भारतीय फिल्मों की कमाई के आंकड़े कभी बहुत स्पष्ट नहीं होते हैं, पर इतना तय है कि अद्भुत फिल्मकार नाग अश्विन की फिल्म कल्कि 2898 एडी कमाई करने वाली टॉप दस भारतीय फिल्मों में शुमार हो चुकी है। इस फिल्म के बारे में सबसे खास बात यह है कि बाकी टॉप फिल्मों में हमने इतिहास या बीती हुई कहानी को ही परदे पर देखा है, जबकि कल्कि 2898 एडी पहली ऐसी सफल व्यावसायिक फिल्म है, जो हमें भविष्य की ओर ले जाती है।
ऐसे भविष्य की ओर, जहां गंगा जी सूख गई हैं। वाराणसी में किसी भगवान की पूजा और मूर्ति तक प्रतिबंधित है। गंगा के सूखे पाट में तरह-तरह के आधुनिक वाहन उड़ रहे हैं। मशीन की कीमत ज्यादा है और इंसान की कीमत कम, इंसान खरीदे और बेचे जा रहे हैं। हर आदमी यूनिट या पैसे के पीछे पागल है। तस्कीन नाम के आधुनिक शैतान का कब्जा हो गया है और अच्छे लोगों ने अच्छे कल के लिए सबसे छिपाकर अपनी एक अलग दुनिया बसा ली है – संबाला। अच्छे लोग विद्रोही कहलाते हैं, अच्छे लोगों ने संघर्ष छोड़ा नहीं है, लड़ रहे हैं और मर रहे हैं।
तस्कीन अच्छे लोगों को रोगी मानता है। उसका कहना है कि इंसान कभी अच्छा नहीं हो सकता, इंसान को अच्छा बनने के बहुत मौके मिले हैं, बड़े-बड़े महापुरुष आए हैं, पर इंसान ओछे का ओछा ही रहा है। इंसान की फितरत में ही कमी है, जिसे दूर नहीं किया जा सकता, तो अच्छाई का नाटक बंद होना चाहिए।
फिल्म में तस्कीन सबसे रोचक चरित्र है, अत्यंत शक्तिशाली तकनीक और विज्ञान के चरम को छूता एक निर्मम इंसान, जो ज्यादातर समय योग समाधि में रहता है, जमीन से ऊपर हवा में बैठा हुआ, उम्र काफी हो गई है, नाना प्रकार के रसायनों और शरीर में लगी नलियों के बल पर जिंदा है, पर वह वास्तव में ईश्वरीय कण की खोज कर रहा है। यह खोज हिंग्स बोजोन या गॉड पार्टिकल की खोज की तरह नहीं है। वह हर संभावित स्त्री की कोख में वैज्ञानिक विधि से शिशु विकसित करके ईश्वरीय कण खोज रहा है।
फिल्म यह बताना चाहती है कि कल्कि का जन्म सुमति के गर्भ से होगा, पर उसके पिता का कोई पता नहीं है। हम कह सकते हैं कि विज्ञान ही कल्कि का पिता है। किसी का ध्यान नहीं गया है, यह कल्पना विवादित हो सकती है। परखनली विधि से कल्कि को गढ़ा जा रहा है।
फिल्म में कल्कि को गर्भ में ही निचोड़ने की कोशिश होती है, जिसमें से बस एक बूंद – ईश्वरीय कण पेशेवर वैज्ञानिक तस्कीन के लिए निकाल पाते हैं। सुमति अच्छे इंसानों या विद्रोहियों की मदद से फरार हो जाती हैं। शैतान बूढ़ा तस्कीन उस एक बूंद ईश्वरीय कण से फिर युवा हो जाता है और अब इस शृंखला की अगली फिल्म में वह कल्कि से महायुद्ध के लिए तैयार है।
बहरहाल, फिल्म में कल्कि की आहट या तस्कीन की चौधराहट ही नहीं है, अश्वत्थामा भी हैं। वास्तव में, अश्वत्थामा ही इस फिल्म के नायक हैं। अश्वत्थामा की भूमिका को अमिताभ बच्चन ने जीवंत कर दिया है। अश्वत्थामा को उनकी मणि मिल गई है, मतलब अश्वत्थामा को संकेत मिल गया है कि नारायण, केशव अर्थात कल्कि अवतार होने वाला है। अश्वत्थामा पूरी ताकत के साथ कल्कि के जन्म या अवतार को संभव बनाने के लिए तमाम आधुनिक तकनीक से लैस दुश्मनों से लड़ जाते हैं। अमरता का वरदान मिला हुआ है, तो किसी के मारे नहीं मरते और न कोई ताकत उन्हें झुका पाती है।
