समापन भाग
भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और सिनेमा
नाट्यशास्त्र आखिर जरूरी है?
विशेष रूप से नाट्यशास्त्र का छठा और सातवां अध्याय बहुत काम का है और हमेशा काम का रहेगा। ये दो अध्याय ऐसे हैं, जो नाट्य समाज ही नहीं, सामान्य समाज के लोगों को भी अवश्य पढ़ना चाहिए। आज के सिनेमा प्रेमी समाज के लिए यह जानना जरूरी है कि भारतीय नाट्यशास्त्र में क्या लिखा है? आइए, संक्षेप रूप से नाट्यशास्त्र के रसास्वादन का प्रयास करें।
पहला अध्याय : नाट्य का जन्म, नाट्य परिचय, नाट्य के गुण, अप्सराएं, मंच के देवता और उनकी पूजा। भरतमुनि ने अपने प्रथम अध्याय में ही अपने सभी सौ मानसपुत्रों के नाम गिनाए हैं। ये सौ उनके पट शिष्य थे, जिन्होंने गुरु भरतमुनि से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। प्रथम अध्याय में ही बहुत नाटकीयकता है। तरह-तरह के विघ्न अभिनेताओं पर हमले करते हैं और तब अभिनेताओं के संरक्षण के लिए स्वयं देवताओं के राजा इंद्र आगे आते हैं। उसके बाद प्रथम थियेटर या नाट्यगृह या ‘प्ले-हाउस’ की स्थापना होती है। प्रथम अध्याय में ही यह संकेत मिल जाता है कि भरतमुनि के शिष्य पूरे देश में फैल गए होंगे और जगह-जगह थियेटर की स्थापना हुई होगी।
दूसरा अध्याय : इस अध्याय में यह बताया गया है कि थियेटर क्या होता है? थियेटर का आकार क्या होता है? कैसे और कहां बनता है?
तीसरा अध्याय : थियेटर की कैसे शुरुआत होती है? थियेटर के देवता की कैसे पूजा होती है? जड़ता को कैसे तोड़ा जाता है?
चौथा अध्याय : पहला नाटक ब्रह्मा जी ने लिखा था और उसका प्रदर्शन हुआ था। नाट्य में नृत्य का क्या महत्व है? नृत्य कैसे होना चाहिए?
पांचवां अध्याय : नाटक की प्राथमिकताएं क्या हैं? साधु-संत प्रश्न करते हैं और भरतमुनि उत्तर देते चलते हैं।
छठा अध्याय : भावनाओं का कितना महत्व है? कितने प्रकार की भावनाएं होती हैं? उनकी प्रस्तुति कैसे की जाती है।
सातवां अध्याय : भाव, भावुकता और अन्य क्या अवस्थाएं नाट्य में जरूरी हैं? भाव के प्रकार, महत्वपूर्ण भावों का विवरण। अभिनय के प्रकार।
आठवां अध्याय : छोटे अंगों के हाव-भाव या मुद्राएं कैसी होनी चाहिए? अभिनय क्या है? चार प्रकार के अभिनय और 36 प्रकार की दृष्टि।
नौवां अध्याय : हाथ की मुद्राओं का क्या महत्व है? ध्यान रखिए, इस अध्याय में हाथ की 67 मुद्राओं का विवरण है। एक हाथ की मुद्राएं और दोनों हाथ की मुद्राएं।
दसवां अध्याय : अन्य अंगों की मुद्राएं, जैसे पेट, वक्ष, कमर की मुद्राएं हैं। अभिनय में इनका क्या महत्व है?
ग्यारहवां अध्याय : अस्त्र-शस्त्र की मुद्राएं। नाट्य में हथियार संचालन का महत्व, कितने प्रकार के हथियार? स्वस्थ व चुस्त रखने वाले व्यायाम।
बारहवां अध्याय : थियेटर में प्रवाह या गोल-गोल घूमने की विधियां और उनका महत्व।
तेरहवां अध्याय : मंच पर चाल कैसी होनी चाहिए? किसी कीड़े की तरह रेंगने से लेकर हाथी की तरह चलने तक। थियेटर में या मंच पर कैसे चलना चाहिए? कैसे प्रवेश करना चाहिए, कैसे खड़ा होना चाहिए, कैसे आगे बढ़ना चाहिए?
चौदहवां अध्याय : मंच या थियेटर में विभिन्न कोणों और स्थानों का उपयोग। मंच पर या मंच के परे किस ओर क्या चीज होनी चाहिए?
पंद्रहवां अध्याय : वाचन या भाषण या संवाद कैसे होना चाहिए? थियेटर में कुछ बोलने का क्या महत्व है? कैसे बोला जाना चाहिए?
सोलहवां अध्याय : पद का महत्व। थियेटर में लयात्मक पद और उसके विभिन्न प्रकार।
सतरहवां अध्याय : थियेटर में उच्चारण और शब्द चयन कैसे किया जाए? हिचक से लेकर जुबान के फिसलने तक का ज्ञान व सुधार प्रक्रिया इस अध्याय में है। किसको कैसे संबोधित किया जाए?
अठारहवां अध्याय : थियेटर में भाषा और उसके प्रयोग। स्थानीय बोलियों का महत्व।
उन्नीसवां अध्याय : संबोधन के तरीके क्या हों? राजा से कैसे बात किया जाए? गरीब से कैसे बात हो? बुजुर्ग को कैसे संबोधित किया जाए, बच्चे को कैसे पुकारा जाए?
बीसवां अध्याय : नाटक या नाट्य के कितने प्रकार हैं? दस प्रकार के नाटकों का विवरण। कितने कौतूहल, कितने प्रकार के प्रेम?
इक्कीसवां अध्याय : कथानक के विभिन्न अंग। नाटक की शुरुआत कैसे कथानक से हो? कथानक के कितने प्रकार?
बाईसवां अध्याय : शैलियों का जन्म और महत्व। शैलियों के प्रकार। कथा शुरू करने की शैली से लेकर बोलने की शैली तक।
तेईसवां अध्याय : वस्त्र और शृंगार का परिचय, महत्व, प्रस्तुति। वस्त्र के रंग से लेकर जेवर-अलंकार तक का परिचय।
चौबीसवां अध्याय : थियेटर में स्वभाव का महत्व। कैसा हो स्वभाव? स्त्रियों का स्वभाव, हाव-भाव कैसा हो? ध्वनि से स्पर्श तक। यह अध्याय अभिनेत्रियों के लिए बहुत आवश्यक है।
पच्चीसवां अध्याय : दरबारियों से कैसे व्यवहार किया जाए? वीर का परिचय और वीर के गुण क्या होने चाहिए? महिलाओं के प्रकार। यह अध्याय भी अभिनेत्रियों के लिए महत्वपूर्ण है।
छब्बीसवां अध्याय : विशेष प्रस्तुतियां। दिन, रात, सुबह, जमीन पर पड़ी कोई वस्तु से खुशी और चांदनी तक मंच पर कैसे प्रस्तुत हो? विशेष परिस्थितियों को कैसे प्रस्तुत किया जाए?
सत्ताईसवां अध्याय : नाट्य प्रस्तुति में सफलता। सफलता के प्रकार और प्रदर्शन पर होने वाले विवाद, विमर्श।
अठाईसवां अध्याय और आगे : लगभग एक चौथाई नाट्यशास्त्र संगीत को समर्पित है। संगीत के बिना कोई नाट्य संभव नहीं होता। नाट्य में संगीत का बहुत महत्व है। आम तौर पर हमारे सिनेमा में संगीत का पक्ष बहुत समृद्ध है। संगीत-गीत से बहुत रसरंजन या मनोरंजन होता है। भारतीय सिनेमा के गीतों का समाज पर गहरा प्रभाव है। ज्यादातर गीत अभी भी अपने उद्देश्य से नहीं भटके हैं। हालांकि, यहां मौलिकता के लिए ज्यादा प्रयासों की जरूरत है।
चौतीसवां अध्याय : चरित्र या किरदार के प्रकार। महिलाएं, नर्तक, दासियां।
पैंतीसवां अध्याय : नाटक में चरित्र या भूमिका का वितरण। भूमिका वितरण के सामान्य सिद्धांत, किसमें क्या देखकर क्या भूमिका प्रदान की जाए?
