बाबा साहेब को फिर समझने की जरूरत

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(बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की पुस्तक – पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन पढ़ने के बाद)
लाहौर में मुस्लिम लीग ने साल 1940 में पाकिस्तान का प्रस्ताव रखा। देश भर में दंगे हुए, पर मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग की और कांग्रेस ने पाकिस्तान का विरोध किया। राजनीति तेज हो गई, पर बाबा साहेब ने पाकिस्तान के विषय पर पूरी गंभीरता से विचार करने का मन बनाया। महाराष्ट्र में अहमदनगर है, जिसका नाम अब अहिल्यानगर हो गया है, उसके पास सावेडी गांव में बाबा साहेब ने अक्तूबर के महीने में कुल 27 दिनों में इस पुस्तक की रचना की थी – पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन। 450 पेज से ज्यादा की यह किताब, वह प्रतिदिन करीब 15 से 20 पन्ने औसतन लिखते थे। रावसाहब पटवर्धन के बंगले में आराम करने के नाम पर आए थे, पर दिन-रात लेखन में जुटे रहते थे। मुंबई लौटकर उन्होंने तमाम आंकड़ों की मदद से किताब को मुकम्मल रूप दिया।
इस पुस्तक की कुछ विशेषताओं पर हमें गौर करना चाहिए।
1 – डाटा की ताकत
सांप्रदायिक आधार पर जितने भी डाटा हो सकते थे, सब बाबा साहेब ने अपनी किताब में दिए हैं। सांप्रदायिक, आर्थिक, जातिगत। आज के समय में बहुत सारी बातें बिना डाटा के होती हैं, पर जब बाबा साहेब डाटा के साथ बात करते हैं, तो वह गांधी जी को भी पसंद आता है और मोहम्मद अली जिन्ना को भी। पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन – पुस्तक से लोगों को शिकायत हो सकती है, पर उसमें दिए गए डाटा आज भी बड़े काम के हैं। यह पुस्तक एक प्रेरणा है।

2 – तथ्य की ताकत
पुस्तक में न केवल मुस्लिमों से जुड़े तथ्य, बल्कि हिन्दुओं से जुड़े तमाम तथ्य रखे गए हैं। चर्चा इस बात पर गंभीर होती है कि क्या भारत एक हिन्दू राष्ट्र है?
वह वीर सावरकर पर भी विस्तार से रोशनी डालते हैं और उनके एजेंडे की समीक्षा करते हैं। वीर सावरकर ने भी हिंदू प्रभुत्व वाले भारत में मुस्लिमों के लिए अधिकार रखे थे, ऐसा नहीं है कि सावरकर मुस्लिमों के खिलाफ थे। उनका मकसद था हिन्दू स्वराज।
यही नहीं, बाबा साहेब आगे बढ़ते हुए सावरकर की राजनीति को कांग्रेस की राजनीति से बेहतर बताते हैं। कम से कम सावरकर इस बात पर निश्चिंत हैं कि मुस्लिमों को क्या देना है, पर कांग्रेस अंत तक फैसला नहीं कर पाती है कि मुस्लिमों को कितना देना है।
हालांकि, प्रशंसा के बावजूद बाबा साहेब ने सावरकर को घेरा है – सावरकर मुस्लिमों को स्वायत्त अधिकार देने के साथ ही अलग कौमी ध्वज देने तक सहमत हैं, पर अलग राष्ट्र देने को तैयार नहीं हैं, जबकि वह हिन्दू और मुस्लिम को अलग-अलग मानते हैं।
हिन्दुओं और खासकर ऊंची जाति के हिन्दुओं की वह जगह-जगह आलोचना करते हैं। उनके वर्चस्व पर प्रहार करते हैं, पर मुस्लिमों की कमियों को भी कदापि नहीं छोड़ते हैं। वह यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान का विरोध ऊंची जाति के हिंदू ही कर रहे हैं।
यह किताब मुस्लिमों पर उनके कम भरोसे का भी इजहार करती है।
वह इशारा करते हैं कि आप झुकते चले जाएंगे और वे झुकाते चले जाएंगे। थोड़े मुस्लिम भी भारत में रहे, तो सांप्रदायिकता की समस्या बनी रहेगी, फिर भी बड़े पैमाने पर मुस्लिम राष्ट्र के अलग हो जाने से भारत में अपेक्षाकृत ज्यादा शांति की संभावना रहेगी।
हम आज यह देख सकते हैं कि मजहब के आधार पर पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलग राष्ट्र होने के बावजूद, वहां भारत की तुलना में कम शांति है। भारत में राजनीतिक स्थायित्व है, जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश में लोगों को लोकतंत्र के लिए भी जूझना पड़ता है।

