क्रोध का इतिहास : शिव, परशुराम और एंग्री यंगमैन

(अपनी पुस्तक ‘ सिनेमा हिन्दुस्तानी’ के अमिताभ बच्चन पर केंद्रित अध्याय ‘हम जहां खड़े हो जाते हैं’ से)

अभिनय की दुनिया में अमिताभ बच्चन को उनके गुस्से के लिए ही ज्यादा जाना जाता है। गुस्सा अर्थात क्रोध अर्थात रौद्र। भारतीय शास्त्र में महादेव शिव को रुद्र कहा जाता है। शिव का क्रोध, शिव का तीसरा नेत्र प्रसिद्ध हैं। हिन्दू धर्मशास्त्र में ब्रह्मा निर्माण के, विष्णु पालन के और शिव संहार के देवता हैं। शिव की पत्‍नी सती ने जब पिता दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर पति के अपमान का बदला लिया, तब शिव का क्रोध विकराल हो गया। यज्ञ तो नष्‍ट हुआ ही, न जाने कितने शत्रु मारे गए, लेकिन शिव का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे भाग रहे थे, वे दौड़ रहे थे, कंधे पर पत्नी का अधजला शव लिए। आहत, क्रोधित, बेचैन। उनका वश चलता, तो वे अनंतकाल तक शव लिए घूमते रहते, किन्तु सृष्टि का सहज पालन सुनिश्‍चित करने के लिए विष्णु ने शिव को उस शव और शोक से मुक्त किया। प्रभु के क्रोध से आज भी दुनिया डरती है, भारत में शिव को ही मूलत: पूजन प्राप्त करने का अधिकार है। क्रोध सहज है, स्वाभाविक है, सर्व-व्याप्त है, प्रकृति के स्वभाव में न्यस्त है।

भारतीय धर्मशास्त्र में विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का क्रोध भी बहुत प्रसिद्ध है। पिता महर्षि जमदग्नि से उन्हें विरासत में ही क्रोध मिला था। परशुराम के पिता ऋषि थे, किन्तु माता रेणुका राजकुमारी रही थीं। यहाँ भी दो विपरीत ध्रुवों की जीवन ऊर्जा से परशुराम उपजे थे। पिता पूरब तो माता पश्‍चिम। एक बार क्रोधित पिता ने आदेश दिया, माता का सिर काट दो। पूर्ण सक्षम और अपने व पिता की शक्‍ति के प्रति आश्‍वस्‍त परशुराम जी ने ऐसा ही किया। पिता प्रसन्न हुए, तो वरदान माँगने को कहा। पुत्र परशुराम का माँ के प्रति अपार स्नेह था, उन्होंने माँगा कि माँ को जीवित कर दीजिए। ऐसा ही हुआ।

(संयोग है, माँ के प्रति अमिताभ का प्रेम अद्भुत है। माँ उनकी कमजोर नब्‍ज है। उनकी अनेक फिल्मों में माँ गेमचेंजर या निर्णायक है। अंदर-ही-अंदर माता के प्रति प्रेम भी किसी क्रोध को पालता है।)

पौराणिक एंग्री यंग मैन परशुराम एक ऐसे आकर्षक पौराणिक चरित्र हैं, जो भारतीय व्यावसायिक फिल्मों को कई तरह से खुराक मुहैया कराते आए हैं। परशुराम ऋषि हैं। परमयोगी हैं। महायोद्धा हैं। मार्शल आर्ट विशेषज्ञ हैं। माता-पिता के भक्‍त हैं। अच्छाई-सच्चाई के पुरोधा हैं। संघर्ष के उज्जवल प्रतीक हैं। दक्षिण भारत में तो परशुराम की पूर्ण भक्‍तिभाव से पूजा होती है। वे केरल या भारत के दक्षिणी तट के निर्माता के रूप में देखे जाते हैं। शास्त्र कहते हैं, केरल को उन्होंने ही बसाया था। परशुराम के जीवन का एक और पक्ष देखिए। एक बार क्षत्रिय राजा सहस्रबाहु उनके पिता के आश्रम आया, पिता ऋषि जमदग्नि ने खूब सत्कार किया। आश्रम में संपन्नता का कारण कामधेनु नस्ल की एक गाय थी -होमधेनु जिसका नाम था। सहस्रबाहु उस गाय को लूट ले गया। परशुराम जी जब आश्रम में आए, तो पिता को दुखी देखा, उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ। वे गए और युद्ध में सहस्रबाहु और अनेक मित्र क्षत्रिय राजाओं को मार गिराया। गाय को वापस ले आए। पिता को कथा सुनाई, तो पिता खुश नहीं हुए। पिता ने कहा, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था, हम ब्राह्मण हैं, हमें क्षमा करना आना चाहिए। हिंसा का रास्ता छोड़ो, अब जाओ सभी तीर्थों में भ्रमण करो और प्रायश्‍चित करो। परशुराम शांत हुए और प्रायश्‍चित करने निकल पड़े। इधर पीछे से सहस्रबाहु के पुत्रों ने आश्रम पर धावा बोल दिया और ऋषि जमदग्नि का सिर काट ले गए। सूचना मिली, तो परशुराम लौटे। माँ को विलाप करता देख प्रचंड क्रोध आया। पिता के कहने पर जिस परशु को उन्होंने रख दिया था, उसे फिर उठा लिया।

