काश! एक दिन सुधरेगा चीन

एक रिपोर्टिंग – एक कहानी

 

नकली हर जगह हावी है। असली के ठीक बगल में नकली, मतलब सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। एक कदम धीमे चलकर ल्हासा कहां लिखा है, खोजता हूं और पा जाता हूं। उधर बढ़ता हूं, जहां एक घेरा है, तिब्बतियों का, जो हर साल गर्म कपड़ों का बाजार सजाते हैं। शायद इस देश में होने की याद दिलाते हैं। वैसे ये घुलमिल गए हैं, लोग यही मानते हैं कि ये पूर्वोत्तर भारतीय हैं, तो कुछ लोग इन्हें नेपालवासी मानते हैं।

तिब्बत भला कितने लोगों को याद है? हमारे उत्तर प्रदेश से करीब पांच गुना बड़ा देश था इनका, जिसे चीन ने 1950 में संगीनों के जोर पर अपना मान लिया, स्वायत्तशासी क्षेत्र मानकर वहां सवार हो गया। 24 वर्षीय दलाई लामा के साथ लाखों तिब्बती 1959 में अपने देश से निकाले गए। कहां जाते? भारत आ गए। कभी आर्य आए थे, पारसी आए थे, मुस्लिम आए थे। तिब्बती भी आए, धर्मशाला में उनका मुख्य केंद्र बना, निर्वासित सरकार बनी। मेहनत से कमाने खाने के लिए तिब्बती देश भर में जगह-जगह फैल गए। भारत में करीब 72,000 तिब्बती रहते हैं, हालांकि कुछ आंकड़ों की अनुसार, उनकी भारत में संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा है। साल दर साल भारत में भी उनकी संख्या घट रही है, वे यूरोप और अमेरिका में स्थाई ठिकाना खोजने जाने लगे हैं।

बहरहाल, यहां तिब्बती बाजार में घुसते ही सामने चौदहवें दलाई लामा तेंजिन ग्यात्सो का छोटा सा मंदिर है, जहां उनकी फोटो के सामने कुछ फल रखे हैं, फूल हैं, कोल्डड्रिंक भी है। दलाई लामा मुस्कुरा रहे हैं कि भारत में 63 साल हो गए। क्या कोई उन्हें उनका वह देश लौटाएगा, जिसे संसार की छत कहा जाता है। ठंडा, सुंदर, रंगीन, मुस्कुराते लोगों का सुखी आध्यात्मिक देश। शायद यही होगा लॉफिंग बुद्धा का देश, वामपंथियों ने दबोच लिया। बाजार में हर तरफ दलाई लामा की फोटो है, गौतम बुद्ध भी ऐसे ही रहे होंगे, हमेशा मुस्कान लिए।

बौद्धों का तांडव हमने श्रीलंका में भी देखा और म्यांमार में भी, लेकिन क्या मजाल कि दलाई लामा ने कभी हथियार का पक्ष लिया हो। ईश्वर अगर कहीं हैं, तो उनसे यह सवाल तो बनता ही है कि अच्छे लोगों को संसार में तकलीफों से क्यों गुजरना पड़ता है।

अंदर एक दुकान पर पहुंचता हूं। तिब्बती पति-पत्नी ऊनी वस्त्र दिखा रहे हैं, बहुत प्यार से अपनी ही दुकान में मेरी पसंद का खोज रहे हैं। कभी मेरा आकार देख रहे हैं, कभी नाप रहे हैं, हां, इस साइज का आ जाएगा।

मेरी बेटी पूछती है, ‘ क्या ये लोग नर्थईस्ट के हैं?’

मैं बताता हूं, ‘ ये तिब्बती हैं?’

‘यहां तिब्बती?’

‘उनके देश पर चीन ने कब्जा जो कर लिया है।‘

मैं कुछ जोर से पूछता हूं, ‘ पूछो इनसे कहां से आए हैं?’

सुनकर तिब्बती महिला जवाब देती है, ‘ हम तिब्बती से आए हैं?’

मैं उनकी उम्र देखकर पूछता हूं, ‘आप तिब्बत से आए हैं?’

महिला जवाब देती है, ‘ नहीं, हमारा जन्म तो यहीं हुआ है, हमारे मां-बाप तिब्बत से आए थे। ‘

मैं कहता हूं, ‘ आपकी दूसरी पीढ़ी है, जो इंतजार कर रही है?’

तिब्बती सज्जन जवाब देते हैं, ‘ हां, हम दूसरी पीढ़ी हैं, हमने नहीं देखा तिब्बत, देखने की बहुत इच्छा है।‘

फिर सोचकर वह नीचे दुकान में बैठी अपनी दो बेटियों को दिखाते हुए कहते हैं, ‘ ये अब तीसरी पीढ़ी हैं।‘

भारत में जन्मी उन तिब्बती बेटियों की गोदी में छोटी आकार वाली नस्ल का श्वान खेल रहा है। दो टांगों पर चाउमिन सूंघने के लिए कूद रहा है। ठंड बढ़ गई है, तो भूख भी। श्वान की आंखों में खूब चमक और खुशी है, क्योंकि देश-परदेश का लफड़ा उसकी जिंदगी में मायने नहीं रखता।

मैंने कहा, ’ अब आप लोग यहां की नागरिकता ले लीजिए। दलाई लामा जी बोलेंगे, तो भारत सरकार जरूर विचार करेगी।‘

मेरी सलाह पर उनका मन कुछ भारी होता सा लगता है, जवाब देते हैं, ’ हां, यहां नागरिकता मिल जाएगी, लेकिन फिर लौट नहीं पाएंगे?’

‘मतलब, आप लोग इंतजार करेंगे?’

‘हां, कभी तो अपने देश जाएंगे?’

यहां क्या मोलभाल? यह फिक्स प्राइस मतलब तय दाम वाला बाजार है। मैं भाव-विभोर होने से बचता हूं और सोचता हूं, चीन में लाल क्रांति से पहले भी तो शासन था, तब तिब्बत भी सजीव था। गौर करता हूं, तिब्बतियों की आंखों में यह उम्मीद कायम है कि काश! एक दिन सुधर जाएगा चीन, तिब्बतियों को प्यार से स्वीकार करेगा, अपनी जमीन पर बसने देगा। बाजार से निकलते हुए एक बार फिर लामा की आदमकद फोटो सामने नजर आने लगती है और ल्हासा का पोटाला महल भी पूरी भव्यता के साथ बुलाने लगता है।

तभी बाजार के द्वार पर एक छोटा सा तिब्बती बच्चा भारतीय धुन पर नाचता दिखाई देता है, दिल ले गई कुड़ी गुजरात दी…।

शायद यह भारत में तिब्बतियों की चौथी पीढ़ी का बच्चा है, उसकी कमर बहुत करीने से भारतीय लय में बल खा रही है और ठीक सामने मंदिर में लामा मुस्कुरा रहे हैं।

सब बदलते हैं, सबकुछ बदलता है। हां, एक दिन आएगा, जब चीन भी बदलेगा!

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(नोट – सेक्टर 62 नोएडा के रामलीला मैदान में लगे तिब्बती मेले में जाने के बाद लिखी गई रिपोर्ट)

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