भाग – 3
भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और सिनेमा
आधुनिक भारतीय अभिनय गुरु
भारत के अपने सबसे बड़े दिग्गज नाट्यगुरु इब्राहिम अल्काजी भी लावस्की को ही मान्यता देते थे। लावस्की की अभिनय धारा में ही उन्होंने काम किया। यह बताते चलें कि सऊदी मूल से ताल्लुक रखने वाले इब्राहिम अल्काजी पुणे में जन्मे थे और इंग्लैंड से अभिनय के गुर सीखकर आए थे। खास यह कि उनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया, पर दूरदर्शी अल्काजी भारत में ही रह गए। राष्ट्रीय ड्रामा स्कूल अर्थात एनएसडी की जब 1962 में दिल्ली में स्थापना हुई, तब मात्र 37 की उम्र में अल्काजी उसके निदेशक बहाल हुए।
इब्राहिम अल्काजी ने अन्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का जो पाठ्यक्रम तैयार किया, उसमें विदेश से लिए गए तत्व सबसे ज्यादा थे। बाद में, जैसे-जैसे भारत के कोने-कोने से छात्र यहां आते गए, वैसे-वैसे भारतीय लोक नाट्यों का भी समावेश व्यावहारिक पाठ्यक्रम में होता गया। भारतीय मुख्यधारा ने तो नाट्यशास्त्र को गंवा दिया था, पर भारतीय लोक ने नाट्य विधा को जीवित रखा था। मतलब, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने बुनियादी नाट्य ढांचा विदेश से लिया और उसमें भारतीय लोक नाट्य के तत्वों का समावेश किया।
होना यह चाहिए था कि भारतीय शास्त्रीय नाट्य को लोक नाट्य शैलियों से मिलाकर एक समृद्ध पाठ्यक्रम तैयार किया जाता। हां, कुछ व्यावहारिक अभिनय व्यायाम विधियां लावस्की या स्टैनिस्लावस्की से ली जा सकती थीं। तब भारत के ड्रामा स्कूल से जो छात्र पढ़कर निकलते, वो दुनिया भर में जाते और अभिनय सिखाते। ऐसा न हुआ, तो हुआ क्या? हमारा स्कूल न बेहतर सिनेमा दे पाया और न ज्यादा विश्वस्तरीय नाट्य दे पाया। आज भी विदेश में भारतीय लोकनाट्य की ज्यादा मांग है।
इस स्थिति पर अवश्य विचार होना चाहिए। भारतीय ज्ञान की अवहेलना हुई। आज जब भारत में हर चीज को सनातनी नजरिए से देखने की परिपाटी हो गई है, तो यहां यह तथ्य खड़ा किया जा सकता है कि भारत के पहले शिक्षा मंत्री मक्का में जन्मे एक मौलाना थे और भारतीय ड्रामा स्कूल के पहले निदेशक सऊदी मूल के थे। क्या इसी वजह से भारतीय शास्त्रों की अवहेलना हुई?
ऐसी अवहेलना का ही फल है कि आज भारतीय फिल्मकार पश्चिमी फिल्मकारों से जरूरत से ज्यादा प्रेरित नजर आते हैं। दूसरी ओर, भारतीय सिनेमा कला से यह शिकायत होती है कि उसके पास मौलिकता के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं है। बड़े कलाकार भी अक्सर यही कहते पाए जाते हैं कि भारतीय मौलिकता के नाम पर भला क्या है? तकनीक से लेकर कहानी तक सबकुछ तो विदेशी है?
यहां कहना न होगा कि हम भरतमुनि के पूरे काम को भुला देते हैं। भारतीय नाट्य कला के मूल अभिभावक भरतमुनि को भुलाकर हम विदेशी कला अभिभावकों की तलाश में भटकने लगते हैं।
पश्चिमी ड्रामा, पूरब का नाट्य
पश्चिम के पास ड्रामा के नाम पर क्या था? विख्यात ग्रीक दार्शनिक अरिस्टोटल या अरस्तू ने ‘पोएटिक्स’ की रचना की थी, जिसमें पहली बार ड्रामा के कुछ सिद्धांत दिए गए थे। यहां ड्रामा को कविता या काव्य का ही विस्तार माना गया। ग्रीक सभ्यता के आला दार्शनिक अरस्तू और भारतीय सभ्यता के भरतमुनि के समय के बीच ज्यादा अंतर नहीं है, पर जब हम अरस्तू के ‘पोएटिक्स’ को भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के सामने रखते हैं, तो हम पाते हैं कि पश्चिमी ड्रामा कितना बौना है? पश्चिम में अरस्तू का ड्रामा ज्ञान भी भुला दिया गया था, पर भरतमुनि का नाट्यशास्त्र भारत में संस्कृत समाज के पास सदा सुरक्षित रहा है। हां, यह कमी रह गई कि नाट्यशास्त्र के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से विकसित नहीं किया गया। नाट्यशास्त्र को उपयोग योग्य बनाने के लिए उतने जतन नहीं हुए, जितने होने चाहिए थे। हालांकि, नाट्यशास्त्र बहुत बेहतर अवस्था भारतीय लोक-संस्कृति में जीवित रहा। नाट्यशास्त्र का विकास लोक संस्कृतियों और लोक भाषाओं और यहां तक आदिवासियों के बीच भी खूब रहा। नाट्यशास्त्र को हमने सीखने लायक व्यावहारिक तो बनाया, पर पढ़ाने लायक सैद्धांतिक नहीं बना पाए। यह अभी भी हमारा दुर्भाग्य है कि