खुदा के लिए समझिए कि हम भी कुछ समझते हैं – सरदार पटेल

सत्य सदा धर्म से ऊपर है। गलती करते हैं लोग, जब धर्म को ही सत्य मान लेते हैं और समस्या बन जाते हैं लोग, जब धर्म के अधीन असत्य का सहारा लेने लगते हैं। धर्म की विजय के लिए भी अगर कोई असत्य घटित होता है, तो भगवान श्रीकृष्ण को भी जहरीले वाण झेलने पड़ते हैं। धर्म के अधीन असत्य के प्रयोग से पाकिस्तान जैसा देश बनता है या महज हजार लोगों वाली वेटिकन सिटी बची रह जाती है। यह अच्छी बात है कि हिन्दुओं में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है, जो सत्य को धर्म से ऊपर मानते हैं और तब हम कह पाते हैं कि सत्य ही हमारा ईश्वर है।
सत्य जब धर्म से ऊपर उठा, तभी तो भारत में ए पी जे अब्दुल कलाम जैसी हस्ती साकार हुई। कलाम साहब को मैंने जयपुर में करीब से देखा और संवाद किया है, उनकी आंखों में इस देश की माटी के प्रति जो श्रद्धा मैंने देखी है, उस पर स्वप्न में भी संदेह नहीं किया जा सकता। मुझे गर्व है कि मैं भारत रत्न कलाम साहब के देश का नागरिक हूं और वह अपने विराट सकारात्मक जीवन से हमें किसी भी सांप्रदायिक चर्चा से रोकते हैं। वह संदेश देते हैं कि व्यक्ति अगर अपने निर्धारित काम में खूब मन लगाए, तो वह सांप्रदायिकता से भी बच जाता है। खाली और दुष्ट दिमागों में ही ज्यादातर सांप्रदायिकता पनपती व पलती है।
खैर, आज जब हिंदू-मुस्लिम की चर्चा युद्ध के आसार तक पहुंच गई है, तब अनायास मेरा ध्यान 28 अगस्त 1947 को संविधान सभा में हुई चर्चा की ओर जा रहा है। खंडित भारत को आजाद हुए 12 दिन ही बीते थे और संविधान सभा में बचे कुछ अल्पसंख्यकों ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों के साथ सांप्रदायिक मांगों का सिलसिला फिर शुरू कर दिया था। तब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बहुत दर्द के साथ जो कहा था, उसकी चंद पंक्तियों को सीधे लिख देना ज्यादा उचित है। उन्होंने कहा था, ‘मैं  जानता हूं कि वर्तमान परिस्थिति में और वर्तमान वातावरण में मुसलमान अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में मुझे कितना परिश्रम करना पड़ता है। इसलिए मैं यह राय देता हूं कि आप यह न भूलिए कि अब वह दिन नहीं रह गए हैं, जब इस प्रकार का आंदोलन चलाया गया था और अब हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए मैं आपसे फिर अपील करता हूं कि आप अतीत काल को भूल जाइए। जो कुछ हुआ है, उसे भूल जाइए। आप जो चाहते थे, वह आपको मिल गया है। आपका एक अलग राज्य हो गया है और इसे याद रखिए, आप ही लोग और न कि पाकिस्तान में रहने वाले लोग उसके लिए जिम्मेदार हैं। आप ही ने आंदोलन चलाया। आपकी इच्छा पूरी हो गई। अब आप क्या चाहते हैं, मेरी समझ में नहीं आता। हिन्दू बहुसंख्यक प्रांतों में आप ही अल्पसंख्यकों ने आंदोलन चलाया। आपने देश का विभाजन करा दिया और अब फिर आप मुझसे कहते हैं कि कम से कम छोटे भाई का प्रेम प्राप्त करने के लिए मुझे फिर उसी बात के लिए राजी हो जाना चाहिए, यानी विभाजित भाग का फिर विभाजन करना चाहिए। खुदा के लिए यह तो समझिए कि हम भी कुछ समझते हैं।’
