दिलीप कुमार का मतलब

\"\" इतना बड़ा सितारा, इतनी लंबी उम्र और इतनी कम फिल्में, यह बात अपने आप ही दिलीप कुमार को फिल्म दुनिया में सदा-सर्वदा तक सबसे अलग साबित करती रहेगी। फिल्मों में सक्रियता के 54 साल में कुल 62 फिल्में, जिनमें से 57 फिल्में प्रदर्शित-प्रशंसित हैं। उनकी करीब 12 फिल्में अपूर्ण रहीं या प्रदर्शित नहीं हो पाईं। उल्लेखनीय 57 फिल्मों में लगभग हर फिल्म यादगार। जितना ठोक बजाकर दिलीप कुमार ने अपनी फिल्मों का चयन किया, उतना शायद भारतीय सिनेमा में किसी स्टार ने नहीं किया है। उनके लिए कभी पैसे का महत्व नहीं था। वे अच्छी भूमिकाओं का इंतजार करते थे। कभी संयम नहीं खोते थे और कोई भी फिल्म तभी करते थे, जब लगता था कि यह फिल्म उन्हें अलग मुकाम दे सकती है। सौ सोनार की और एक लोहार की। वे भारतीय सिनेमा के ऐसे लोहार कलाकार हैं, जिनके हर प्रहार से स्वर्ण जैसी फिल्में तपकर सांचे में ढलकर निकलती थीं। क्रिकेट की भाषा में कहा जा सकता है कि उन्होंने जब भी मारा, तो छक्का मारा, जिन गेंदों पर छक्के नहीं पड़ सकते है। उन अनेक गेंदों को उन्होंने छोड़ दिया। कई निर्माता और निर्देशक अपनी कहानी के साथ उनसे मिलने को बेताब रहते थे. कई बार ऐसा भी हुआ कि गेंदे चौके के लायक होती थीं, उन गेंदों को छक्के के लायक बनाने की महारत भी दिलीप कुमार में थी। पिक्चर, फिल्म, मूवी, सिनेमा और उसके पूरे मीडियम की पूरी समझ रखते थे। उन्हें पता था कि लोग क्या देखना चाहते हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात, उन्होंने यह तय कर रखा था कि उन्हें क्या और कैसे दिखाना है, कैसे, कितना दिखना है। समाज के प्रति इतना सजग कोई दूसरा कलाकार नहीं हुआ। नकारात्मक संदेश देने वाली भूमिकाओं को उन्होंने पास नहीं फटकने दिया। ऐसा नहीं कि कभी मन किया, तो खलनायक भी बन गए, वे लगभग हमेशा नायक थे और नायक ही रहे। उन्हें पता था कि वे नायक से अगर खलनायक बने, तो न जाने कितने नौजवानों को गलत प्रेरणा देंगे। केवल चार-पाँच फिल्मों . \’फूटपाथ\’ (1953), \’अमर\’ (1954), \’गंगा जमना\’ (1961), \’शक्ति\’ (1982) में दिलीप कुमार की भूमिकाओं में स्याह पक्ष था, लेकिन इनमें से भी लोगों ने दिलीप कुमार को केवल \’गंगा जमना\’ और \’शक्ति\’ में ही पसंद किया क्योंकि इन फिल्मों में उनकी नकारात्मक भूमिका के पीछे मजबूत तर्क था। वह बागी की भूमिका में उतरे, लेकिन वहाँ भी लोगों ने उन्हें साथी के रूप में देखा। दर्शकों के प्रति साथी भाव दिलीप कुमार में सदैव विराजमान रहा और समाजवादी मूल्यों को भी उन्होंने सर्वोच्चता दी। मजदूर एकता और मजदूर जागरण में भी उनका अपना योगदान देखा जा सकता है। \’नया दौर\’ में उन्होंने जो प्रभाव पैदा किया, वह दुर्लभ और अविस्मरणीय है- \’एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना, साथी हाथ बढ़ाना।\’भारतीय सिनेमा में ऐसे अभिनेताओं की सूची लंबी है, जिन्होंने कभी रुककर नहीं सोचा कि उनकी भूमिकाएँ समाज पर कैसा असर डालेंगी, जो भी भूमिका अलग हटकर मिली, प्रभावी मिली, उसे करते चले गए। बहुत सारे कलाकारों के लिए व्यावसायिकता का तकाजा यही है कि जो भी प्रस्ताव आए, उसे स्वीकार कर लिया जाए, ढेर सारी फिल्में, ढेर सारे नोटों की गड्डियाँ अपने खाते में जोड़ ली जाएँ। दूसरी ओर, दिलीप कुमार का जोर इस पर था कि भले ही कम दिखें, पर्दे पर कम आएँ, लेकिन जब भी आएँ, जोरदार आएँ, अच्छे रूप में अच्छी तरह से आएँ। एक अभिनेता के रूप में दिलीप कुमार भारत के सबसे अच्छे प्रतिनिधि हैं।