दिलीप कुमार उपाध्याय
(मेरे बड़े भैया की कलम से)
दशरथनंदन श्रीराम के प्रति आदर्श भक्ति के बारे में यों तो श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास के साथ-साथ अन्य पूर्ववर्ती और परावर्ती भगवत भक्तों और महामुनियों तथा मनस्वियों ने विभिन्न प्रकार के पहलुओं को प्रमाणित तथा चरितार्थ किया है तथा नवधा भक्ति को सर्वसमर्थ और प्रासंगिक तथा प्रामाणिक बतलाया है। यहां तक कि नवधा भक्ति के केवल एक भाग को आदर्श चरित्र के रूप में जीवन का प्रणेता बनाकर जीवनयापन करने वाला असत और अहंकारी भी परम प्रेमी बन जाता है। अर्थात उनके पास जाने का एक मार्ग यह भी प्रासंगिक हो उठता है कि अपने आपको अत्यधिक कोमल बना लो। उदाहरणार्थ, गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस में वर्णित धनुष यज्ञ है। धनुष यज्ञ में आमंत्रित राजाओं और महाराजाओं के इस महासंगम में जगतजननी जानकी के स्वयंवर के लिए यज्ञ शाला का निर्माण है। अपने-अपने पदों के आधार पर बैठने का अत्यंत रमणीय और आदरणीय सुआसन है। सभी अपने-अपने आसन पर विराजमान हैं। स्वयंवर के धनुष यज्ञ के बाद भगवान श्रीराम को वरमाला डालने जा रही हैं। सखियां उनके साथ हैं, मां जानकी के बारे में कहा गया है कि
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम् ।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतो हं रामवल्लभाम् ।।
अर्थात उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्रीरामचन्द्र जी की प्रियतमा श्री सीता जी को मैं नमस्कार करता हूं।
मां के आसन के पास से धनुष के पास जाने का मार्ग मखमली कालीनों से भरा है, उन पर फूल और फूलों पर पराग, अर्थात ऐसा मार्ग जिस पर चलकर मां विदेह कुमारी को कोई कष्ट नहीं हो। ऐसा मार्ग इसलिए, क्योंकि माता सीता अत्यंत कोमल हैं। जब मां इतनी कोमल हैं, तो उनके चरण कमल कितने कोमल होंगे। जिनके चरण कमल इतने कोमल होंगे, वह मां कितनी कोमल होंगी। ऐसी मां का हृदय कितना कोमल होगा और वैसे कोमल हृदय में निवास करने वाले भगवान श्रीराम के चरण कमल कितने कोमल होंगे। जब उनके चरण कमल इतने कोमल हैं, तो वे कितने कोमल होंगे। उनका हृदय कितना कोमल होगा। ऐसे दयानिकेतन करुणा के सागर सर्वसमर्थ भगवान श्री राम के कोमल हृदय में स्थान पाने के लिए आप कितने कोमल होंगे तथा आपका हृदय कितना कोमल होगा।
अर्थात कोमल, कोमलतर और कोमलतम बनने के बाद और मां जानकी के आशीर्वाद के बाद ही भगवान श्री राम का दर्शन प्राप्त हो सकता है। उनकी कृपा दृष्टि पाई जा सकती है और यह सब जगतजननी जगदम्बा के स्नेहाशीष, अविरल अविछिन्न प्रेम से ही संभव है। श्रीमद गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी यही लिखा है –
जगतजननी जग जननी जानकी, अतिशय प्रिय करुणानिधान की,
ताके जुग पद कमल मनावऊं, जासु कृपा निर्मल मति पावऊं।
बोलिए, भक्त और उनके भगवान की जय।
लेखक : श्री दिलीप कुमार उपाध्याय
ग्राम : शीतलपुर बाजार, वाया : बरेजा, जिला : सारण, बिहार
श्रद्धा पूर्ण कुछ शब्द
(कुछ पूजनीय हस्तियां ऐसी हैं, जिनका ऋण इस जीवन में नहीं चुकाया जा सकता। माता-पिता के बाद बड़े भैया दिलीप कुमार उपाध्याय, निश्छल भावविभोर, स्नेह से भरपूर, खूब धार्मिक और व्यावहारिक। जैसी हिंदी, वैसी ही अंग्रेजी और वैसी ही संस्कृत। उन पर लिखा जाए, तो बातें ही खत्म न हों। वह बहुत अच्छा सोचते थे और उससे भी अच्छा लिखते थे। मुझे कहते थे कि अब रिटायर हो गया, नियमित लिखूंगा। ये उनके लिखे और भेजे गए शब्द रह गए हैं मेरे पास, आज उनकी पुण्यतिथि पर भारी हृदय से प्रस्तुत हैं।
गजब हरफनमौला थे बड़े भैया। जवानी के दिनों में उन्होंने गांव के मंदिर पर एक स्कूल अपने दोस्तों के साथ मिलकर खोला था, अच्छी शिक्षा के प्रति उनका लगाव अनुपम था। वह उस स्कूल के प्रधानाध्यापक थे, पढ़ाई इतनी अच्छी होने लगी थी कि सरकारी स्कूल में कक्षाएं खाली होने लगी थीं। ज्ञान उन्हें इतना था कि कहीं विश्वविद्यालय में प्रोफेसर से कम न होते। हालात ऐसे बनते गए कि वह गांव में ही अपने पिता और मेरे बड़े पिताश्री शिवजी उपाध्याय जी की सेवा में लगे रह गए। कुछ लोग इतने प्यारे होते हैं कि गांव और गांव की जिम्मेदारियां उन्हें कभी नहीं छोड़तीं।
मेरे जीवन में एक वह भी समय था, जब वह दूध में अपने हाथों से चीनी घोलते थे, तभी मैं पीता था। जब हम लोग छुट्टियों में गांव जाते थे, तब वही थे, जो रेलवे स्टेशन पर लेने आते थे, हम छोटे-छोटे (अभी भी) भाइयों में होड़ होती थी कि कौन रेल की खिड़की से बड़े भैया को सबसे पहले देखेगा। उनके साथ होना, किसी महोत्सव में होने जैसा होता था। 19 मई 2021 को डेल्टा, कोरोना की लहर उन्हें ले गई। मेरे दो भाई जल्दी-जल्दी चले गए। अब गांव जाने का मन नहीं करता, क्योंकि वहां का एकमा स्टेशन हो या बाजार या या गांव का घर, सब कुछ तो है, पर बड़े भैया कहीं नहीं… हैं। वह एक शक्ति रूप में जहां भी हों, अपना स्नेह और आशीर्वाद पूरे परिवार पर बनाए रहें। उनका यह प्यारा पूरा परिवार आज भी उनकी छत्रछाया में ही है। शांति: शांति: शांति: )








