अकीरा कुरोसावा ,मशहूर जापानी फिल्मकार
आपदाएं सिर्फ बाहरी दुनिया में ही नहीं, मन में कहीं गहरे भी घटित होती हैं। हाहाकार सिर्फ ऊपर-बाहर से ही नहीं गुजर जाता, कहीं अंदर भी रगों में बहने लगता है। जो आपदाएं रगों में बहती हैं, वो ताउम्र पीछा नहीं छोड़तीं। वह आपदा भी ऐसी ही थी, जिसे देखने वह किशोर अपने बड़े भाई के साथ गया था। बस चार साल बड़े भैया जितने भावुक थे, उतने ही व्यावहारिक भी। हालांकि, उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी, बमुश्किल 17 के हुए होंगे, लेकिन उनकी सोच उम्र से कम से कम दस साल आगे चल रही थी। आपदा की आंच उन तक भी पहुंची थी, लेकिन उनके घर के आसपास हालात उतने खराब नहीं थे। सुनने में आता था कि बड़े भूकंप ने राजधानी के दो-तिहाई हिस्से को तबाह ही नहीं किया, राख कर दिया है। काश! ऐसा बेरहम भूकंप न आया होता, या भूकंप आया ही था, तो कम से कम आगजनी न होती। 1 सितंबर 1923 का वह दिन चढ़ते हुए दोपहर तक भी नहीं पहुंचा था और ज्यादातर घरों से दोपहर भोजन की खुशबू उठ रही थी। तभी सबकुछ हिलने लगा, लोग भागे। रसोई को भूल गए, तो करीब दस मिनट के तगड़े भूकंप के बाद शहर में जगह-जगह लपटें उठने लगीं। लोगों ने रोते-तड़पते सिर्फ तबाही का मंजर देखा। घर तो उस किशोर का भी कुछ टूटा था, लेकिन उस तक आग नहीं पहुंची थी। बिजली आपूर्ति का प्रश्न ही नहीं उठता था। जब किस्मत में कोरा अंधेरा लिखा हो, तब मोमबत्तियां भी कहां नसीब हो पाती हैं? रोते-बिलखते और भय से कांपते किसी तरह से रात बीती थी। सुबह एक अनुमान हाथ लगा था कि करीब डेढ़ लाख लोग मारे गए हैं या बिला गए हैं।
टोक्यो में एक अफवाह यह भी फैल गई थी कि शहर के कोरियाई निवासी तबाही के लिए जिम्मेदार हैं, तो शहर में कोरियाई लोगों का नरसंहार भी शुरू हो गया था। यह बात नई नहीं है, आपदा कोई भी हो, गंदे लोग अपना हाथ शौक से धोते ही हैं। उनके लिए वह आपदा ही क्या, जो दूसरों को लूटने-मिटाने का मौका न दे। स्याह धन हो या तन या मन, सबकुछ आपदा के समय धुलने-बहने लगता है। घटिया लोग यह भी सोचते हैं कि लोग मर ही रहे हैं, तो लगे हाथ कुछ निजी दुश्मन भी ठिकाने लग जाएं। क्या नई बात है, हम इंसानों की जिंदगी नर्क बनाने के लिए किसी दूसरे ग्रह से जीव भला कब आए हैं?
तो पहले भूकंप, फिर आगजनी और फिर नरसंहार ने झकझोर कर रख दिया था। ज्यादातर हमउम्र लड़के घरों में दुबके हुए थे, लेकिन बड़े भाई ने कहा, चलो, शहर में क्या हुआ है, देख आते हैं। आपदाओं के विस्फोट से कराहते मरते हुए लोगों के शहर का जो मंजर था, वह एहसास कराता था कि दुनिया रहने लायक जगह नहीं है। हर जगह बेजान जिस्मों का अंबार था। स्याह, अधजले जिस्म जगह-जगह पड़े थे। गटर से लेकर नदियों तक में जिस्म बेजान तैर रहे थे। शहर के पुलों पर उनके ढेर थे और एक चौराहे पर तो पूरी सड़क ही जिस्मों के अंबार से जाम थी।
ओह, देखा न गया, तो किशोर ने आंखें दूसरी ओर फेर लीं। तब बड़े भाई ने जोर देकर कहा कि गौर से देखो, जो देखने आए हो। तो मन मारकर देखना पड़ा। दिल जार-जार रो पड़ा, आंखें भर आईं। बड़े भाई ने समझाया, ‘यदि तुम एक भयावह दृश्य की ओर से अपनी आंखें बंद कर लेते हो, तो तुम हमेशा के लिए उससे भयभीत हो जाते हो। अगर तुम हर चीज को सीधे तौर पर देखने लगो, तो डरने की कोई बात नहीं है।’ भाई ने गौर से देखने के लिए प्रेरित ही नहीं, बाध्य भी किया। एक पूरा दिन सब देखते बीता और देखा हुआ वह सब दिल में हमेशा के लिए बस गया। भाई ने उस दिन बता दिया था कि जो सामने है, उसे देखे बिना गुजारा नहीं है। जो लोग मुंह चुराते हैं, वो समस्याओं के समाधान में नाकाम रहते हैं। और जो लोग केवल अच्छा-अच्छा देखना चाहते हैं, उन्हें जगह-जगह मुंह मोड़ते, मुंह चुराते चलना पड़ता है।
भूकंप की उस आपदा को दुनिया में आज भी केंतो महाविनाश या ग्रेट केंतो अर्थक्वेक के नाम से याद किया जाता है। यह तथ्य है कि इसी आपदा ने जापान और दुनिया को एक बेहतरीन फिल्म निर्देशक दिया था। वह किशोर आगे चलकर अकीरा कुरोसावा (1910-1998) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दृश्यों के विस्तार में कैसे जाते हैं, मुश्किल से मुश्किल दृश्य को कैमरे की नजर से कैसे देखते हैं, देखते हुए इंसानियत का कितना महत्व है, यह अकीरा कुरोसावा की करीब 30 फिल्में हमें बहुत बेहतर ढंग से बताती और सिखाती हैं। उनकी बनाई राशोमोन, इकिरू, द सेवन समुराई, थ्रोन ऑफ ब्लड, द हिडन फोर्ट्रेस और डर्सु उजाला जैसी फिल्में संसार की सबसे शक्तिशाली कालजयी फिल्मों में शुमार हैं। उनके देखने का तरीका मिसाल है और हमेशा रहेगा।








