(शोले के पचास वर्ष होने पर विशेष लेख, हिन्दुस्तान में प्रकाशित)
भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष बेमिसाल है। दुनिया जानती है, इस संघर्ष के सबसे बड़े प्रतीक-प्रतिनिधि नेता मोहनदास करमचंद गांधी की बुनियाद सत्य, प्रेम और अहिंसा पर आधारित है। इन तीन प्राचीन सद्गुणों ने मिलकर भारतीयों में एक प्रकार के विरल संकोच को पुष्ट किया था। संकोच भाव से ही बेहद उदार संविधान की रचना हुई। तमाम विचारधाराओं को साथ मिलाकर देश की पहली सरकार बनी, पर संकोच भाव की वजह से ही दृढ़ता का अभाव हुआ और देश बंट गया। गौर कीजिएगा, ऐसा कोई संकोच भाव हमारे पड़ोसियों में नहीं था। नतीजा यह कि आजादी को बमुश्किल सात-आठ साल हुए थे और देश में अनाड़ी फिल्म का यह गीत दिलों को छू रहा था, सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी।
आजाद हुए देश में विकास के लगभग हर मोर्चे पर यह संकोच था। ज्यादा संकोच की वजह से ही जमीनी स्तर पर सुधार की प्रक्रिया धीमी रही, तो मोहभंग का समय आया। यह मोहभंग एक गीत में भी गूंजा कि जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला। फिर भी प्रेम कथाओं और गीतों से निराशाओं को ढकने की कोशिश होती रही। जब यह कोशिश भी नाकाम हुई, तब तत्कालीन नायकों को गुस्सा आ गया। राजनीति में इस गुस्से के श्रेष्ठतम प्रतिनिधि जयप्रकाश नारायण थे और सिनेमा में अभिनेता अमिताभ बच्चन, जिनकी मुखमुद्रा में रोष का भाव स्थायी है।
समग्र गुस्से का ही नतीजा था कि शोले जैसी फिल्म बनी। एक ऐसी फिल्म जिसने आजादी के बाद के अनेक फिल्मी और गैर-फिल्मी संकोचों की धज्जियां उड़ा दीं। सत्य, प्रेम, अहिंसा का प्रचलित चोला उतार फेंका। पुलिस से लोगों का ही नहीं, बल्कि स्वयं पुलिस से पुलिस का भरोसा उठ गया। शोले में व्यवस्था की उदासीनता या लापरवाही से उपजे बर्बर डकैत गब्बर सिंह ने एक ‘पुलिसवाले’ का हाथ काट दिया, तब पुलिसवाला मदद के लिए पुलिस पर ही निर्भर नहीं रहा, दो अपराधियों को भाड़े पर रख लिया। यह एक ऐसी फिल्म है, जिसमें आप गिनते चले जाएंगे, संकोच की अनेक बेड़ियां दृश्य दर दृश्य टूटती चली जाती हैं।
एक पात्र वीरू, जो अपराधी है, शराब पीकर पानी टंकी पर चढ़ जाता है कि बसंती से मेरी शादी कराओ। क्या सामान्य समाज में कोई शराबी पीकर किसी लड़की का हाथ मांगने जा सकता है? लेकिन शोले का सामान्य समाज देखिए, वह एक शराबी की पैरोकारी कर रहा है कि बसंती, शादी के लिए मान जाओ। मतलब, शराब के प्रति सामाजिक संकोच एक झटके में मनोरंजन के साथ टूट गया।
शोले से पहले आमतौर पर हमारे यहां जो खलनायक होते थे, उन्हें स्याह छाया में दिखाया जाता था, पर शोले ने पहली बार पूरी भव्यता के साथ खलनायकों पर श्वेत प्रकाश डाला। नायक-खलनायक के बीच भेद करने का पारंपरिक संकोच ढेर हो गया। फिर रुपहले पर्दे पर जिस गब्बर सिंह का जन्म हुआ, वह आज भी हिंदी सिनेमा का एक सबसे चर्चित प्रतिनिधि है।
गब्बर सिंह के प्रति देश के फिल्मी महानायक अमिताभ बच्चन उर्फ जय का आकर्षण देखिए, उन्होंने शोले के 32 साल बाद रामगोपाल वर्मा की आग में आधुनिक गब्बर सिंह का किरदार बहुत चाव से निभाया।
