(संविधान विशेष : गणतंत्र दिवस विशेष)
सच्चिदानंद सिन्हा
संविधान निर्माता
यह भी गजब प्रदेश है, जिसकी पीठ में रीढ़ की तरह मैया गंगा गुजरती हैं। वह जैसे ही बिहार की माटी का स्पर्श करती हैं, कर्मनाशा और घाघरा आ मिलती हैं। उत्तर में हिमालय की ओर से आ रही गंडक , उसके बाद बागमती, बूढ़ी गंडक, कमला, कोशी क्रमश: गंगामय होती जाती हैं। और आगे देखें, तो महानंदा भी गंगा से मिलने दौड़ी चली जाती है। गंगा उत्तर की ओर से आती नदियों से सौभाग्यशाली हैं, तो दक्षिण से आती नदियों ने भी उनके दरबार को खूब संवार रखा है। दक्षिण से सोन, फिर पुनपुन और फल्गु जोड़ी बनाकर गंगा से आ मिलती हैं। बिहार की भूमि पर नदियां मानो जेवर-शृंगार की तरह हैं, लेकिन यहीं एक समय था, जब बिहार को लगभग मिटा दिया गया था।
उसी दौर में आरा-बक्सर में जन्मे एक युवा विलायत से वकालत की पढ़ाई करके लौट रहे थे। उम्र 23 रही होगी, विलायत में गांधीजी भी उनकी कक्षा में थे। एक से बढ़कर एक विद्वान छात्रों के सान्निध्य का विशेष गौरव साथ चल रहा था और बिहार के प्रति लगाव भी चरम पर था। विदेश गया आदमी वैसे भी अपनी माटी के दुलार में कुछ ज्यादा ही भाव-विभोर हो जाता है। वह भी अपनी माटी के स्पर्श के लिए हृदय से तरल हुए जा रहे थे। ऐसे में, लौटते हुए जहाज में ही एक पंजाबी से मुलाकात हुई। पढ़ाई-लिखाई की चर्चा हुई। देश एक ही था, तो चर्चा बढ़ी। उस पंजाबी ने पूछ लिया, आप किस सूबे के रहने वाले हैं? पूरे गर्व से लैस जवाब मिला, ह्यमैं पावन धरती बिहार से हू।ह्ण पंजाबी सहयात्री की आंखें फैल गईं, ह्ययह कौन-सा सूबा है? जहां तक मेरी सूचना है, बिहार नाम का तो कोई सूबा नहीं है।
बिहार के उस युवा को आघात सा लगा। अपना ही देशवासी यह नहीं जानता कि इस देश में एक बिहार भी रहता है। वही बिहार, जहां दुनिया में पहली बार गणतांत्रिक शासन शुरू हुआ था। वही बिहार, जहां कभी राष्ट्र की राजधानी थी; जहां चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक महान हुए; जहां सनातन धर्म के अधिकतर शास्त्र रचे गए, जहां जैन और बौद्ध धर्म-धारा अवतरित हुई। बिहार के वह युवा सोच में पड़ गए, पर यह पंजाबी तो बिहार को जानता ही नहीं है। बिहार सामान्य ज्ञान के प्रश्नों से भी बाहर है। जाहिर है, जब अकबर के समय आधे बिहार को अवध के हिस्से में और आधे को बंगाल की झोली में डाल दिया गया था, तभी अन्याय हुआ था। अंग्रेजों ने भी समझ लिया था कि बिहार को अलग से पहचान देना खतरे से खाली नहीं है। नालंदा विश्वविद्यालय और चाणक्य की कर्मभूमि को लोग न जानें, तो ही बेहतर है। बिहारियों को अलग से पहचानने की जरूरत ही क्या है? वह विद्वान बिहारी युवा मचलकर रह गया, लेकिन उस पंजाबी को आश्वस्त न कर सका कि बिहार भी एक अलग क्षेत्र है और एक बिहारी खुद को बंगाली कैसे बता दे?
अपनी ही धरती पर बिहारियों की कोई पहचान नहीं है, यह कसक उस युवा के मन में गड़ गई। एहसास हो गया कि लौटते ही एक संघर्ष इंतजार कर रहा है। रही-सही कसर तब पूरी हो गई, जब रेलवे स्टेशन पर उतरते ही खांटी आरा जिला वाली भोजपुरी बोलते एक सिपाही को गौर से देखा, जिसके बल्ले पर लिखा था, बंगाल पुलिस। क्या बिहार अब बंगाल हो गया है और आगे भी बंगाल ही रहेगा? कोलकाता में वकालत की शुरुआत के बाद एक-एक दिन बिहार की सेवा में खर्च होने लगा। बंगालियों ने बिहार की अर्थव्यवस्था और राजनीति को कब्जा रखा था, बिहार के लोग शिक्षा से वंचित हो चले थे, सब कुछ कलकत्ता भरोसे था। बंगाली पत्रकार व बुद्धिजीवी भी बिहार की पीड़ा को जानते तो थे, पर वे अलग बिहार के हिमायती नहीं थे। बिहार के अलग सूबा होने से बंगाल का वर्चस्व कम हो जाना था। उस युवा बिहारी वकील ने वर्ष 1894 में बिहार को बंगाल सूबे से अलग करने के लिए डिप्टी गवर्नर सर चार्ल्स डालिमर को एक ज्ञापन सौंपकर संघर्ष की शुरुआत की। उन्होंने उसी साल कुछ साथियों के साथ मिलकर द बिहार टाइम्स नाम से एक अंग्रेजी पाक्षिक की शुरुआत की और बिहार के पक्ष में मजबूत माहौल बना दिया। ऐसे-ऐसे अकाट्य तर्क दिए कि बिहार की मांग को टालना नामुमकिन हो गया। अंतत: 19 जुलाई, 1905 को बिहार को अलग सूबे का दर्जा हासिल हो गया। हालांकि, बिहार के जो हिस्से अवध सूबे को मिल गए थे, वे न लौटे, फिर भी एक आधुनिक बिहार गढ़कर 10 नवंबर को जन्मे युवा वकील सच्चिदानंद सिन्हा ने इतिहास रच दिया।
आधुनिक बिहार के निर्माता प्रकांड विद्वान सच्चिदानंद सिन्हा (1871-1950) भारतीय संविधान सभा के पहले अध्यक्ष भी बनाए गए थे। बिहार के नवजागरण में उनका उतना ही योगदान है, जितना बंगाल के नवजागरण में राजा राममोहन राय का है।








