संविधान को चित्रों को सजाने वाले नंदलाल बोस

( भारतीय संविधान विशेष – गणतंत्र दिवस)

नंदलाल बोस

चित्रकार

 

वह परिवारों में अनुशासन का समय था। बच्चे बहुत आज्ञाकारी हुआ करते थे। वह बच्चा भी बहुत आज्ञाकारी था। पिता जो बोल दें, वही पत्थर की लकीर। पिता जानते थे कि उनका पुत्र कक्षा में बैठ पढ़ता-सुनता कम है, चित्र ज्यादा बनाता है। समय के साथ कॉपी में चित्रों की अधिकता होती जा रही थी और परीक्षाओं में अंक घटते जा रहे थे। पिता को चित्रकारी की ज्यादा समझ नहीं थी, पर मां बचपन में खूब रंगोली बनाती थीं और सुंदर गुड्डे-गुड़िया बनाने में माहिर थीं। भारतीय परिवारों में अक्सर ऐसा होता है, कोई न कोई मूर्त-अमूर्त कला घर में सहोदर की तरह रहती है, पर उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

वह बालक मुंगेर, दरभंगा से कोलकाता भेज दिया गया। यही रट लगाए रहता था कि मुझे चित्रकारी पढ़ने-सीखने दी जाए, पर हर बार यही सवाल कर दिया जाता कि चित्र बनाना सीखकर क्या होगा? नौकरी तो नहीं मिलेगी? मन लगाकर पढ़ाई करो। पढ़ने के लिए ही कोलकाता भेजा गया है।

आज्ञाकारी बच्चा पढ़ाई में घिसटते हुए वयस्क हो गया। उम्र 18वें वर्ष में प्रवेश कर गई। पाठ्य पुस्तकें सामने जब भी खुलतीं, उन पर भांति-भांति के चित्र लहराने लगते थे। सफेद पृष्ठ पर काले अक्षर कतार बनाकर कलाकृति में ढलने लगते थे। हिम्मत ही नहीं पड़ती थी कि हठ किया जाए। वह दौर ही ऐसा था कि ज्यादातर युवाओं की जिंदगी पिता की मर्जी पर चुपचाप कुर्बान हो जाया करती थी। क्या एक और जिंदगी कुर्बान होने वाली थी?

लक्षण तो ठीक नहीं दिख रहे थे। कॉलेज में विभिन्न विषयों में फेल होने का क्रम जारी रहा, पिता की फटकार सुन दूसरे कॉलेज में दाखिला लिया, पर फिर वही समस्या। बाकी लड़के कॉपी में पाठ लिखते थे और वह युवा चित्र बनाते पकड़े जाते थे। कभी पांच अक्षर कॉपी में जबरन बैठाए भी, तो वहीं बगल में छोटे-छोटे पांच चित्रों ने बैठकर मुंहतोड़ जवाब दिया।

इस बीच 20 की उम्र में विवाह हो गया। कोलकाता में पिता ने ससुर साहब से कहा कि अब इसे संभालिए, पर ससुर भी पिता की ही लकीर के फकीर निकले, ‘दामाद जी, अच्छी नौकरी के लिए तो पढ़ना ही पड़ेगा।’ …पर कोशिश के बावजूद पढ़ाई नहीं हो पा रही थी। दामाद जी फिर फेल हो गए। कहा गया कि कोई बात नहीं, अगली बार पास हो जाइएगा। युवा का मन रोता था कि सब अपने मन की कर रहे हैं, बस उसे ही रोका जा रहा है।

बहरहाल, वह ऐसा दौर था, जब शानदार पत्रिकाओं को पूरा परिवार पढ़ता था। स्वामी विवेकानंद से लेकर टैगोर तक प्रकाशित होते थे। बंगाल में सांस्कृतिक जागरण का समय चल रहा था। तब एक सुंदर और गंभीर बांग्ला पत्रिका आती थी, नाम था- प्रवासी। वह पत्रिका उस युवा के घर भी आती थी और उसके ताजा अंक में अजंता के भित्ति चित्र के अलावा राजा रवि वर्मा के चित्र भी सजे थे। वह युवा कभी वर्मा के चित्र की जीवंतता देखता, तो कभी अजंता के भित्त चित्र को निहारता। चित्र में एक सुडौल आकृति, झुकी हुई पलकें, कोमलता से उंगलियां कमल पुष्प थामे हुए और पुष्प की पंखुड़ियां तक सजीव। कैसे बनी होगी एक-एक पंखुड़ी? कैसे बनी होंगी उंगलियां, सुंदरतम अनुपात में कैसे मुड़ा होगा सुंदर मुखड़ा और झुकी होंगी पलकें? यही तो असल चुनौती है, जिसका मुकाबला अगर न किया, तो फिर जीवन क्या जिया? आज्ञाकारी युवा ने ठान लिया कि उम्र बढ़ चली है, अब बचपना छोड़ देना चाहिए। अब वही करना होगा, जो मन को मंजूर है। बेटे की दृढ़ता देख पिता भी मान गए और तब 23 की उम्र में विधिवत शुरू हुई कला की पढ़ाई।

और एक दिन वह अपने मित्र और कुछ चित्रों के साथ पहुंच गए प्रसिद्ध चित्रकार अवनींद्रनाथ के पास, ‘सर, मेरा नाम नंदलाल बोस है।’ चित्र देखने के बाद जवाब मिला, ‘तुम अभी तक कहां थे? मेरे साथ काम करोगे?’ और कला की सेवा में जिंदगी बढ़ चली। दो साल से भी कम समय में ‘इंडियन सोसायटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट’ ने नंदलाल बोस को अपनी पहली छात्रवृत्ति से सम्मानित किया। कला की सेवा के साथ जब ठीक-ठाक कमाई होने लगी, तब पिता के लिए पढ़ाई में नाकारा वही पुत्र सबसे प्रिय और आदर्श हो गए।

नंदलाल बोस (1882-1966) के जो खूबसूरत चित्र कभी 25 पैसे में बिकते थे, उनकी कीमत हजारों में पहुंच गई। गांधी जी ने उन्हें बुलाया कि लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में चित्र बनाइए और सजाइए। देश आजाद हुआ, तब उसके संविधान को भव्य भारतीय चित्रों से सजाने के लिए नंदलाल बोस को ही चुना गया। उन्होंने ही भारत रत्न और पद्मश्री जैसे सम्मान के पदक-चिन्ह तैयार किए। वह कहते थे प्रेम ही कला का मूल तत्व है और कला देश सेवा का एक तरीका।

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