शोले में तमाम तरह के संकोचों का समापन महज संयोग नहीं है। तत्कालीन राजनीति को देखिए, अपनी सरकार को बचाने या प्रधानमंत्री बने रहने के लिए इंदिरा गांधी ने देश पर नि:संकोच आपातकाल थोप दिया था। 25 जून 1975 को आपातकाल लागू हुआ है और 15 अगस्त 1975 को शोले रिलीज हुई। ऐसा नहीं है कि शोले सरकार को पसंद आई। मूल फिल्म शोले में कानून-व्यवस्था नदारद थी, जिसे देखो, वही कानून हाथ में लिए घूमने लगा था। ऐसे में, तत्कालीन सरकार को शायद थोड़ी लज्जा आई, तो सरकार ने संकोच त्यागकर शोले फिल्म के अंत को बदलवा दिया। सरकार ने कहा, गब्बर को ठाकुर नहीं मारेगा, ठाकुर उसे कमजोर कर देगा और अंत में पुलिस आएगी, जो गब्बर को पकड़ ले जाएगी। उसके बाद जाहिर है, कानून अपना काम करेगा।
शोले का असर देखिए, आज भी ज्यादातर व्यावसायिक फिल्मों में आखिर में पुलिस आती है। सामान्य जीवन में भी पुलिस आती है, नायक रूपी खलनायक को पकड़ ले जाती है और बाद में वह खलनायक जेल से छूटकर सियासी गलियारों को गुलजार करता है। गिन लीजिए कि कितने दागदार हर बार संसद पहुंच जाते हैं।
आज आप खोजिए, स्वतंत्र देश में संकोच कहां और कितना बचा है?
हम जानते हैं, शोले ने संकोच त्यागकर जो बेशर्म बुनियाद तैयार की, उस पर न जाने कितनी फिल्में खड़ी हुईं और उन फिल्मों ने स्वतंत्र भारतीय समाज में लोक-व्यवहार को रूखा और परस्पर अविश्वसनीय बनाने में अपना योगदान दिया।
इसमें कोई दोराय नहीं, गांधीजी के प्रभाव से ही हमारे संविधान में यह सोचा गया था कि भारत में साध्य और साधन, दोनों ही पवित्र होंगे। क्रिया ही नहीं, प्रतिक्रिया में भी हिंसा की वकालत नहीं थी। गांधीजी दोनों गाल पर थप्पड़ खाने के पक्ष में थे, उन्हें लगता था कि बदले की आंधी चलेगी, तो सबकुछ बर्बाद हो जाएगा। हालांकि, यह अब इतिहास में दर्ज है कि स्वतंत्र भारत में भी हिंसा को तवज्जो मिली। शोले में जो हिंसा है, वह बहुत हद तक प्रतिक्रियात्मक है। मतलब, उसमें बदला लेने के लिए की गई हिंसा का समर्थन है, पर आज हमारी सामान्य क्रिया में भी नाना प्रकार की हिंसा देखने लगी है। हमारे कर्म और क्रियाओं में आई हिंसा का ही प्रतिफल है कि कई बार पुलिस और अपराधी के बीच अंतर मिट जाता है और एक न्यायाधीश को कहना पड़ता है कि पुलिस अपराधियों का संगठित गिरोह है।
यही वह मोड़ है, जहां लगता है कि हमारा स्वतंत्र देश शोले से भी बहुत आगे निकल आया है, तभी तो आम समाज के सामान्य व्यवहार या क्रिया में ही हिंसा बढ़ने लगी है। हर किसी के अंदर एक ‘एंग्री मैन’ है, जो संविधान को चुनौती देना चाहता है। बेशक, हमें ‘एनिमल’ बनने से बचना होगा। यहां अपनी स्वतंत्रता की सलामती के लिए संविधान के प्रति आदर का भाव सबसे अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि इस आदर भाव से ही हमारे दिलो-दिमाग में संकोच का प्रवाह होगा। यह संकोच ही हमें शालीनता और मानवीयता के लिए बाध्य करेगा।
आज शोले हमारे लिए एक बीता हुआ पड़ाव है, प्रेरणा है। बुराई से हुआ अनुभव भी अच्छाई के काम आना चाहिए। अनावश्यक हिंसा में डूबकर अपनी क्षमता का क्षय करने के बजाय हमें फिर सत्य, प्रेम और अहिंसा की परिधि या उसके आसपास सिमटे रहना चाहिए। एक उदार, शांत, विकसित देश का खुशनुमा ख्वाब शोले के पहले भी था, आज भी है और कल भी रहेगा।








