वह संगीत में और संगीत उसमें बसता था। पिता सितार बजाते थे, तो उसके दिलो-दिमाग के तार बज उठते थे- सा रे ग म प ध नि सां…। इस आरोह में एक लहर सी उठती थी और फिर अवरोह पर आती थी- सां नि ध प म ग रे सा। बार-बार गूंजता रहता था और पकड़ बनी रहती थी म ग सा रे सा ध नि सा… ।
कहा जाता है, राग रगों में हैं और संगीत के तार सबमें होते हैं। कोई अपने तारों का निरंतर स्पर्श करते हुए उनमें उलझा रहता है और कोई बीच-बीच में तार छेड़ लेता है और फिर आम दुनिया में लौट जाता है, लेकिन उसका क्या किया जाए, जिसके लिए दुनिया में संगीत के सिवा और कुछ भी नहीं। पिता के लिए संगीत एक पड़ाव था, पुत्र के लिए राह, पड़ाव, मंजिल, सब।
घर में एक कमरा था, जिसमें कुछ वाद्य यंत्र रखे थे। दूसरों के लिए वे वाद्य यंत्र किसी सामान की तरह थे, पर उस लड़के को लगता था कि सबसे खास कमरे में सितार, बांसुरी, हारमोनियम, तबला, पखावज और दोतारा भी रहते हैं। धीरे-धीरे इन वाद्य यंत्रों से प्यार ऐसे बढ़ता गया कि घर के दूसरे लोगों को चुभने लगा। सब चाहते थे कि यह लड़का, जिसे सभी आलम कहते थे, स्कूल जाए और मन लगाकर पढ़े, लेकिन आलम को स्कूल में दो पल भी चैन न था। चाहता था कि संगीत कोई सिखा दे, यही तो जिंदगी है, जबकि घर वाले अड़े थे कि इसे संगीत में हरगिज नहीं जाने देना है। पहरे लगते-बढ़ते गए, वाद्य-संगीत के कमरे में चुपचाप घुसने या पकडे़ जाने पर खूब डांट पड़ती थी। संगीत से हुए प्यार को कोई समझने को तैयार न था। खासकर संगीतकार बडे़ भाई तो हर बार दीवार बन सामने आ जाते थे। संगीत को जिंदगी क्या बनाना? अपनी खुशी भर सितार बजाना आ जाए, तो बहुत है। संगीत की दुनिया में बड़ी बदनामी भी तो है, कोठे हैं, दरबार हैं, पर यह सब उस लड़के आलम को कौन समझाए? आलम संगीत में उड़ना चाहता था, पर पैरों में अनुशासन की बेड़ियां भारी हुई जा रही थीं। एक दिन आलम ने सोचा, यहां रुक गया, तो खत्म हो जाऊंगा और उसने जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला ले लिया, वह चुपचाप घर छोड़ चला, खाली हाथ, तन पर पूरे कपडे़ भी नहीं थे, साथ सिर्फ संगीत था। क्या होगा, कैसे होगा, कहां मिलेगी रोटी, कहां मिलेगा बिछौना, कुछ न सोचा। सिर्फ एक धुन सवार थी कि जहां भी हो सके, संगीत सीखना है। चाहे जो हो जाए, हर हाल में सीखना था।
सौभाग्य से बगल के गांव में ही एक जात्रा मंडली मिल गई, जिसमें ढोल बजाने वाले उस्ताद सबसे खास थे, तो ढोल बजाना सीखने की तमन्ना हुई। आलम ने मंडली के मुखिया से कहा, आप मुझे भी साथ रख लीजिए, मैं अनाथ हूं, सीखना और आप लोगों के साथ रहना चाहता हूं। मंडली के लोगों को दया आ गई, अनाथ लड़का कहां जाएगा? अगर पता चल जाता कि यह बगल के गांव से भागकर आया है, तो मंडली वाले ही खुद घर पहुंचा देते। खैर, ढोल, पखावज, शहनाई व अन्य वाद्य सीखते हुए गांव-गांव, शहर-शहर घूमना चलता रहा। चार साल बीत गए। सीखने की भूख खत्म नहीं हुई, लगा कि गायन भी सीखना चाहिए। तरह-तरह के लोगों के साथ रहते हुए एक और खास बात हुई कि पता नहीं चलता था कि यह लड़का आलम है या आनंद? हालात के साथ पूरे भक्ति भाव से ढल जाना आलम की फितरत में शामिल था। खूब गुरु मिले, जिसने जैसे ढाला, ढलते हुए आलम बड़े हुए। बंगाल के सबसे प्रसिद्ध गायक नुलो गोपाल से गायन, अहमद अली से सरोद वादन सीखने के बाद वह रामपुर पहुंचे। तब रामपुर संगीतकारों का गढ़ था, वहां तानसेन खानदान के उस्ताद वजीर खान भी थे। वहां जब दरबार तक पहुंचना मुश्किल लगा, तब एक दिन आलम का पागलपन ही काम आया। नवाब के रथ के आगे लेट गए, खूब सारा अफीम खाकर जान देने की धमकी दे डाली, तो कामयाबी मिली। खैर रामपुर दरबार में पूछा गया कि क्या बजा लेते हो, तो उन्होंने कहा, आपके यहां जो भी वाद्य मौजूद हों, ले आइए। यही हुआ, एक-एक कर न जाने कितने वाद्य बहुत मधुरता से बजाकर आलम ने सबका दिल जीत लिया। यही वह मौका था, जब दुनिया ने उन्हें उस्ताद अलाउद्दीन खान के नाम से जाना।
अंतत: वह अपनी मंजिल मैहर पहुंचे। मैहर में वह अपने मित्र सूरज सहाय के साथ लगभग साढ़े पांच सौ सीढ़ियां चढ़कर मां शारदा मंदिर पहुंचते थे, तो वहां बाहर बैठकर देर तक शहनाई सुनाते थे। देश-दुनिया में खूब सम्मानित होने, मैहर बैंड, मैहर घराना, मैहर संगीत कॉलेज की स्थापना के बाद वह बाबा के नाम से ख्यात हुए। आजाद भारत में संगीत की नींव रखने वाले, पूरी सादगी से सौ साल से ज्यादा जीने वाले बाबा अक्सर कहते थे कि संगीत साधना-उपासना ही तो है।
अलाउद्दीन खान, महान संगीतकार