वास्तव में सांप्रदायिकता मूर्खता पर पलती है, जब पटेल ने कहा कि खुदा के लिए यह तो समझिए कि हम भी कुछ समझते हैं, तब सबकी बोलती बंद हो गई थी। तब डॉक्टर आंबेडकर और सरदार पटेल ने यह सुनिश्चित किया था कि अल्पसंख्यकों को कुछ भी अलग या विशेष नहीं दिया जाएगा, पर आश्वस्त किया था कि अल्पसंख्यक धीरे-धीरे देखेंगे कि भारत में उनके विकास को तेजी मिलेगी।
आज पिछले दस वर्ष की ही अगर बात करें, तो भारतीय मुस्लिमों की आय 27 प्रतिशत बढ़ी है और हिंदुओं की 18 प्रतिशत। अपनी कुछ वजहों से मुस्लिम पिछड़े हैं, पर उन्होंने हिंदुओं और अपनी आय के बीच अंतर को काफी घटा लिया है। आज भारत में रह गए मुस्लिम पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिमों से ज्यादा खुशहाल हैं। यह खुशहाली या मजबूती ही उन्हें यह ताकत देती है कि वह अहंकार से कह पाते हैं, ये देश किसी के बाप का नहीं है। हालांकि, उन्हें ऐसा कहते हुए एक बार सरदार पटेल की याद जरूर आनी चाहिए, पर सरदार पटेल को याद करना तो दूर, बहुत कम लोग हैं, जो गांधीजी या नेहरू के सद्भाव दर्शन पर आज चल रहे हैं।
बंटकर जाने वाले उतने खुशहाल नहीं हुए। आज एक भारतीय अगर सौ रुपये कमाता है, तो पाकिस्तानी केवल 56 रुपये कमा पाते हैं। हालांकि, गौर करने की बात है कि 26/11, साल 2008 के मुंबई हमले से पहले एक आम पाकिस्तानी की कमाई एक आम भारतीय से ज्यादा थी। उसके बाद पाकिस्तान की गिरावट शुरू हुई और वह लगातार असत्य का सहारा लेकर सांप्रदायिकता की खाई में गिरता गया, जबकि भारत समभाव के साथ आगे निकलता चला गया। अपने भारत पर गर्व मुस्लिमों को ही नहीं, अन्य सभी अल्पसंख्यकों को भी होना चाहिए और पाकिस्तान में अपने- अपने सत्य को देखना चाहिए।
फिर मैं लौटकर यह बात कहूं कि धर्म या मजहब के अधीन जब असत्य को पाला जाता है, तो उसकी सजा बड़े-बड़ों को भुगतनी पड़ती है।
अब अगर युद्ध हुआ, तो उसमें कलाम साहब द्वारा विकसित मिसाइल भी चलेंगे और उस असत्य को बेनकाब करेंगे, जिसके आधार पर बेरहम सांप्रदायिकता सांस लेती है। और यह प्रश्न बार-बार उठेगा कि हम आखिर किसलिए बंटे थे? किस उम्मीद में बंटे थे? कौन लोग थे, जिन्होंने यह समझा था कि हम अलग रहकर खुश रहेंगे? किस ने बहुसंख्यकों को दिलासा दिया था कि धीरे-धीरे अल्पसंख्यकों को समझा लिया जाएगा और सब मिलजुलकर रहने लगेंगे ?
रास्ता अब भी एक ही है – समझदारी, जो केवल सत्य को देखने से आएगी।
ध्यान रखिए, सांप्रदायिकता से गांधी-नेहरू भी नहीं जीत पाए थे, जीत जाते, तो देश नहीं बंटता। सांप्रदायिकता से शायद हम भी नहीं लड़ पाएंगे, तो फिर उपाय क्या है? दरअसल, सांप्रदायिकता जब किसी कानून को अपने हाथ में ले, तो कानून को कहर बनकर टूट पड़ना चाहिए। सांप्रदायिकता जिन अपराधियों को तात्कालिक और दीर्घकालिक रूप से पैदा करती है, उनका सही इलाज करना होगा। संविधान की नजर में सांप्रदायिकता भले अपराध न हो, सांप्रदायिकता से दुष्प्रेरित वचन या कर्म जघन्य अपराध है। सांप्रदायिकता से खेलिए मत, उसके दुष्परिणामों को समझिए।
ध्यान रखिएगा, पाकिस्तान का जन्म नॉर्मल डिलवरी नहीं है, सर्जिकल डिलवरी है, जिसमें एक मां के पेट पर दो चीरे पहले ही लग चुके हैं और तीसरा चीरा जानलेवा होता है। मतलब, यह अपनी मां को बचाने का समय है। क्या हम तैयार हैं?

1 thought on “खुदा के लिए समझिए कि हम भी कुछ समझते हैं – सरदार पटेल”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *