याद आ गया दंतेवाड़ा का गदापाल गांव
छत्तीसगढ़ मुझे सदा से प्रिय रहा है। अति व्यस्त रही जिंदगी के बावजूद दो बार मुझे बस्तर, जगदलपुर, दंतेवाड़ा जाने का मौका मिला है। दोनों ही बार जंगलों के बीच से सूनी सड़कों से गुजरते हुए एक भय बना रहता था। उन दिनों नक्सली अचानक ही सड़क पर उतर आते थे और निर्मम हिंसा को अंजाम देकर बहुत आसानी से जंगलों में लौट जाते थे। आखिरी बार साल 2018 में बस्तर गया और अब वहां के साथी बता रहे हैं कि अब वैसा भय नहीं है। नक्सलवाद तो नहीं, लेकिन नक्सलवादियों का भय लगभग समाप्त हो चुका है। दंतेवाड़ा से आ रही खबरें सुखद भावों से भर दे रही है। नक्सली हिंसा अब इतिहास की बात हो जाएगी।
वैसे यह एहसास मुझे साल 2018 में भी हुआ था कि नक्सली हिंसा अब ज्यादा नहीं चल सकेगी। दंतेवाड़ा में एक गांव है – गदापाल। बाकी गांवों की तरह ही बहुत पिछड़ा हुआ था, नक्सलियों ने विकास होने न दिया और न पुलिस-प्रशासन की कभी वहां पांव जमाने की हिम्मत पड़ी थी। ऐसे में, गांव की मजबूर महिलाओं ने विकास का बीड़ा उठा लिया था। उन दिनों मैंने एक टिप्पणी लिखी थी, जिसका यहां उल्लेख प्रासंगिक है –
वे बढ़ेंगी और बना लेंगी अपने रास्ते
सशक्त स्त्रियों के संसार में यह कहा जाता है कि ऐसी स्त्री न बनें, जिसे पुरुष की जरूरत पड़ती है, बल्कि ऐसी स्त्री बनें, जिसकी जरूरत पुरुष को पड़े। महिलाएं संघर्ष में निखर कर सामने आती हैं और ऐसा कुछ न कुछ रच देती हैं कि पूरा समाज देखता है। यह न केवल प्रशंसनीय बल्कि अनुकरणीय समाचार है कि बस्तर के धुर माओवाद प्रभावित क्षेत्र में स्त्रियां खुद सडक़ बना रही हैं। सरकार अपनी टैक्स की पूरी कमाई और सत्ता की चौधराहट अपने पास रख ले, माओवादी अपनी बंदूकें-गोलियां-बारूद भावी क्रांति व अज्ञात खुशनुमा भविष्य के लिए बचाए रखें, महिलाओं को तो सडक़ चाहिए। आप नहीं बनाएंगे या आप नहीं बनने देंगे, तो वो खुद मिलकर बना लेंगी। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से १० किलोमीटर दूर गदापाल गांव स्त्री शक्ति की ऐतिहासिक भूमि बन गया है। करीब तीन दशक से यह क्षेत्र पूरी तरह से उपेक्षित है। जरूरी सडक़ें भी नहीं बनी हैं। सडक़ का टेंडर हुआ, लेकिन ठेकेदार ने काम नहीं लिया। मजबूर होकर महिलाओं ने संगठन बनाया और हाथों में उठा लिया कुदाल, फावड़ा, गैती, टंगिया, तगाड़ी और जुट गईं सडक़ बनाने में। विकास का यह तरीका ही सच्चा भारतीय तरीका है। विशेष रूप से जो देश के पिछड़े और वंचित इलाके हैं, वहां रहने वाले लोगों को यही तरीका आजमाना चाहिए। उन्हें अब इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि कोई व्यक्ति उनके विकास की खातिर अवतार लेगा!