पुराण से चला आ रहा क्रोध किस तरह से फिल्मों में उतर आता है। गौर कीजिएगा, यही होता है ‘जंजीर’ फिल्म में नायक (अमिताभ) हिंसा का रास्ता छोड़कर भली-शांत जिंदगी जीने की सोचता है, लेकिन उसके दुश्मन उसे चैन लेने नहीं देते। पी‍ड़ि‍त हो रही दुनिया उसे लगातार पुकारती है। ऐसे में, जब नायिका (जया भादुड़ी) घर सजाने के लिए खूबसूरत पर्दे चुनने की बात कर रही है, तब नायक अंदर-ही-अंदर उबल रहा है, वह बोलता है, ‘…हम अपने घर में ऐसे ही खूबसूरत पर्दे लगवाएँगे और मैं यह जानने की कोशिश भी नहीं करूँगा कि इस पर्दे के दूसरे तरफ दुनिया में क्या हो रहा है, बाहर, हमारे खूबसूरत घर के बाहर लोग मरते हैं, तो मरते रहें…।’ ‘जंजीर’ में अंतत: दुनिया की बुराइयाँ नायक को क्रोध और हिंसा की ओर घसीट ले जाती हैं। सजे हुए घर के आकर्षक पर्दे, खूबसूरत बीवी और सांसारिक खुशियाँ उसे रोक नहीं पातीं। फिल्म में नायक को क्रोध आता है और वह बुराई का अंत करता है।

ठीक यही किया था पौराणिक समय में परशुराम ने। जाति विशेष के राजाओं का कु-संस्कार देखिए। ऋषि को दान देने की परंपरा है, लेकिन वे तो ऋषि को ही लूट बैठे। शत्रुता परशुराम से थी, लेकिन पिता जमदग्नि को न केवल मारा, बल्कि उनका सिर भी साथ ले गए। व्यवस्था या राजसत्‍ता कितनी भ्रष्‍ट और पतित हो चुकी थी, यह राजाओं और राज-पुत्रों के कुकृत्यों में स्पष्‍ट दिख रहा था। हाँ, लड़ाई व्यक्‍तिगत भी है, लेकिन है तो सिस्टम या व्यवस्था के विरुद्ध ही। त्रेता युग में व्यवस्था को बदलने का बीड़ा परशुराम ने उठाया था। खूब हिंसा हुई, क्योंकि वह जरूरी हो गई थी। परशुराम केवल अपने लिए नहीं, सबके लिए लड़े थे। परशुराम ने लड़कर जो क्रांति की थी, उसकी कोख से ही मर्यादापुरुषोत्‍तम राम ने अवतार लिया था। रामराज्य का वैभव परशुराम की हिंसा के बाद ही संभव हुआ। विष्णु के सातवें अवतार राम ने धनुष तभी उठाया, जब शांति के तमाम मार्ग बंद हो गए। आठवें अवतार कृष्ण ने तो शांति दूत बनकर कौरवों की सभा में पांडवों के लिए दोनों हाथ जोड़ दिए, बस पाँच गाँव माँगा, लेकिन जब अन्यायी व्यवस्था ने दो टूक इनकार करते हुए शांतिदूत को ही अपमानित कर दिया, तब महाभारत हुआ। परशुराम ने ही राम और कृष्ण जैसे उत्‍तम चरित्रों के लिए मार्ग तैयार किया था।

भारतीय सिनेमा को क्रोध के उस दौर से गुजरना ही था। वह दौर गुजरा, तभी भारतीय सिनेमा के नए-नए रूप सामने आए। भारतीय सिनेमा ने कटु यथार्थ को देखना शुरू किया। उस दौर में अमिताभ और उनकी हिंसा प्रधान फिल्मों की आलोचना भी खूब हुई। आज भी अमिताभ लगभग अपने हर साक्षात्कार में इस सवाल का सामना करते हैं। यह तक बता दिया जाता है कि फिल्मों में हिंसा अमिताभ के जरिये ही मुखर हुई। उनके पहले हिंसा और मारधाड़ वाली फिल्मों को स्टंट फिल्म कहा जाता था और जिसके पुरोधा अभिनेता पहलवान दारा सिंह (1928-2012) थे। मुख्‍यधारा की फिल्मों में हिंसा को यथोचित जगह अमिताभ बच्चन के बाद ही मिलनी शुरू हुई और अलग से स्टंट फिल्मों का चलन बंद हुआ।

