहे, जो लिखा जा रहा है, वह नया होना चाहिए। वह लेखक जिसके पास लिखने के लिए...

अभिनय के आधुनिक गुरु – स्टैनिस्लावस्की

उस बच्चे को बहुत पुचकारकर तैयार किया गया था। न केवल मंच पर पहली बार उतारा गया था, बल्कि एक जगह बैठा भी दिया गया था कि उछल-कूद की जरूरत न पड़े। अभिनय के लिए बहुत गुंजाइश नहीं थी। मंच को रुई से ढक दिया...

अच्छा कैसे लिखा जाए?-3

अभ्यास  हर लिखने वाले को अभ्यास जरूर करना चाहिए। अभ्यास से ही लेखनी में धार पैदा होती है। जैसे तैरने के अभ्यास के बिना आदमी नदी में डूब सकता है, ठीक वैसे ही अभ्यास के अभाव में लेखक लिखते हुए पिट सकता...

मनोज तिवारी बनाम रवि किशन

भोजपुरी फिल्म उद्योग में बहुत गड़बड़ झाला है। यह उद्योग करीब 2,000 करोड़ रुपये का माना जाता है। वैसे यह मंजिल भोजपुरी फिल्मों को साल 2017 में ही मिल गई थी, लेकिन तब से कमाई लगभग ठहर गई है। फिल्में खूब बन...

बजाज और बिड़ला ने मिलकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को कैसे बचाया?

प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की जन्मस्थली जीरादेई, बिहार में स्थित उनका पुश्तैनी मकान आज अगर शान से खड़ा है, तो इसमें बजाज और बिड़ला जैसे उदार राष्ट्र प्रेमी सेठों का बड़ा हाथ है। विशेष...