महात्मा गांधी ने तो आजादी की लड़ाई के दौरान ही इस देश के आम लोगों से कह दिया था, ‘सरकार के भरोसे मत रहना। सरकार के भरोसे रहोगे, तो विकास नहीं होगा।’ राष्ट्रपिता की इस बात का लोगों ने ध्यान नहीं रखा, तो सरकारें आखिर क्यों इस बात पर जोर देतीं। संकटग्रस्त लोगों को स्वयं अपना रास्ता खोजना होगा। माओवाद की जो भी राजनीति-कूटनीति है, उसे विकास से ही जवाब दिया जा सकता है। विकास अगर सरकार अपने तंत्र द्वारा नहीं करवा पा रही है, तो लोगों का स्वयं आगे आना अपेक्षित और यथोचित है। तीन दशक से लोग सरकार के भरोसे ही तो बैठे थे, आगे भी बैठे रहते, बिना सडक़ के पशुवत जिंदगी जीते रहते। धन्य हैं गदापाल क्षेत्र की महिलाएं जिन्होंने नया इतिहास लिखने के लिए औजार उठा लिए हैं।
अब एक अच्छी सरकार के लिए यह प्राथमिकता होनी चाहिए कि वह इन महिलाओं की हर संभव मदद करे, उनका मार्ग प्रशस्त करे। विकास का ऐसा बीड़ा उठाने वालों को पुरस्कार-प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए, ताकि विकास का यह तरीका संकटग्रस्त इलाकों में कामयाब हो, इससे अंतत: राज्य और देश का ही भला है। जो ये महिलाएं कर रही हैं, वही असली संघर्ष है, वही सच्ची सेवा है, वही सच्चा जनजागरण है। उस इलाके में महिलाओं का साहस अब पुरुषों को भी प्रेरित कर रहा है। बेशक, साहस तो मांसपेशी की तरह होता है, जब आप उसे इस्तेमाल करते हैं, तब वह मजबूत होता है।
महात्मा गांधी ने तो आजादी की लड़ाई के दौरान ही इस देश के आम लोगों से कह दिया था, ‘सरकार के भरोसे मत रहना। सरकार के भरोसे रहोगे, तो विकास नहीं होगा।’ राष्ट्रपिता की इस बात का लोगों ने ध्यान नहीं रखा, तो सरकारें आखिर क्यों इस बात पर जोर देतीं। संकटग्रस्त लोगों को स्वयं अपना रास्ता खोजना होगा। माओवाद की जो भी राजनीति-कूटनीति है, उसे विकास से ही जवाब दिया जा सकता है। विकास अगर सरकार अपने तंत्र द्वारा नहीं करवा पा रही है, तो लोगों का स्वयं आगे आना अपेक्षित और यथोचित है। तीन दशक से लोग सरकार के भरोसे ही तो बैठे थे, आगे भी बैठे रहते, बिना सडक़ के पशुवत जिंदगी जीते रहते। धन्य हैं गदापाल क्षेत्र की महिलाएं जिन्होंने नया इतिहास लिखने के लिए औजार उठा लिए हैं।
अब एक अच्छी सरकार के लिए यह प्राथमिकता होनी चाहिए कि वह इन महिलाओं की हर संभव मदद करे, उनका मार्ग प्रशस्त करे। विकास का ऐसा बीड़ा उठाने वालों को पुरस्कार-प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए, ताकि विकास का यह तरीका संकटग्रस्त इलाकों में कामयाब हो, इससे अंतत: राज्य और देश का ही भला है। जो ये महिलाएं कर रही हैं, वही असली संघर्ष है, वही सच्ची सेवा है, वही सच्चा जनजागरण है। उस इलाके में महिलाओं का साहस अब पुरुषों को भी प्रेरित कर रहा है। बेशक, साहस तो मांसपेशी की तरह होता है, जब आप उसे इस्तेमाल करते हैं, तब वह मजबूत होता है।
(नक्सली हिंसा और विकास पर यह टिप्पणी फरवरी 2018 में रायपुर में रहते लिखी गई थी)








