असली और अच्छे सिनेमा को बचाना होगा : अडूर गोपालकृष्णन

साक्षात्कार / अडूर गोपालकृष्णन / फिल्मकार

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भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहेब फाल्के से सम्मानित अडूर गोपालकृष्णन दुनिया के बेहतरीन फिल्म निर्देशकों में शुमार हैं। इनकी पहली फीचर फिल्म स्वयंवरम  50 वर्ष पहले प्रदर्शित हुई थी। तब से महज 12 फिल्में, लेकिन 16 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उन्हें अलग श्रेणी में खड़ा कर देते हैं। वह बदलते दौर को लेकर सजग और उम्मीदों से सराबोर हैं। उनकी पहली फीचर फिल्म स्वयंवरम 1972 में प्रदर्शित हुई थी। उसे पहले कोई भी सिनेमाघर में लगाने को तैयार नहीं था और न यह फिल्म आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय फिल्म सम्मान के लिए भेजी गई थी, लेकिन जब इस फिल्म पर अनेक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की वर्षा हुई, तो यह फिल्म सिनेमा घरों में लौटी और खूब चली थी। वह पिछले दिनों स्वयंवरम के स्वर्णजयंती उत्सव में नई दिल्ली आए थे। पेश है, उनसे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में सुबह 5 दिसंबर 2022 को हुई ज्ञानेश उपाध्याय की बातचीत के प्रमुख अंश..

ज्ञानेश – आपकी प्रसिद्ध फिल्म स्वयंवरम को पचास साल हो गए। वह आपकी पहली फिल्म थी, लेकिन इतनी ख्याति के बावजूद आप पिछले पचास साल में महज 12 फिल्में ही दे पाए हैं?

अडूर : यह मत पूछिए कि मैं अब तक केवल 12 फिल्में बना पाया। आप यह पूछिए कि मैंने 12 फिल्मों का निर्माण कैसे कर लिया। अच्छा सिनेमा बनाना मेरे लिए कोई आसान काम तो है नहीं। आमतौर पर लोगों के बीच आइडिया ऑफ सिनेमा अलग होता है और मेरा सिनेमा बिल्कुल अलग है। मेरे आइडिया ऑफ सिनेमा को समय चाहिए। मैं चकित हूं, अपने आइडिया ऑफ सिनेमा के साथ मैं 12 फिल्में बना पाया।

ज्ञानेश – डाक्युमेंट्री और वृत्तचित्रों के प्रति आपका प्रेम विशेष है, आपने फिल्मों से ज्यादा वृत्तचित्रों को निर्माण किया है?

अडूर : हां, संख्या में मेरे द्वारा बनाए गए वृत्तचित्र ज्यादा हैं। एक फीचर फिल्म में ज्यादा आजादी होती है, जबकि वृत्तचित्र ज्यादातर बनवाए जाते हैं, उनका तय लक्ष्य या प्रयोजन होता है। मैं अपने द्वारा निर्मित फीचर फिल्मों में ही ज्यादा समर्पित हूं।

ज्ञानेश – पचास साल पहले केरल में आपने बहुत मुश्किलों के बीच स्वयंवरम का निर्माण किया था, आज वहां क्या स्थिति है?

अडूर : स्थितियां आज भी वैसी ही हैं। फिल्म बनाना आसान नहीं है। अच्छी पटकथा से लेकर पैसे जुटाने तक मुश्किलें आती हैं। हां, इतना जरूर है कि पैसे का होना या न होना अब मुझे प्रभावित नहीं करता है। मेरा पूरा फोकस अच्छा सिनेमा बनाने पर ही रहा है।

ज्ञानेश – एक आरोप यह भी लगता है कि आप फिल्म उत्सवों और पुरस्कार के लिए फिल्म बनाते हैं?

अडूर : नहीं, मैं ऐसा नहीं करता। मैं केवल अच्छा सिनेमा बनाता हूं। समस्या शिक्षा के साथ है। आपको पढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे केवल पाठ्यपुस्तक ही पढ़ें। कला या अच्छे सिनेमा की समझ के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है।

ज्ञानेश – केरल तो बहुत शिक्षित और जागरूक राज्य है, लेकिन केरल में भी व्यावसायिक सिनेमा है और वहां भी अच्छी फिल्मों के निर्माण के लिए संघर्ष करना पड़ता है?

