मार्था ग्राहम, प्रसिद्ध नृत्यांगना
सच्ची लयकारी बाहर से नहीं आती, अंदर से उठती है और नृत्य का मन होता है। उस लड़की का मन भी लय से सराबोर था। अमेरिका के सांता बारबरा, कैलिफोर्निया में रहने वाला उसका परिवार लगभग नियमित चर्च जाता था। गीत-संगीत के सीमित अवसर थे और उस लड़की को अक्सर ऊबन होती थी। मां चर्च की सभा में मगन हो जातीं और वह लड़की चर्च के गलियारे में नाचने लगती थी। ज्यादातर लोग टोकते थे, सराहने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। माता-पिता भी समझाते थे कि नाचना उतना अच्छा नहीं। पढ़ाई में भी वह अच्छी थी, पर उस मन का क्या करती, जो घड़ी-घड़ी नृत्य में लग जाता था?
खैर, न समय रुकता है, न उम्र। वह भी सोलह के करीब हुई। एक बार माता-पिता नृत्य के कार्यक्रम में ले गए। तब प्रसिद्ध नृत्यांगना रूथ सेंट डेनिस के नृत्य प्रदर्शन खूब देखे जाते थे। खास यह कि उस दिन रूथ राधा रानी बन नृत्य कर रही थीं। ऐसा नृत्य उस लड़की की कल्पना से परे था। एक भारतीय देवी नृत्य कर रही है! घाघरा गोल-गोल लहरा रहा है और उस पर चमकते बूटे-सितारे देख लगता है, चांदनी रात का आसमान लय में लहरा रहा है। मानो पैरों की उंगलियों ने पूरे शरीर को बांध रखा हो और हाथों की एक-एक उंगली लयबद्ध कुछ कहना चाहती हो। मुखमुद्रा ऐसी, मानो प्रेम पगे भावों ने स्वयं शृंगार किया हो और केश ऐसे सजाया है, मानो कोई मंदिर हो।
रूथ कृष्ण प्रेम में पगली बन नाच रही थीं और उन्हें देख रही लड़की स्तब्ध थी। रोम-रोम से हर्ष ध्वनि निकल रही थी, बस ऐसे ही नाचना है। पहली बार लगा कि नाचना कोई दिखावा नहीं है। यह होता है, तो स्वाभाविक ही अंदर से फूटता है। उस लड़की ने उसी पल ठान लिया, हर हाल में नर्तकी बनना है और सीखना भी इन्हीं से है, जो राधा बन नाच रही हैं। हिंदू मंदिरों में ऐसे ही नाचते हैं और नाचना भी ईश्वर की आराधना है।
हालांकि, नर्तकी बनना आसान नहीं था। माता-पिता कट्टर प्रेस्बिटेरियन थे, मंदिर नृत्यों से बहुत कम इत्तेफाक रखते थे। उन्होंने बेटी को खूब समझाया कि वह पढ़ाई पर ध्यान लगाए, स्कूल खत्म करे और फिर कॉलेज जाए। बेटी भी हठ पर अड़ गई। गुहार लगाई कि स्कूल और पढ़ाई पर कोई आंच न आने दूंगी, बस गरमी की छुट्टियों में सीख लेने दीजिए। अंतत: माता-पिता मान गए और वह पहुंच गई रूथ सेंट डेनिस के स्कूल में नृत्य सीखने। लॉस एंजिल्स में स्थापित वह स्कूल बैले व दुनिया भर की बेहतरीन नृत्य शैलियों का ठिकाना था। खूब मन लगाकर उस लड़की ने सीखा, क्योंकि वह जानती थी कि मन लगाकर पाया हुआ ज्ञान ही टिकता है। वह दिखावे या मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के लिए नाचने लगी थी, किसी संत की तरह भाव में डूबती थी और तब नृत्य की कोई मुद्रा उसके सुंदर, सुगढ़ शरीर पर खिल उठती थी। एक-एक उंगली कुछ बोलने को आतुर हो जाती थी और एक-एक मुद्रा एक-एक वाक्य की तरह व्यंजित होती थी। स्कूल की पढ़ाई पूरी होते ही वह पूरी तरह नृत्य सीखने लगी। जल्दी ही वह प्रशिक्षक बन गईं। पोर-पोर में नृत्य बसने लगा। लोग उन्हें मार्था ग्राहम के नाम से जानने लगे। वह अपने नृत्य और मंडली के साथ पूरी दुनिया में गईं। उनकी मंडली में उस भारत के कलाकार भी होते थे, जहां आज भी राधा रानी की पूजा होती है।
नृत्य की जो यात्रा राधाजी से शुरू हुई थी, उसे ग्राहम मार्था (1894-1991) ने कभी खत्म नहीं होने दिया। संयोग देखिए, उन्हें लंबा जीवन मिला। उनमें सुंदर दैवीय भाव सदैव रहता था। वह बार-बार कहती थीं कि नृत्य आत्मा की छिपी हुई भाषा है। अगर आप अच्छा नृत्य नहीं कर सकते, तो किसी को फर्क नहीं पड़ता। आप उठिए और सिर्फ अच्छा नृत्य कीजिए। महान नर्तक इसी वजह से महान होते हैं। लोग अक्सर उनसे पूछते थे कि उन्होंने डांसर बनना क्यों चुना? तो वह जवाब देती थीं, मैंने नहीं चुना, बल्कि मुझे एक नर्तकी बनने के लिए चुना गया।
उस दिन रूथ अगर राधा बन नहीं नाचतीं, तो शायद नृत्य की दुनिया में मार्था ग्राहम का अवतरण नहीं होता और न अमेरिकी नृत्य जगत में नृत्य क्रांति का आगाज होता। भौतिकतावादी अमेरिकियों ने मार्था के मार्फत नृत्य को पहली बार ढंग से समझा कि नृत्य शरीर का गीत है, चाहे खुशी हो या दर्द। शरीर वह कह देता है, जो शब्द नहीं कह पाते हैं। नर्तक देवताओं के दूत होते हैं। कहा जाता है, पिकासो का जो प्रभाव पेंटिंग पर है, स्ट्राविंस्की का संगीत पर है और फ्रैंक लॉयड राइट का वास्तुकला पर है, नृत्य पर वैसा ही असर मार्था ग्राहम का है। जब भी दुनिया में आधुनिक लोकप्रिय नर्तकों की कोई सूची बनती है, उसमें दस शीर्ष में मार्था ग्राहम का नाम भी शुमार होता है।
(हिंदुस्तान के वो लम्हा कॉलम में प्रकाशित एक रचना)








