पत्रकारिता की क्लास – सम्पादन का विज्ञान
दिमाग पैराशूट की तरह होता है, तभी काम करता है, जब खुला होता है।
अगर रिपोर्टर पत्रकारिता रूपी रथ के अश्व हैं, तो सम्पादन से जुड़े पत्रकार लगाम और सारथी। रिपोर्टर आंख, कान और नाक हैं, जबकि सम्पादन से जुड़े पत्रकार दिल और दिमाग । सम्पादन में प्रवाह होना चाहिए, ताकि खबर, लेख और फीचर में सुधार की प्रक्रिया चलती रहे। सम्पादन का काम धीरे-धीरे मुश्किल होता जाएगा, क्योंकि गुणवत्ता का विकास तेजी से हो रहा है। लोगों की रुचियां इतनी तरह की हो गई हैं कि खबर परोसने से पहले कई बार सोचना पड़ता है। ज्यादा से ज्यादा रुचियों को संतुष्ट करने की कोशिश हो रही है और होनी भी चाहिए। कोई भी मुख्यधारा का अखबार बिना अच्छे सम्पादन के टिक नहीं सकता। संपादन के गुर के बारे में पहले भी काफी कुछ लिखा जा चुका है, यहां हम यह बताने की कोशिश करेंगे कि सम्पादन की समस्याएं क्या हैं और उन्हें सुलझाने के लिए क्या करना चाहिए। निम्नलिखित सात समस्याओं से आम तौर पर सम्पादन के क्षेत्र में सामना होता है :-
1 – योग्यता संबंधी संकट
2 – योजना में कमी
3 – समाचार बोध की समस्या
4 – प्रूफ की समस्या
5 – खबर काटने में असावधानी
6 – शीर्षक का संकट
योग्यता सम्बंधी संकट
रिपोर्टिंग इस मायने में आसान नजर आती है, क्योंकि उसमें रिपोर्टर के बीट का पता होता है। निर्धारित विषय से जुड़े समाचारों को जुटाने में रिपोर्टर को आसानी होती है, लेकिन यह सुविधा डेस्क पर नहीं होती। डेस्क पर बैठे पत्रकारों से आम तौर पर यह नहीं पूछा जाता कि अपराध की खबर सम्पादित करोगे या नगर निगम की या राजनीति की या सिनेमा की। हर तरह की रिपोर्ट को ठीक करना आना कोई मामूली बात नहीं है। योग्यता की समस्या आम तौर पर खड़ी होती है। यह एक ऐसी समस्या है, जिस पर ज्यादा विचार नहीं किया जाता है। खबर जैसी भी हो, उसकी गलतियां सुधारना, उसे ठीक करना, अच्छे शीर्षक लगाना और उसे पृष्ठ पर उचित स्थान देना निश्चित रूप से बड़ी योग्यता का काम है। ज्यादातर प्रकाशित समाचारों में ज्यादा मेहनत नजर नहीं आती है, अधूरापन होता है। ऐसा केवल योग्यता की कमी की वजह से होता है। कोई डेस्क पत्रकार हार्ड न्यूज अच्छी सम्पादित करता है, तो कोई सॉफ्ट न्यूज में जान डाल देता है, लेकिन जब सॉफ्ट न्यूज के सम्पादन में कुशल पत्रकार के हाथ में कोई हार्ड न्यूज लगती है, तो जाहिर है न्याय नहीं हो पाता है। यहां भी योग्यता की समस्या आड़े आती है, जो अंततः समाचार पत्र की पठनीयता पर असर डालती है।
समाधान : समाचार पत्रों में सम्पादन में भी विशेषज्ञता पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए, मतलब किसी डेस्क पत्रकार से हर तरह की खबरों को सुधरवाना कोई अच्छी बात नहीं है। अच्छे अखबारों में डेस्क पर भी विषय विशेषज्ञता काम आती है, जैसे अपराध की खबरों को पठनीय बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसके लिए खास तरह की शब्दावली व भाषा शैली की जरूरत पड़ती है। ठीक इसी तरह से राजनीतिक खबरों को सम्पादित करने के लिए अलग तरह का ज्ञान काम आता है। डेस्क इंचार्ज की जिम्मेदारी बढ़नी चाहिए। खबरों के वितरण में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कौन उप सम्पादक या वरिष्ठ उप-सम्पादक किस विषय की खबर को अच्छा बना सकता है। डेस्क पर बैठने वाले पत्रकारों को भी अपनी विषय योग्यता का ध्यान रखना चाहिए, उसे हर बार साबित करने के अलावा विषय विस्तार साबित भी करना जरूरी होता है। इसके अलावा योग्यता विकास के लिए भी निरंतर प्रयासरत रहने की जरूरत होती है।
क्रमश:
अगली बार पढ़िए – योजना में कमी
(मेरी पुस्तक – पत्रकारिता आधार, प्रकार, व्यवहार के अंश, प्रकाशक – राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, प्रकाशन वर्ष – 2011)