अडूर : व्यावसायिक सिनेमा वास्तव में धोखे की तरह है। उत्पाद की तरह है। मैं इसका पक्षधर नहीं हूं, यह बड़ा अंतर है।

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ज्ञानेश – सिनेमा में मनोरंजन का क्या मूल्य है?

अडूर : अच्छा सिनेमा व्यापक है। यह सोचना गलत है कि अच्छे सिनेमा में मनोरंजन नहीं होता। अच्छा सिनेमा भी आपका मनोरंजन करता है, लेकिन उस बकवास ढंग से नहीं करता, जैसे व्यावसायिक सिनेमा करता है। अच्छा सिनेमा ऊपर-ऊपर ही नहीं रह जाता, आपके दिल में गहरे उतरकर खुशी देता है।

ज्ञानेश – लेकिन अच्छे सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा के अंतर को कैसे मिटाया जाए?

अडूर : व्यावसायिक सिनेमा में आत्मा नहीं है। धोखा है। यह सिनेमा लोगों को मूर्ख मानकर चलता है। वह नहीं चाहता कि आप विचार करें या कुछ सोचें।

ज्ञानेश – क्या आपको कभी हिन्दी फिल्मों के लिए भी प्रस्ताव मिले?

अडूर : नहीं, कभी नहीं मिला। मेरी हिन्दी उतनी अच्छी नहीं है, मेरी मलयालम ज्यादा अच्छी है।

ज्ञानेश – 1970 के दशक में स्वयंवरम के बाद एक दौर आया था, जब लगा था कि बेहतर सोचने-समझने वाले सिनेमा का समय आएगा? केरल जैसे शिक्षित राज्य से तो कुछ ज्यादा ही उम्मीद थी। हिन्दी में ही समांतर सिनेमा का एक समय था, वह भी आगे नहीं बढ़ा, आखिर हुआ क्या?

अडूर : मैं बताना चाहूंगा कि हिन्दी में भी अभी अच्छा सिनेमा बन रहा है। बॉलीवुड तो विचित्र व्यावसायिक उद्योग है, लेकिन वहां भी अच्छा सिनेमा और उसे बनाने वाले रहे हैं। मुख्यधारा के दर्शकों को उनके बारे में पता नहीं है।

ज्ञानेश – केरल और देश में सिनेमा का भविष्य कैसा है?

अडूर : धीरे-धीरे अच्छे बदलाव हो रहे हैं। युवाओं में अच्छी फिल्में बनाने को लेकर ललक है। हां, उन्हें ज्यादा मेहनत और तैयारी करने की जरूरत है, ताकि वो ज्यादा दिलचस्प फिल्में बना सकें। ऐसा हो भी रहा है। मैं भविष्य के सिनेमा को लेकर बहुत आशान्वित हूं।

ज्ञानेश – पिछले पचास सालों में देश के निर्माण में सिनेमा का क्या योगदान आप देखते हैं?

अडूर : दरअसल, बदलाव का श्रेय सिनेमा को नहीं देना चाहिए। यह सोचना सही नहीं है कि सिनेमा कुछ बदल सकता है, सिनेमा का काम है जागरूक बनाना। सिनेमा आपको केवल सचेत कर सकता है। जब कोई अच्छी फिल्म आप देखते हैं, तो जीवन और अन्य अनेक चीजों के बारे में ज्यादा जागरूक होते हैं। शायद जागरूक होने के बाद बदलाव की शुरुआत होती होगी।

ज्ञानेश – आपकी ऐसी कौन सी फिल्म है, जिसके बारे में आपको लगता है कि दर्शकों को जरूर देखनी चाहिए?