पाकिस्तान का नाम कैसे पड़ा?
आंबेडकर इशारा करते हैं कि पाकिस्तान नाम कैसे अस्तित्व में आया। हिन्दू समाज मुसलमानों को म्लेछ कहता था, उनसे छुआछूत रखता था, इससे भी बंटवारे को बल मिला और मुसलमानों ने एक तरह से बदले की मानसिकता के साथ अपने देश का नाम पाक-स्थान रखा।

गांधी जी पर विचार
वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी जी के अथक प्रयासों को जगह-जगह खोखला सिद्ध करते हैं। बार-बार कहते हैं कि मुस्लिम नहीं मानने वाले और अगर आप उन्हें पाकिस्तान नहीं देते हैं, तो आपके पास उसका जो विकल्प है, वह तो और भी बुरा है।

3 – तर्क की ताकत
इस किताब में बाबा साहेब ने सवालों के ऐसे-ऐसे घेरे बनाए हैं कि जिनसे आज भी यह देश निकल नहीं पाया है। वह पाकिस्तान के गठन और उसके विचार के घटियापन की ओर कामयाब इशारा करते हैं। उनकी यह किताब साफ कर देती है कि अगर पाकिस्तान ने अपने यहां के अल्पसंख्यकों का ध्यान नहीं रखा, तो मुस्लिम राष्ट्र या कौम का उसका दावा घटिया साबित होगा। यह माना जाएगा कि पाकिस्तान बनाने के पीछे कोई बड़ा सपना नहीं था, बल्कि यह एक घटिया नफरत भरी सोच का नतीजा था।

इस पुस्तक की कुछ व्यंजनाएं हैं, जिन पर आज हमें सोचना चाहिए।
1 – अगर हिंदू चाहें भी तो मुस्लिमों को अलग करके चैन से नहीं रह सकते। अत: अंतत: मेलभाव का रास्ता ही श्रेष्ठ है।
2 – बाबा साहेब की मजबूत उपस्थिति में लिखा गया भारत का संविधान ही हमारी असली ताकत है, उसमें आवश्यकता अनुसार हमें परिवर्तन करते रहना चाहिए।
3 – परिवर्तन ऐसे किए जाएं, ताकि हिंदू-मुस्लिम के बीच का भेद मिटता चला जाए। बाबा साहेब ने भी एक सपना देखा था कि कभी हम समान नागरिक संहिता बना पाएंगे।
4 – लड़ने में अपनी ऊर्जा गंवाने के बजाय हिन्दुस्तानियों को अपनी लकीर मोटी करने पर ध्यान देना चाहिए। अंतत: पूरे समाज का समावेशी विकास ही समाधान है।
5 – सांप्रदायिक विचारकों को धीरे-धीरे किनारे करने की जरूरत है और ऐसे विचारकों को आगे लाने की जरूरत है, जो भारत भूमि पर बेहतर जीवन को संभव बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
6 – यह हिंदुओं के प्रभुत्व वाला राष्ट्र है, इसमें कोई दोराय नहीं है, पर हिंदुओं को अपनी सामाजिक कमियों, भेदभाव को मिटाने पर ज्यादा काम करना चाहिए, ताकि यहां रहने वाले लोगों को जातियों के नाम से नहीं, बल्कि सक्षम भारतीय नागरिक के रूप में पहचाना जाए।
7 – अब गांधी जी, सावरकर, जिन्ना से आगे बढ़ जाने की जरूरत है, यहां तक कि बाबा साहेब से भी आगे बढ़कर सोचने की जरूरत है। यह बात इस किताब को पढ़ते हुए महसूस होती है।
8 – एक सुखद स्वप्न को साकार करने की दिशा में भारत का विभाजन हुआ था, अब विभाजन असंभव है। हमारा आर्थिक, सामाजिक और चारित्रिक विकास ही भविष्य में किसी भी प्रकार के विभाजन को टाल सकेगा और हमें इस ओर बढ़कर बाबा साहेब के सपने को साकार करना चाहिए।

9 – यह पुस्तक भारत के प्रति बाबा साहेब के प्रेम की प्रस्तुति है। बाबा साहेब का अपने देश के प्रति अटूट प्रेम भावविभोर कर देता है, पर वह अपनी भावनाओं का प्रदर्शन तथ्यों, तर्कों और प्रश्नों के साथ करते हैं।

10 – बाबा साहेब को पढ़ते हुए लगता है कि उन्हें भारत के लोगों ने सही ढंग से या पूरी तरह से समझा नहीं। हम बाबा साहेब का नाम लेते हैं, पर हमने उनसे कितना सीखा। बाबा साहेब ने ही कहा था, शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पीएगा, वो दहाड़ेगा।

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