मनोज तिवारी बनाम रवि किशन

भोजपुरी फिल्म उद्योग में बहुत गड़बड़ झाला है। यह उद्योग करीब 2,000 करोड़ रुपये का माना जाता है। वैसे यह मंजिल भोजपुरी फिल्मों को साल 2017 में ही मिल गई थी, लेकिन तब से कमाई लगभग ठहर गई है। फिल्में खूब बन रही हैं, लेकिन लागत निकालने के आगे मामला बन नहीं पा रहा है। कई बार यह भी लगता है कि पांच प्रतिशत सिनेमा भी ऑरिजनल नहीं है। वैसे बॉलीवुड का सिनेमा भी बमुश्किल 15 प्रतिशत ऑरिजनल होगा। ज्यादातर नकल आधारित काम यहां होता है। हां, एक समय 14 साल पहले भोजपुरी क्षेत्र में आया था, जब अमिताभ बच्चन और मिथुन चक्रवर्ती जैसे कलाकार भी भोजपुरी में योगदान देने उतरे थे।

नई सदी में ही भोजपुरी फिल्मों का पुनर्जन्म हुआ था, जब साल 2001 में रवि किशन की मुख्य भूमिका वाली फिल्म सैंया हमार बनकर तैयार हुई थी। भोजपुरी फिल्मों के गहन जानकार व कवि मनोज भावुक बताते हैं कि ‘तब धन की कमी थी, फिल्म के ज्यादा प्रिंट तैयार नहीं हो पाते थे, तो एक ही फिल्म रुक-रुककर अलग-अलग राज्यों या शहरों में रिलीज होती थी।’ यह मानना चाहिए कि साल 2002 में लोग भोजपुरी फिल्म के नए दौर का आनंद लेने लगे थे।

साल 2003 में भोजपुरी लोकगायक के रूप में प्रसिद्ध मनोज तिवारी ने एक ट्रेंड सेट किया। आज भी भोजपुरी में अगर कोई अच्छा गाता है, तो अभिनेता या नायक के रूप में उसका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। खैर, 2003 में इस साल उनकी फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ रिलीज हुई थी। यह फिल्म आज तक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भोजपुरी फिल्म है। दो करोड़ रुपये से भी कम खर्च में बनी इस फिल्म ने करीब 35 करोड़ रुपये कमाकर सबको चौंका दिया था। इसमें कोई शक नहीं कि ‘सैंया हमार’ फिल्म से इस उद्योग की बुनियाद रखी गई थी।

रवि किशन उम्र में मनोज तिवारी से दो साल बड़े हैं, लेकिन भोजपुरी फिल्म उद्योग में खुद को वरिष्ठ मानते हैं। हालांकि, समग्रता में भोजपुरी उद्योग में मनोज तिवारी ज्यादा स्थापित नाम हैं। जब बिहार में लोग रवि किशन नाम के हिन्दी फिल्म अभिनेता को जानते नहीं थे, तब मनोज तिवारी के सुगम और देवी गीत घर-घर में सुने जाते थे।

दोनों के बीच तनाव भी रहता है और प्रेम भी। मनोज तिवारी बेहतर गायक हैं, जबकि रवि किशन बेहतर अभिनेता। सलमान खान की फिल्म ‘तेरे नाम’ से लेकर वेब सीरिज ‘खाकी’ तक रवि किशन सुस्थापित अभिनेता हैं। दक्षिण में भी उन्हें अच्छी भूमिकाएं मिलती रहती हैं। बाबू या बाबू सोना या जिंदगी झंड बा फिर भी घमंड बा जैसे संवादों की वजह से भी उन्हें पहचाना जाता है।

दूसरी ओर, मनोज तिवारी ‘गोरिया चांद के अंजोरिया’, ‘रिंकिया के पापा’ और ‘बगलवाली जान मारेली’ इत्यादि के लिए प्रसिद्ध हैं। संयोग है कि आजकल दोनों ही भाजपा सांसद हैं और चर्चा में बने रहते हैं।

कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में दोनों के बीच द्वंद्व बार-बार उभारा जाता है, दोनों एक दूसरे का मजाक उड़ाते देखते हैं, लेकिन वास्तव में दोनों के बीच कामकाजी संबंध बहुत अच्छे हैं, दोनों को अपनी सीमाओं का पता है। बिहार में दूसरे अभिनेताओं को भी इससे सीखना चाहिए कि मनोज तिवारी और रवि किशन के बीच किस तरह का तालमेल है और दोनों ने शुरुआती दौर में कितनी मेहनत से एक उद्योग को खड़ा किया है।

पिछले दिनों दोनों साथ-साथ गंगा स्नान के लिए हरिद्वार गए थे और वहां से एक वीडियो लाइव किया था, न कोई बनावट न दिखावा, केवल लगाव, बस धोती लपेटे हुए, गंगा किनारे। अवसर था रवि किशन के पिताजी की पुण्यतिथि का। इन दोनों अभिनेताओं के बीच स्नेह भोजपुरी की ताकत भी है। दोनों भोजपुरी फिल्म उद्योग के आधार स्तंभ हैं। दोनों से सीखना चाहिए।

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