नाट्यशास्त्र पर अध्ययन के कार्य को हमने संस्कृत भाषा जानने वाले विद्वानों पर ही छोड़ रखा है। यह भी बहुत त्रासद है कि भारतीय लोक संस्कृति से संस्कृत समाज की दूरियां बहुत बढ़ गई हैं। संभवत: संस्कृत समाज में यह अहंकार भी है कि हम आम समाज के पास नहीं जाएंगे और आम समाज को जब जरूरत लगे, तब वह संस्कृत के पास आए, प्रार्थना करे। आज संस्कृत समाज में ऐसे ऋषि-मुनियों के होने की उम्मीद हम नहीं कर सकते, जो आदिवासियों या लोक-समाज के बीच जाकर नाट्यशास्त्र का ज्ञान देंगे। भारत में आदिवासियों और लोक-समाज को अपने हिस्से का नाट्य अच्छी तरह याद है, वह मात्र नाट्यशास्त्र के सिद्धांत पर निर्भर नहीं है। अत: नाट्यशास्त्र की अवनति अगर हमें नगरीय समाज में आम तौर पर दिखती है, तो हमें ज्यादा उदास नहीं होना चाहिए। हमें अपनी लोकनाट्य शैलियों में नाट्यशास्त्र के तत्व देखकर प्रसन्न होना चाहिए।
यह भारतीय सिनेमा का एक दुर्भाग्य है कि उसमें लोकनाट्य भी सजावटी वस्तु की तरह पल-दो पल के लिए आता है और फिर नेपथ्य में चला जाता है। हमारा हिंदी सिनेमा तो निरंतर यह दिखाना चाहता है कि लोकनाट्य करने वाले गरीब या पिछड़े होते हैं।
हमारे सिनेमा में अब जो चल रहा है, उसे आधुनिक नाट्य नाम देना चाहिए। यह किसी खांचे में बंधा हुआ नहीं है। यह तमाम खांचों से आजाद है। यह आजादी उसे कई बार अराजक या अनुशासनहीन भी बना देती है, इसी का नतीजा है कि आज सिनेमा में कुछ भी दिखाया जा सकता है।
जैसे भारत में समानांतर सिनेमा का एक दौर आया, लेकिन वह ज्यादा नहीं चला, क्योंकि उससे रस की निष्पति नहीं हुई। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में लिखा है कि साधारणीकरण रसनिष्पत्ति की अनिवार्य प्रक्रिया है। अगर हम अपने नाट्य या रचना में ज्यादा असाधारणीकरण करने लगेंगे, तो वह रचना विफल हो जाएगी। हर चीज को साधारण बनाकर पेश करना चाहिए, ताकि लोग उससे जुड़कर रसास्वादन कर सकें। ध्यान रहे, समानांतर सिनेमा इसलिए मर गया, क्योंकि उससे लोगों को पर्याप्त रस की प्राप्ति नहीं हुई। यहां यह ध्यान रखने की बात है कि नाट्य से न केवल दर्शकों या श्रोताओं को, बल्कि नाटककारों या निर्माताओं को भी रस की प्राप्ति होनी चाहिए।
अब आ जाइए, मुख्यधारा में सिनेमा की बात कर लें। मुख्यधारा सिनेमा का एक मुख्य तत्व है असाधारणीकरण। मतलब, वह दर्शकों को असाधारण सपने दिखाता है। मिसाल के लिए, वह ऐसी सुंदरियों को सामने पेश करता है, जो आम दर्शक को कभी उपलब्ध नहीं हो सकतीं। इससे होता यह है कि उस दर्शक को जिस भी तरह की सुंदरियां उपलब्ध होती हैं, उन्हें लूट लेने की भावना उसके मन में उत्पन्न होती है। इससे समाज में महिलाओं की सुरक्षा पर भयंकर आघात होता है। ठीक इसी तरह से आज का सिनेमा अत्यधिक हिंसा और मृत्यु दिखाता है। नाट्यशास्त्र के अनुसार, मृत्यु रस का कारण नहीं होनी चाहिए। अत: आमतौर पर यही माना गया है कि नाट्यशास्त्र पर चलते हुए मंच पर कभी मृत्यु को घटित होते हुए नहीं दिखाना चाहिए। किसी की मृत्यु से उत्पन्न होने वाला भाव उपयोगी नहीं है, इससे बचना चाहिए। आज का सिनेमा मृत्यु को भी मनोरंजन समझ बैठा है, तो फिर जो समाज आज हम देखते हैं, उसमें मृत्यु भी व्यापार है। पहले लोग किसी की भी मृत्यु में रस नहीं लेते होंगे, उसे एक सत्य के रूप में स्वीकार करके आगे बढ़ जाते होंगे। आज के लोग मृत्यु में रस लेते हैं और मृत्यु पर ही टिके रहते हैं, उसे समाधान के रूप में देखते हैं। नतीजा यह कि समाज ठहर सा गया है और धीरे-धीरे मर रहा है। मानसिकता बदल गई है। सही रस की पहचान भी खो रही है।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का उद्देश्य क्या था। उनका उद्देश्य रसरंजन से एक स्वस्थ समाज की रचना थी, पर दुर्भाग्य से आज के सिनेमा के लिए स्वस्थ समाज का निर्माण या सुधार कोई विषय नहीं है। दुर्भाग्य से नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का उद्देश्य भी समाज को राह दिखाना नहीं है। उसका लक्ष्य पेशेवर कलाकार तैयार करना है, कलाकारों के चरित्र या व्यक्तित्व को उज्जवल रखना अब जरूरी नहीं। समाज में सकारात्मक रसों की निष्पति करने वाले कलाकार तैयार करना उसके उद्देश्यों में शामिल नहीं है।
क्रमश:








