बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पिछले अनेक चुनावों में सबसे यादगार रहेगा। इस सदी में यह पहला चुनाव है, जिसमें बिहार में पीढ़ी परिवर्तन होता दिख रहा है। पिछले चार या पांच दशक से जो नेता बिहार की राजनीति को संचालित कर रहे थे, इस चुनाव में कमजोर पड़ते दिखे हैं। लालू प्रसाद यादव अब पिछली सीट पर बैठ गए हैं, तो उनके पुराने साथी नीतीश कुमार भी अब थकते नजर आए हैं। राष्ट्रीय जनता दल की कमान पूरी तरह से तेजस्वी यादव के हाथों में है और इस चुनाव में यह तय हो जाएगा कि तेजस्वी यादव की राजनीति का भविष्य क्या होगा?
इतना तय है कि नीतीश कुमार अब अपनी सक्रियता के आखिरी दौर में हैं। वह अगर मुख्यमंत्री बन भी जाते हैं, तो भी उनकी कमान पहले की तरह मजबूत नहीं रहेगी। हर हाल में बिहार की राजनीति में पीढ़ी परिवर्तन होगा। ऐसे नेता सत्ता में आएंगे, जिन्होंने न आपातकाल देखा है और न न लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आशीर्वाद पाया है। आने वाली पुरानी पीढ़ी ज्यादा पलटकर नहीं दिखेगी। गौर करने की बात है कि तेजस्वी यादव अपने माता-पिता के दौर को भी याद करना नहीं चाहते हैं। वह राष्ट्रीय जनता दल के साथ अपना एक नया भविष्य लिखना चाहते हैं।
बेशक, नीतीश कुमार को जो बिहार साल 2005 में मिला था, वह एक गड़हा जैसा था, नीतीश कुमार ने बहुत हद तक उस गड़हे को समतल किया है, वहां बिजली आई है और सड़कें बनी हैं। अब आगे उद्योग और विकास में तेजी आनी चाहिए। यह दुर्भाग्य की बात है कि नीतीश कुमार अब चूकने लगे हैं या उनके पास आगे भविष्य को लेकर कोई योजना नहीं है।
प्रशांत किशोर का योगदान
एक योजना प्रशांत किशोर के पास है, लेकिन उनका जादू जितना चलना चाहिए था, उतना नहीं चला है। अव्वल तो उनका स्वयं चुनाव न लड़ना उनके खिलाफ गया है, दूसरी बात, उनके पास दलगत ढांचे की कमी साफ दिखी है। तीसरी बात, उन्होंने अपना चुनावी घोषणा पत्र न जारी करते हुए कहीं न कहीं यह आभास कराया है कि वह अपनी योजनाओं को लिखित में लाना नहीं चाहते हैं। चौथी बात, लगभग तीन साल सकारात्मक रूप से राजनीति करने के बाद प्रशांत किशोर नकारात्मक राजनीति करते दिखे हैं। नेताओं पर उनका गुस्सा जायज है, पर मीडिया पर उनके गुस्से ने उन्हें कमजोर साबित किया है।
प्रशांत किशोर को पता होना चाहिए था कि आज के समय में मीडिया सबसे कमजोर कड़ी है। अपने देश में आम पत्रकारों की बौद्धिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति अब ऐसी नहीं है कि उन्हें रीढ़ वाला मानकर निशाना बनाया जाए। कमजोर या पूर्वाग्रह से ग्रस्त पत्रकारों को स्पष्ट शब्दों में जवाब देना ज्यादा बेहतर नीति है। कम से कम चुनाव के समय में ऐसा नहीं दिखना चाहिए कि मीडिया आप से सवाल कर रहा है और आप भी मीडिया से सवाल करने लगें। मीडिया को सुधारने का काम चुनाव के बाद भी हो सकता है, लेकिन आम तौर यह देखा गया है कि चुनाव जीतने के बाद चापलूस पत्रकारों की तलाश शुरू हो जाती है।
बहरहाल, प्रशांत कुमार भले ही सीटें कम जीत पाएंगे, पर उन्होंने बिहार की राजनीति को पर्याप्त प्रभावित किया है। बिहार विधानसभा चुनाव को प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी के लिए भी याद किया जाएगा। यह बात भले ही विराेधी कहेंगे कि प्रशांत किशोर की मेहनत बेकार गई, उनकी गांव-गांव पहुंची यात्रा पर पानी फिर गया, लेकिन यह सच नहीं है। प्रशांत किशोर की मेहनत बेकार नहीं गई है। उन्होंने उन बातों को उठाया, जिनकी जरूरत बिहार को थी और है। वह शायद हार जाएंगे, लेकिन उनकी बातें बिहारियों का पीछे-पीछे चलेंगी, उनके सवाल बिहारियों के दिमाग को मथेंगे। अब जो सरकार बनने वाली है, उसे प्रशांत किशोर के पैमानों पर भी आंका जाएगा। प्रशांत किशोर अगर अपने मुद्दों के साथ मैदान में टिके रहते हैं, तो कोई शक नहीं, बिहार की एक महत्वपूर्ण आवाज के रूप में उन्होंने खुद को स्थापित कर लिया है। उनकी पार्टी भले हार जाए, पर उन्हें लोग सुनना चाहेंगे।
यदि प्रशांत किशोर की पार्टी 20 या 25 सीटें भी जीत लेती है, तो वह बिहार की सत्ता को अंदर से प्रभावित करने की स्थिति में होंगे। जब उन्होंने सत्ता से बाहर रहते हुए अपने मुद्दों को जन-जन तक पहुंचा दिया, तो वह सत्ता में दखल रखते हुए बहुत कुछ कर सकते हैं।
अगली सरकार नीतीश-भाजपा बनाएं या तेजस्वी-कांग्रेस, दोनों ही स्थितियों में बिहार को तेज विकास चाहिए। वादे के अनुरूप रोजगार चाहिए। उद्योग चाहिए, शांति और सुविधाएं चाहिए।
क्या हम तेजस्वी से उम्मीद लगा सकते हैं? हां लगा सकते हैं, वह यह आभास दिलाते हैं कि वह अपने पिता से अलग हैं। उनके पिता से निश्चित रूप से गलतियां हुई हैं, वैसी गलतियां शायद तेजस्वी से नहीं होंगी। लालू जिस युग में राजनीति में सक्रिय हुए थे, उस दौर में नेता यह सोचते थे कि उनके गलत काम हो-हल्ले में छिप जाएंगे। हालांकि, नीतीश कुमार भी उसी दौर के नेता है, पर उनकी राजनीति लोकलाज पर आधारित है। लालू को अपने पूरे करिश्मे के बावजूद साफ-सुथरे नेता के रूप में नहीं देखा जाता है, लेकिन नीतीश कुमार की गिनती करीब बीस वर्ष शासन के बावजूद बेदाग नेताओं में होती है।
खैर, विधानसभा चुनाव 2025 ऐसा आखिरी चुनाव है, जब संपूर्ण क्रांति से उपजी राजनीति का अवसान हो रहा है। कहना न होगा कि पचास वर्ष पहले हुई संपूर्ण क्रांति का जमीनी फायदा बिहारियों को नहीं मिला था, उसके बाद आर्थिक रूप से बिहार पिछड़ता ही चला गया। अब जब बिहार की राजनीति नए दौर-नई पीढ़ी की ओर बढ़ रही है, तब राज्य संपूर्ण आर्थिक क्रांति की उम्मीद लगा रहा है।
आज बिहार को एक नए लालू की नहीं, नए नीतीश की जरूरत है।