अडूर : मेरी सभी 12 फिल्मों को देखना चाहिए। मैं फिल्में फिजूल ही नहीं बनाता। मैं अपने दर्शकों को बुद्धिमान मानता हूं, वो मूर्ख नहीं हैं। मैं उन्हें सम्मान के साथ देखता हूं। पांच-पांच, छह-छह साल लगाकर मैंने एक-एक फिल्म का निर्माण किया है। मैं कोई हर साल फिल्में नहीं बनाता। सत्यजित राय ने एक बार मुझसे पूछा था, आप हर साल एक फिल्म क्यों नहीं बनाते हैं। आप ज्यादा फिल्में बनाएंगे, तो लोग आपके काम के बारे में ज्यादा जान पाएंगे। मैंने भी कोशिश की, लेकिन कर नहीं पाया। मैं शायद उतना उत्पादक या प्रोडक्टिव नहीं हूं। मैं अपनी फिल्म पर तफसील से काम करता हूं। एक-एक शब्द लिखने से लेकर प्रदर्शन तक। किसी भी फिल्म के विचार या आइडिया के साथ मैं लंबे समय तक जीता हूं और तब उसे पर्दे पर साकार करता हूं।

ज्ञानेश – राज कपूर और सत्यजित राय के नाम की आपके साथ बड़ी चर्चा होती है, आपके इनके बारे में क्या सोचते हैं?

अडूर : मैं इनके काम पसंद करता हूं। मुझे संदेह नहीं है, कला और व्यावसायिक पक्ष, दोनों पर वह असर डालते है। मैंने उनकी फिल्मों का आनंद लिया है। महान फिल्मकार सत्यजित राय के बारे में मेरे विचार की जरूरत ही नहीं है। मैं उनके काम का बड़ा मुरीद रहा हूं। उनके साथ मेरा काफी समय बीता है।

ज्ञानेश – आप अपनी फिल्मों में कला और समाज को साथ लेकर कैसे चल रहे हैं?

अडूर : कला को सामाजिक मुद्दों से अलग नहीं कर सकते। हम दिलचस्प तरीके से सामाजिक मुद्दों को उठाते हैं, लोगों की रुचि बढ़ जाती है कि हम क्या करने वाले हैं। फिल्म में जो होता है, उससे लोग खुद को या अपनी जिंदगी को जोड़ लेते हैं। लोगों को जोड़ लेने वाला सिनेमा ही लोकप्रिय होता है। कुल मिलाकर, आप कला को समाज से अलग नहीं कर सकते। कला बहुत मूल्यवान है।

ज्ञानेश – अब ओटीटी, वेब सिनेमा इत्यादि का भी दौर चल रहा है, इनका दर्शक वर्ग भी तेजी से बढ़ रहा है, इस बदलाव के बारे में आप क्यों सोचते हैं?

अडूर : मैं उसके बारे में बात नहीं कर सकता। मेरे लिए सिनेमा बड़े पर्दे पर बड़े अंधेरे हॉल में देखने की चीज है। ‘लार्जर देन लाइफ इमेज’ का अपना महत्व है। यह असली सिनेमा जादू की तरह है। जो आप अपने मोबाइल या घड़ी बराबर यंत्रों पर देखने लगे हैं, उसे बंद कीजिए।

ज्ञानेश – वैसे हर दौर में कला प्रदर्शन का ढंग बदलता है? नए दौर में बड़े सिनेमा घरों में जाने से लोग अब बचने लगे हैं।

अडूर : जो आप मोबाइल पर देखेंगे, वह सिनेमा ही नहीं है। सिनेमा तो बड़े पर्दे पर देखने के लिए ही बनाया जाता है। बड़े पर्दे पर सिनेमा देखना एक सामाजिक गतिविधि है। लोग साथ मिलकर कुछ अच्छा देखते हैं, उससे जुड़ते हैं। मोबाइल या छोटे स्क्रीन पर कुछ देखना तो आपको एक छोटी सी जगह पर सीमित कर देता है। जो दिख रहा है, उसे केवल आप देख सकते हैं, वह सामाजिक गतिविधि नहीं रह जाता है। आप सच्चे सिनेमा की आवाज, रोशनी, प्रभाव से वंचित हो जाते हैं।

ज्ञानेश – समय बदल गया है। आज क्या यह एक हठ नहीं है कि सिनेमा हम केवल बड़े स्क्रीन पर ही दिखाएंगे?