विचित्र बात तो यह है कि आधी फिल्म में अश्वत्थामा को एक पेशेवर कुशलतम दुष्ट छद्म नायक (अभिनेता – प्रभाष) से लड़ना पड़ता है। यह छद्म नायक शायद कारपोरेट जगत का प्रतीक है, मतलब पैसे के लिए साला कुछ भी करेगा। उसके लिए न कोई भगवान है और न कोई अलौकिक शक्ति, सबकुछ टेक्नोलॉजी है, जिसके जरिए वह दुनिया जीतने का गुमान पालता है। वह बार-बार बूढ़े महामानव अश्वत्थामा के रास्ते में आता है। नाटकीयता यह है कि इस छद्म कारपोरेटी नायक को एकाध बार अच्छाई के दौरे भी पड़ते हैं और वह एकाध अच्छे काम कर बैठता है। इस फिल्म को ऐसी क्षणिक अच्छाई के चकाचौंध से उम्मीद है और जिसे देखकर अश्वत्थामा की भी आंखों में आंसू आ जाते हैं। अश्वत्थामा को उस कारपोरेटी नायक में महाभारत के एक अन्य महामानव कर्ण की छवि दिखने लगती है। हालांकि, यह कारपोरेटी नायक फिर अपने दुष्ट स्वरूप में लौट आता है और उस सुमति को अश्वत्थामा से छुड़ाकर ले भागता है, जिसकी गर्भ में कल्कि हैं। जाहिर है, वह सुमति को तस्कीन को ही बेचेगा, क्योंकि तस्कीन को ईश्वरीय कण की तमाम बूंदें चाहिए। क्या विडंबना है कि दुनिया में बढ़ती पेशेवरता ईश्वर को भी बेचने का व्यवसाय कर सकती है।
वास्तव में, यह फिल्म इंसान होने पर शर्म का एहसास कराती है। यह वाकई कलयुग है, जब द्वापर का एक दुष्ट शापित वीर अश्वत्थामा महानायक नजर आने लगता है। अमिताभ ने फिर अपने महानायक वाले दौर को ताजा कर दिया है, जब वह परदे पर आते थे, तो ऐसा लगता था कि लंबे वाले अंकल आ गए, अब धरती पर एक भी बदमाश नहीं बचेगा। अभिनय की अगर बात करें, तो ध्यान रहे, अमिताभ इस फिल्म में भी अपने प्रचलित खांचे में उजागर हैं, जबकि तस्कीन की भूमिका को निभाते हुए अभिनेता कमल हासन फिर एक बार अपने फ्रेम या खांचे से बिल्कुल बाहर आ गए हैं, उन्होंने अपना रूप इतना बदल दिया है कि उन्हें पहचानना मुश्किल है। प्रभाष अपनी वीरता वाले खोल में हैं, हंसाते भी हैं, पर कुछ भी नया नहीं करते।
अपने विस्तार में यह अद्भुत फिल्म है। कल्कि अवतार की कल्पना बौद्ध धर्म में भी है और सिख धर्म में भी और शायद मुस्लिमों के अहमदिया संप्रदाय में भी। अच्छे लोगों की बची हुई गोपनीय दुनिया संबाला में इन सभी धर्मों के संतजन कल्कि के इंतजार में हैं और जी रहे हैं, सुनहरे कल के लिए। संबाला में भावी माता सुमति के आते ही वर्षों बाद बारिश हुई है। विशाल सूखे वट वृक्ष पर पत्तों का एक अंकुर फूटा है। सिमटती अच्छाई और फैलती बुराई का युद्ध तय है, यकीन रखिए, कल्कि आएंगे। अपनी अच्छाई को बिकने से बचाए हुए इंतजार करना होगा।
गंगा जी का सूखना और अंतिम युद्ध की तैयारी