एक प्रश्‍न हमेशा किया जाता है कि समाज ने क्रोध को इतना क्यों पसंद किया। वास्तव में फिल्मों में हिंसा या क्रोध की भावना बाद में आई, भारतीय परंपरा में तो शिव, परशुराम के अतिरिक्त महर्षि विश्‍वामित्र और अश्‍वत्‍थामा को भी क्रोधी नायक के रूप में याद किया जाता है। विश्‍वामित्र तो ऋषि होते हुए भी संसाधन, सम्मान के लिए युद्ध किया करते थे। अश्‍वत्थामा का बचपन अभाव में बीता था, द्रोणाचार्य के पुत्र थे, इतना अभाव था कि माँ आटे में पानी मिलाकर दूध बताती थीं और पिला देती थीं। जब एक बार कौरवों ने अश्‍वत्थामा को असली दूध पिलाया और अपने साथ रखकर सम्मान दिया, तो अश्‍वत्थामा हमेशा के लिए कौरवों के साथ जुड़ गया। कर्ण में भी जाति और उपेक्षा को लेकर बहुत क्रोध था, कौरवों ने जब सम्मान दिया, तो कर्ण का क्रोध हमेशा के लिए पांडवों की दिशा में मुड़ गया। महाभारत में तो भीष्म, द्रोणाचार्य जैसे महान महारथी भी एंटी-हीरो में बदल गए, खलनायकों की ओर से युद्ध करने लगे, बुराई और असत्य की ओर से लड़ने लगे।

अश्‍वत्थामा को एक बार इतना क्रोध आया कि युद्ध नीति को ताक पर रखकर उसने पाँच पांडव पुत्रों को सोते हुए में ही मार डाला। इसके लिए कृष्ण से दंड भी मिला, सिर पर रिसते हुए घाव के साथ चिरंजीवी होने का श्राप। ऐसे अनेक नायक या प्रति-नायक पौराणिक आख्‍यानों रहे हैं, जिन्हें भारतीय जनमानस बार-बार पढ़ता रहा है। अत: जब गांधी जी की अहिंसक नीतियों के समर्थक भारत में अमिताभ की फिल्मों ने नए रूप में हिंसा को परोसा, तो लोगों के लिए यह बहुत नई बात नहीं थी। हिंसा और क्रोध को कहने का ढंग चूँकि जोरदार था, इसलिए हर उम्र के दर्शक वर्ग ने इसे बहुत पसंद किया और एक तरह की राहत का भी अहसास किया गया।

एंगर = क्रोध = रौद्र

संसार में नाट्यशास्त्र के पितामह भरत मुनि ने आठ रस बताए हैं – शृंगार, हास्य, रौद्र, करुण, वीर, अद्भुत, वीभत्स और भयानक। कुछ विद्वानों ने इसमें शांति रस को भी जोड़कर रस सख्‍या को नौ बताया है। आगे कुछ विद्वानों ने दो रस और जोड़ दिए वात्सल्य रस और भक्‍ति रस। भारतीय सिनेमा में शृंगार, हास्य, करुण, वीर, अद्भुत, वात्सल्य और भक्‍ति इत्यादि रसों का प्रयोग बहुत होता आया था। अमिताभ के बाद भारतीय फिल्मों में रौद्र, वीभत्स और भयानक रस के लिए जगह तैयार हुई।

रौद्र को भरत मुनि ने असुरों के हिस्से का माना है। रौद्र को दुर्गुणों में गिना जाता रहा है। भारतीय परंपरा में यह माना गया है कि व्यक्‍ति को अपने रौद्र या क्रोध पर काबू करना चाहिए। क्रोध, मद, लोभ से बचना चाहिए। सामान्य मानव के लिए रौद्र को सही नहीं माना गया। वीरता अपनी जगह है, वीरता में विद्वता व बल आवश्यक है, किन्तु इसमें रौद्र को आवश्यक नहीं माना गया। जरूरी नहीं कि रौद्र वाला व्यक्ति वीर भी हो। वीरता को पुरुषों या मानवों का भूषण बताया गया है, किन्तु रौद्र को कभी भूषण नहीं माना गया। रौद्र विशेष परिस्थितियों में शिव का भूषण है और सामान्य परिस्थितियों में असुरों या राक्षसों का अवगुण। मद अर्थात लोभ से भी रौद्र उत्पन्न होता है। हालांकि, भारतीय शास्त्र सामाजिक लोगों के लिए रौद्र को वर्जित नहीं मानते। परिस्थितियाँ किसी सामाजिक व्यक्ति को भी रौद्र के लिए विवश कर सकती हैं, इसमें कुछ गलत नहीं है। अमिताभ के सिनेमाई रौद्र या क्रोध को परिस्थितियों के संदर्भ में ही देखना होगा। यहाँ क्रोध भले नाटकीय है, लेकिन अकारण नहीं है। 1970 के दशक में भारतीय फिल्मों में हिंसा के जो प्रयोग शुरू हुए, वो अकारण नहीं थे, क्रोध की प्रस्तुति अकारण नहीं थी। देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक निराशा की वजह से ही क्रोध का जन्म हुआ था, जिसे तब के समाज ने सहज ही स्वीकार किया। अमिताभ ने क्रोध के प्रदर्शन से जो रास्ता तैयार किया, उस पर अनेक एक्शन हीरो आगे बढ़े।

(अपनी पुस्तक ‘ सिनेमा हिन्दुस्तानी’ के अमिताभ बच्चन पर केंद्रित अध्याय ‘हम जहां खड़े हो जाते हैं’ से)

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