अडूर : वेब सिनेमा वास्तव में असली सिनेमा की हत्या कर देगा। इसमें कोई संदेह नहीं है। अगर ऐसा होता है, तो बहुत त्रासद होगा। मुझे आशा है, असली सिनेमा बचेगा। हो सकता है, सिर्फ मोबाइल पर देखने के लिए ही कुछ बनाया जाने लगे, लेकिन मुझे इस पर यकीन नहीं है। शायद मैं पुराने स्कूल का फिल्मकार हूं। मेरे लिए असली सिनेमा पवित्र कला है। असली सिनेमा जो प्राप्त कर सकता है, वहां तक कोई दूसरा कथित माध्यम कभी पहुंच भी नहीं सकता। सच तो सच ही है, कभी बदल नहीं सकता। आप सच देखते-खोजते रहिए, तो असली सिनेमा हमेशा रहेगा।

ज्ञानेश – स्वयंवरम का समाज अब नहीं रहा, क्या आप फिर इस कालजयी फिल्म को बनाना चाहेंगे?

अडूर : 1972 में स्वयंवरम आई थी। उस वक्त जो फिल्म मैंने बनाई, उससे बेहतर बना नहीं सकता था। उस फिल्म को अब फिर बनाना बहुत मुश्किल है। जब मैंने इस फिल्म का निर्माण किया, तो केवल केरल समाज ही नहीं, भारतीय समाज मेरी दृष्टि में था। मेरी इच्छा रही कि जो मैं बनाऊं, उसे केवल केरल या भारत के लोग ही नहीं, पूरी दुनिया के लोग देखें और महसूस कर सकें। धरती पर जो मानव जीवन है, उसमें बहुत कुछ साझा है। अच्छा सिनेमा सबको समान रूप से छूने की कोशिश करता है।

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ज्ञानेश – क्या आपके काम या जीवन में कुछ ऐसा रह गया है, जिसे ठीक से देखा न गया हो, जिसकी चर्चा न हुई हो, जो लिखा न गया हो?

अडूर : सबकुछ टेबल या कुर्सी की तरह नहीं होता है। टेबल या कुर्सी तो सभी को एक ही तरह से दिखते हैं। उनका कोई सामाजिक या बौद्धिक कोण नहीं होता है, जबकि कोई जीवन या कोई कृति, सबके लिए अलग-अलग मायने रखती है। किसी को देखना व्यक्ति की समझ पर निर्भर करता है। व्यावसायिक सिनेमा सबको एक समान भी लग सकता है, लेकिन अच्छा या गुणवत्तापूर्ण सिनेमा का प्रभाव अलग-अलग दर्शक में अलग-अलग होता है। समय और परिस्थिति से बड़ा अंतर पैदा होता है। मान लीजिए, किसी उपन्यास को मैंने बचपन में स्कूल के दिनों में पढ़ा था और आज उसी उपन्यास को फिर से पढ़ूं, तो मुझे कुछ अलग लगेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हमारी समझ या दृष्टि में हमारे अनुभव लगातार शामिल होते रहते हैं।

ज्ञानेश – आपको लंबा समय हो गया, कई लोग आपका साथ छोड़ गए होंगे, किनकी याद आपको ज्यादा आती है?

अडूर : मुझे पत्नी की बहुत याद आती है। मैं अपने दोनों भाइयों की कमी महसूस करता हूं। बहुत पहले मैंने अपनी मां को खोया था, उनकी कमी भी हमेशा महसूस करता हूं। फिल्मकारों में सबसे ज्यादा मृणाल सेन और सत्यजित राय याद आते हैं।

(इस साक्षात्कार के एक हिस्से का प्रकाशन हिन्दुस्तान में 14 दिसंबर के अंक में हुआ था। साक्षात्कार की भाषा अंग्रेजी थी और इस दौरान अंग्रेजी पत्रकारिता के वरिष्ठ पत्रकार साथी वी के चेरियन भी मौजूद थे, जो अडूर के करीबी पत्रकारों में गिने जाते हैं।)

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