\"\"हॉलीवुड के पास अगर मार्लन ब्रैंडो जैसे महान अभिनेता हुए, तो भारत के पास भी दिलीप कुमार जैसे महान अभिनेता अभिनय की गहराई और कुल प्रभाव के लिहाज से ब्रैंडो से भी कुछ बेहतर दिलीप कुमार ठहरते हूँ। यह बात यहाँ गौर करने की है कि दिलीप कुमार को विदेशी फिल्मों के भी अवसर मिले थे, लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किए। इसके अलावा भारतीय फिल्में उस चरम को कभी-कभार ही छूती हैं, जिस चरम को हॉलीवुड की फिल्में अक्सर छूती रहती हैं। वहाँ बहुत मेहनत से चरित्र गढ़े जाते हैं, अच्छे अभिनेताओं को बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ दी जाती हैं। हॉलीवुड में ऐसे चरित्र लिखे जाते हैं कि अभिनेता अपनी कला क्षमता, प्रदर्शन का विस्तार करे, लेकिन भारत में ज्यादातर चरित्र सुपर स्टार और स्टार अभिनेताओं की क्षमता के दायरे में ही लिखे जाते हैं। क्षमता से बाहर जाने या क्षमता के विस्तार का खतरा यहाँ कम ही उठाया जाता है। यह अक्सर देखा गया है कि भारतीय अभिनेता अपनी क्षमता का दोहराव करता रहता है। ऐसे ढाँचे में एक जागरूक और नवोन्मेषी अभिनेता भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। या तो वह स्वयं फिल्म बनाए, जो कि खतरे से खाली नहीं, फिल्म व्यावसायिक रूप से अगर विफल रही, तो समग्रता में विफलता का ठप्पा लग सकता है।उनके बारे में यह कहा जा सकता है कि इस अभिनेता का जिस स्तर पर इस्तेमाल हो सकता था, उस स्तर पर नहीं हुआ। भारत में उनके अलावा ऐसे कई अभिनेता हैं, जो अपनी क्षमता, प्रतिभा, संभावना से बहुत कम इस्तेमाल किए गए। उनके पास प्रस्ताव हमेशा रहे। उनके सामने निर्माताओं और निर्देशकों की भीड़ रही। हिन्दी फिल्मों में बाद के सुपर स्टार राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन भी अपनी भूमिकाओं को लेकर उतने सजग कभी नहीं रहे, जितने सजग दिलीप कुमार थे। उनकी अदाकारी की इतनी माँग थी कि वे फिल्मों और के ढेर लगा देते, लेकिन उन्होंने चुनिंदा काम किए। वे हर बार ऐसी भूमिकाएं करना चाहते थे, जिनमें मील का पत्थर बनने की संभावना होती थी। एक और अगर आप दिलीप कुमार के बारे में कुछ भी न जानते हों, आप में अगर संयम का अभाव हो, तो संभव है, आप उन्हें कुछ ही पल में खारिज कर दें, लेकिन अगर उनके अभिनय और संवाद पर आपने जरा भी गौर कर लिया, तो वे आपके लिए एक लत या आदत बनने की हद तक पहुँच जाते हैं। वे अपने दर्शकों में चाहत का ऐसा नशा या लगाव पैदा करते हैं, जो छूटता नहीं है। ऐसे भी दर्शक मिल जाएँगे, जो सिर्फ दिलीप कुमार को ही अभिनेता और सुपर स्टार मानते हैं। बात, भारतीय हिन्दी फिल्मों की दुनिया के कालखंड को दिलीप कुमार के सहारे दो भागों में बाँटा जाता है। जाने-माने सिनेमा विशेषज्ञ-लेखक अशोक राज ने \’हीरो\’ नाम से दो खंडों में जो किताब लिखी है, उसमें उन्होंने दिलीप कुमार को ही काल विभाजन के मार्कर के रूप में इस्तेमाल किया है। हिन्दी सिनेमा में पहला समय दिलीप कुमार का है। और दूसरा समय उनके बाद के दौर का। बाद के दौर पर उनकी छाया बहुत स्पष्ट रूप से व्याप्त है।उनके महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि हिन्दी फिल्म दुनिया में सक्रिय ज्यादातर अभिनेताओं को उन्होंने अपने अभिनय से प्रेरित और प्रभावित किया है। मनोज कुमार, संजीव कुमार, गुरु दत्त, धर्मेन्द्र, राजेन्द्र कुमार इत्यादि से लेकर आज शाहरुख खान, इरफान खान इत्यादि तक दिलीप कुमार से प्रभावित दिखते हैं। कई अभिनेता ऐसे भी हैं, जिन्होंने दिलीप होने के बाद ही सिनेमा की दुनिया में कदम रखने का फैसला किया। कुमार से प्रभावित दिलीप कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए सर्वाधिक आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पहला फिल्मफेयर उन्होंने ही जीता था।

2 thoughts on “दिलीप कुमार का मतलब”

  1. Sanjeev Shrivastava

    वाह। ये अच्छा लगा।
    बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
    आपने बहुत अच्छी किताब लिखी है।

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