सज्जन, स्तानिस्लावस्की और भरतमुनि, इन तीनों विभूतियों की याद लगभग एक साथ ही आती है। सज्जन का जन्म 15 जनवरी और स्तानिस्लावस्की का जन्म 17 जनवरी और क्या पता भरतमुनि का जन्म भी आसपास ही हुआ हो। इन तीनों में एक बात आम है और वह है अभिनय।
सज्जन अर्थात सज्जनलाल पुरोहित, भारत के एक बेहतरीन अभिनेता। कबूतरों के चौक, जोधपुर से मुंबई गए थे सज्जन (1921-2000) । आम सिने दर्शकों को वह ‘जॉनी मेरा नाम’ फिल्म में हेमा मालिनी के पिता और दूरदर्शन पर कभी प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘विक्रम-वेताल’ के वेताल के रूप में याद हैं। करीब १५ फिल्मों में तो वह हेमा मालिनी के पिता बने थे, यह संयोग भी उनकी एक पहचान है। अभिनय की अतुलनीय क्षमता वाले सज्जन ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के आधार पर 8 रसों के 49 भावों को अपने उर्वर चेहरे के सहारे पेश किया था और फोटोग्राफर थे ओपी शर्मा। अद्भुत पुस्तक तैयार हुई थी – रस भाव दर्शन, जो अब दुर्लभ और अनुपलब्ध है।
ऐसी स्थिति भरतमुनि के साथ नहीं है। उन पर खूब काम हुआ है और हो रहा है। भरतमुनि एक ऐसे ऋषि थे, जो करीब 3000 साल पहले अभिनय पर शोध करते हैं और नाट्यशास्त्र की रचना करते हैं। हालांकि यह आश्चर्य की बात है कि भारत के श्रेष्ठतम अभिनय प्रशिक्षण संस्थान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में बहुत लंबे समय तक भरत मुनि पाठ्यक्रम में नहीं थे। वहां अभिनय की पढ़ाई कोंस्तेंतिन स्तानिस्लावस्की (1863-1938) को अभिनय का पितामह मानकर होती है। दुनिया भर के अभिनय स्कूलों में मास्को में जन्म लेने वाले स्तानिस्लावस्की और उनकी मैथड एक्टिंग की धूम रही है। आज उनके बिना अभिनय के सिद्धांत सीखना असंभव है। इनका लेखन-अध्ययन अद्भुत है। बेशक, वे आधुनिक अभिनय के पितामह हैं, लेकिन भरत मुनि तो अभिनय कला में सूर्य के समान हैं। किसी के आंख बंद कर लेने से सूर्य का भला क्या बिगड़ता है?
खैर, अभिनय के इसी सूर्य की अनगिन किरणों को सज्जन अपनी अतुलनीय मुखाकृतियों से अभिव्यक्त करते हैं और तब संभव होती है पुस्तक – रस भाव दर्शन। इस पुस्तक का पुन: प्रकाशन होना चाहिए, ताकि यह भारतीय पाठकों-दर्शकों को सहज उपलब्ध हो। अपने स्तर पर सज्जन की कोशिश थी कि लोग अपने भरतमुनि को जान सकें, अब उनकी उस कोशिश को हमारी नई कोशिश का इंतजार है।
मुझे याद है, करीब छह साल पहले जयपुर में एक सेमिनार में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पढक़र निकलीं और ड्रामा पढ़ाने वाली वक्ता जब अभिनय पर बोल रही थीं, तब मैंने एक कागज पर लिखकर उनके पास भिजवाया – कृपया, भरतमुनि पर भी कुछ बोलिए। …और उसके बाद उन्होंने भरतमुनि पर बोलना शुरू किया, तब उनमें जागा जोश मुझे आज भी याद है। भारतीयों को मालूम नहीं है कि उनके पास क्या-क्या है। भारत के पास अपनी जो विद्याएं हैं, उनकी कोई तुलना नहीं है, लेकिन जरूरी है कि हम उन्हें याद रखें, रस और भाव को समझें, विकसित करें, आम लोगों तक ले जाएं। उस अभिनय को समृद्ध करें, जो शायद हर कोई करता है, कभी कम, कभी ज्यादा।