छत्तीसवां अध्याय : नाट्य का संसार में अवतरण। नाट्यशास्त्र और नाट्य प्रदर्शन का मूल्य।
ध्यान रहे, नाट्यशास्त्र में छठा और सातवां अध्याय सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। ये दोनों अध्याय बहुत हद तक अभिनेता की समझ का व्यापक विस्तार कर देते हैं। सातवें अध्याय में ही हम जानते हैं कि अभिनय मूलत: चार प्रकार के होते हैं। यहां भाव, विभाव, अनुभाव का बहुत महत्व है। मन में भाव आता है। उसके बाद उस भाव को किसी तरह से व्यक्त करने की भावना या विभाव उत्पन्न होता है। उसके बाद उसे हम नाना प्रकार से भाव को प्रकट करते हैं। यही अभिनय है, जो बुनियादी रूप से चार भागों में पाया जाता है। वाचिक, आंगिक, सात्विक और आहार्य। वाचिक अभिनय अर्थात वचन, संवाद, बोलने का तरीका। आंगिक अभिनय अर्थात संवाद या भाव के अनुरूप अंगों का संचालन। सात्विक अभिनय अर्थात अपने अंदर से निकलने वाला अभिनय, यह अभिनेता की एकाग्रता और कुशलता से ही संभव होता है। आहार्य अभिनय अर्थात सज्जा, वेशरचना और उपकरणों के माध्यम से अभिव्यक्ति या अभिनय करना।
हम भारतीय सिनेमा के किसी भी अभिनेता का वाचिक, आंगिक, सात्विक और आहार्य अभिनय के आधार पर आकलन कर सकते हैं। यह हमें जरूर करना चाहिए। अच्छे और बुरे अभिनय, अच्छी और बुरी प्रस्तुति के प्रति हमें सजग रहना चाहिए।
हमें यह भी देखना चाहिए कि किसी भटकाने या बिगाड़ने वाली वस्तु या प्रस्तुति में हमें रस न आए। अभिनय के सच्चे ज्ञान या नाट्यशास्त्र के सहज ज्ञान से हम बुरे और अच्छे सिनेमा के बीच भेद कर पाएंगे। एक सशक्त और सुदृढ़ देश की रचना के लिए नाट्य की समझ बहुत जरूरी है। आज हर दूसरा आदमी ठगी का शिकार होता है, जब कोई ठग हमारे सामने आता है, तब हम अपनी भावनाओं को वश में नहीं रख पाते हैं, वह ठग अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से हमें अपने वश में कर लेता है। ठगों के अभिनय को पहचानना भी जरूरी है।
हम यह साफ देख पा रहे हैं कि आज ज्यादातर लोग अच्छे आदमी और बुरे आदमी के बीच भेद नहीं कर पा रहे हैं। नाट्यशास्त्र की सच्ची समझ हमें इस भेद के प्रति सजग करेगी और हमारे विवेक को बल मिलेगा।
अंत में एक कथा
नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में एक बहुत सुंदर और प्रेरक कथा है। ब्रह्मा जी ने जब पहली बार नाट्य का सृजन किया, तब विघ्नों ने असुरों के साथ मिलकर नाट्य प्रदर्शन को ध्वस्त कर दिया। अभिनेताओं और नाट्य सहायकों का अंत कर दिया। तब देवताओं के राजा इंद्र रक्षा के लिए आगे आए। विचार-विमर्श के बाद देव वास्तुकार विश्वकर्मा ने एक सुरक्षित नाट्यगृह या थियेटर का निर्माण किया, किंतु विघ्नों और असुरों का खतरा नाट्य प्रदर्शन पर बना रहा। तब ब्रह्मा ने स्वयं देवताओं को नाट्य रक्षा के लिए थियेटर में जगह-जगह तैनात हो जाने का आदेश दिया। ब्रह्मा ने कहा कि संसार में अब जब भी कहीं नाट्य का आयोजन होगा, आप सब अपनी-अपनी जगह पर पहरेदारी करेंगे। माना जाता है कि जब नाट्य होता है, तब अभिनेता, अभिनेत्री की रक्षा के लिए स्वयं इंद्र वज्र लेकर मंच के एक ओर खड़े होते हैं। थियेटर के द्वार पर स्वयं नियति और यम खड़े होते हैं।
वास्तव में समस्या यह थी कि असुरों को लग रहा था, उन्हें नाट्य जैसी मनोरम विधा से वंचित किया जा रहा है। एक भय यह भी था कि नाटक में उन्हें खल चरित्र के रूप में पराजित दिखाया जाएगा। तब ब्रह्मा ने असुरों की आशंकाओं को भी दूर करते हुए कहा कि आप लोग नाट्य को होने दीजिए। नाट्य विधा का सृजन केवल देवताओं के लिए नहीं हुआ है, असुर समाज भी इस विधा का आनंद ले सकता है। अर्थात अगर असुर भी नाटक करें, तो देवता पहरेदारी करते हैं।
तभी तो आज भी नाट्य मंच ऐसा पवित्र स्थल है, जिसे बहुत श्रद्धा भाव से प्रणाम किया जाता है और उसके उपरांत ही नाट्य प्रदर्शन प्रारंभ होता है।
ऐसे नाट्य संस्कार से वंचित सिनेमा संसार को अभी लंबा सफर तय करना है।
समापन
संदर्भ ग्रंथ
1 – भरतमुनि-विरचित नाट्यशास्त्र, प्रधान संपादक – मिथिलाप्रसाद त्रिपाठी, कालीदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन
2 – नाट्यशास्त्र, मनमोहन घोष रचित, द रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (अंग्रेजी में)








