अच्छा कैसे लिखा जाए?-4

अपूर्वता
नयापन बहुत जरूरी है। अगर एक ही विषय पर एक ही तरह की बात बार-बार लिखी जाए, तो यह अच्छे लेखक की निशानी नहीं है। ध्यान रहे, जो लिखा जा रहा है, वह नया होना चाहिए। वह लेखक जिसके पास लिखने के लिए कुछ नया नहीं है, वह अच्छा नहीं लिख सकता। अच्छा लेखक तो तभी कलम उठाएगा या की-बोर्ड पर तभी उंगलियां थिरकाएगा, जब उसके पास कहने के लिए कोई नई बात या बातें होंगी। किसी दूसरे लेखक की पहले लिखी हुई बात को फिर लिखने के लिए कोई भी अच्छा लेखक कलम नहीं उठा सकता। यह नहीं कि कुछ स्थापित लेखक किसी एक विषय पर लिख रहे हैं, तो हर लेखक उसी विषय पर लिखना शुरू कर दे। अव्वल तो विषय या मुद्दे की विविधिता को बरकरार रखने की कोशिश करनी चाहिए और एक ही विषय पर बार-बार लिखने की जरूरत आए, तो जब भी लिखा जाए, कुछ नया लिखा जाए, इसका ध्यान एक अच्छे लेखक को अवश्य रखना चाहिए।
कई लेखक ऐसे हैं, जो एक ही लेख एक ही बात को एक से ज्यादा बार दोहराते हैं। यह ठीक नहीं है, ऐसा लेखन खराब ही कहलाएगा। केवल जानकारियों या विचारों का हेरफेर कर देने से अच्छा लेख तैयार नहीं होता है। पहले लिखे हुए किसी समाचार या लेख या फीचर में केवल शब्दों को बदल देने से भी अच्छी लेखन सामग्री तैयारी नहीं हो सकती। समाचारों या विचारों में अपूर्वता से अंततः समाचार पत्र या पत्रिका को अपूर्वता हासिल होती है। मौलिकता बनती है और मौलिकता को पाठक सदैव पसंद करता है।
फलम्
बिना लक्ष्य के कुछ नहीं लिखना चाहिए। जैसे कोई अच्छा धनुर्धर बिना लक्ष्य के तीर नहीं चलाता, ठीक उसी तरह एक अच्छा लेखक बिना किसी उद्देश्य के नहीं लिखता। वह जब भी लिखता है, दूसरों को या खुद को लाभ पहुंचाने के लिए लिखता है। ऐसा लेख, जिससे किसी को कोई मानसिक, शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक या किसी और तरह का कोई लाभ न हो, तो उस लेख के होने का कोई मतलब नहीं है। कई बार अच्छा लेख या फीचर मन को सुकून देता है, यह भी काफी है। जरूरी नहीं कि किसी लेख को पढ़कर पाठक को कोई ठोस लाभ हो, अगर वह लेख को पढ़कर कुछ देर के लिए विचार भी करता है, तो भी लेख सफल माना जाएगा।
ऐसे बुरे लेख बड़ी संख्या में लिखे जाते हैं, जिनमें यह पता नहीं चलता कि लेखक चाहता क्या है। यह पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि वह संबोधित किसको कर रहा है। अगर किसी लेख का लक्ष्य तय होगा, तो जाहिर है, उसका लाभ पाठक को जरूर मिलेगा। यही नहीं, अच्छा लेख स्वयं लेखक के लिए भी फलदायी होता है, जबकि बुरे लेख स्वयं लेखक को कोई लाभ नहीं पहुंचा पाते हैं, न तो लिखने का संतोष मिलता है, न किसी से सच्ची प्रशंसा मिलती है और न लेख छपने के बाद कोई मानदेय प्राप्त होता है। अतः टारगेट ग्रुप या लक्षित समूह तय होना चाहिए, तभी फल की गुंजाइश बनती है। पत्रकारिता हवा में तीर चलाने का काम नहीं है, इसका उद्देश्य जितनी अच्छी तरह से निर्धारित होगा, उतना ही अच्छा है।

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