जिन्हें भुला न पाएँगे

स‍िनेमा ह‍िन्‍दुस्‍तानी कि‍ताब में व‍िशेष परि‍शि‍ष्‍ट के लिए यह सामग्री तैयार की गई थी, फि‍ल्‍म व‍िशेषज्ञ सुनील मि‍श्र की सलाह पर इसे क‍िताब से हटा दिया गया है। यहां आनंद लीजिए

कुंदन लाल सहगल

1904-1947

कुंदन लाल सहगल अर्थात के.एल. सहगल भारतीय दर्शकों को व्यापक रूप से प्रभावित करने वाले पहले स्टार अभिनेता थे। उस दौर में अभिनेताओं से यह स्वाभाविक उम्मीद की जाती थी कि वे अपना गीत स्वयं गाएँगे। अपनी शैली में सहगल बहुत अच्छा गाते थे। शास्त्रीय संगीत के दबाव से निकलकर भारतीय सिनेमा ने सुगम संगीत का मार्ग पकड़ना शुरू किया था और इस मार्ग पर पहले महारथी सहगल थे। उन्हें ‘यहूदी की लड़की’ (1932), ‘देवदास (1935), ‘स्ट्रीट सिंगर (1938), ‘सुरदास (1942), ‘तानसेन (1943), ‘शाहजहाँ (1946) के लिए ज्यादा याद किया जाता है। कुल 42 वर्ष का अल्पकालीन जीवन, 15 वर्ष का फिल्मी करियर, कुल 36 फिल्में, 150 के करीब फिल्मी गीत और 50 के करीब अन्य गीतों की विरासत सहगल छोड़ गए। भारतीय सिनेमा के पहले सितारे को शराब ने किस तरह अपने आगोश में लेकर छीन लिया कि उनका जीवन भारतीय सिनेमा संसार में आज भी एक सबक की तरह है। शराब की वजह से कम उम्र में ही उनकी सूरत और सीरत पर असर पड़ गया था। आज के विकसित नजरिये से देखें, तो वे अच्छे अभिनेता नहीं थे। नाटकीय थे, लेकिन उनकी आवाज में एक मध्यम आधार और थोड़ा मीठा-सा तीखापन था, जो श्रोताओं को लुभाता था। आप उनको सुनते हैं, तो प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते हैं। उन्होंने अपने समय और अपनी अगली पीढ़ी के लगभग सभी अभिनेता-गायकों को प्रभावित किया। उन्हें पहले बांगला सिनेमा और कोलकाता में पहचान मिली, लेकिन जब वह 1942 में मुंबई की फिल्मों में स्थापित हुए, तब उनकी ख्याति का खूब विस्तार हुआ। वर्ष 1947 में देश को आजादी मिलने से पहले ही इस सितारे का लोप हो गया। उनके गीत अमर हैं, जिनमें से एक गीत कालजयी है – ‘जब दिल ही टूट गया, तो जी के क्या करेंगे’…लेकिन इससे भी बेहतर उन्होंने इसी फिल्म ‘शाहजहाँ (1946) का एक और गीत गाया है – ‘गम दिए मुस्तकिल कितना नाजुक है दिल…।

योगदान – प्रेरक संगीत प्रतिभा, अभिनय में सहजता-सीधापन, संभ्रांत वर्गों को फिल्म दुनिया में आने के लिए प्रेरित करने वाले, संगीतकारों और गायकों को निखरने और प्रयोग का मौका देने वाले यादगार कलाकार। अपने जीवन से भी उन्होंने दूसरों को सबक दिया।

पृथ्वीराज कपूर

1906-1971

राज कपूर वाले अध्याय में पिता पृथ्वीराज कपूर की चर्चा हम कर चुके हैं। भारत में सिनेमा संस्कृति के एक पितामह के रूप में पृथ्वीराज कपूर को याद किया जा सकता है। उन्हें मरणोपरांत दादा साहेब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पूरी गंभीरता के साथ सिनेमा विधा पर ध्यान देना और उसके साथ ही अपने द्वारा स्थापित पृथ्वी थिएटर कंपनी को समृद्ध करना, ये उनके बड़े योगदान हैं। उस दौर में बहुत कम ऐसे कलाकार रहे, जिन्होंने फिल्मों के साथ-साथ थियेटर में भी समान रूप से काम किया। पृथ्वीराज कपूर अपने समय में सबसे स्मार्ट अभिनेता थे। वे जब फिल्म दुनिया में आए, तो अच्छा दिखने वाले और अच्छे घरों के युवाओं को भी प्रेरणा मिली। पृथ्वीराज कपूर के दौर में ही चंद्र मोहन और श्याम भी ऐसे प्रसिद्ध अभिनेता रहे, जिन्होंने समाज पर असर डाला।

सोहराब मोदी

1897-1984

भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फालके से सम्मानित सोहराब मोदी को व्यवस्थित फिल्म निर्माण, प्रदर्शन और अभिनय के लिए याद किया जाता है। वे अच्छे प्रारंभिक निर्देशकों में गिने गए। ऐतिहासिक फिल्मों के लिए, वीरोचित हाव-भाव, बुलंद आवाज के लिए, रौब प्रदर्शन के लिए सोहराब मोदी हमेशा याद किए जाएँगे। पुकार(1939), सिकंदर(1941), पृथ्वी वल्लभ(1943) उनकी यादगार फिल्में हैं। चूँकि वे नाटक या थिएटर की दुनिया से आए थे, अत: उन्होंने अपने ही अंदाज में भारतीय फिल्मों को धारदार-जोरदार और आकर्षक रूप में प्रस्तुत होना सिखाया। वे नाटकीय नहीं थे, वे पृथ्वीराज कपूर की तरह ही अच्छे अभिनेता थे।

अशोक कुमार

1911-2001

वर्ष 1988 में दादा साहेब फाल्के से सम्मानित हुए अशोक कुमार बेहद प्रभावशाली और सहज अभिनेता थे। ये हिन्दी सिनेमा जगत के पहले कुमार और कमाई के लिहाज से पहले सुपर स्टार भी थे। उनके अभिनय में हम नाटकीयता का लोप देखते हैं। उनका पूरा जोर वास्तविक दिखने पर है। उन्होंने दिलीप कुमार सहित अनेक अभिनेताओं को प्रभावित किया। एक संभ्रांत और सधा हुआ चेहरा, जिस पर भाव सहजता से उभरते थे। उन्होंने कुछ गीत भी गाए हैं। संवाद अदायगी की खास शैली, दादामुनि नाम से ख्यात अशोक कुमार की परिपक्व दुलारती आवाज यादगार है। उन्होंने यह सुनाया कि आवाज के पीछे साँस भी रहती है। बांबे टॉकीज कंपनी में भी उनका बड़ा योगदान रहा। उन्होंने लंबे समय तक चरित्र भूमिकाओं में खुद को साबित किया। वर्ष 1968 में हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में एक कालजयी फिल्म आई थी ‘आशीर्वाद’, जिसमें अशोक कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। चरित्र अभिनेता के रूप में वे अपने बाद जो जगह छोड़ गए, वह आज तक नहीं भरी है और न कभी भर पाएगी। भारतीय सिनेमा उन्हें आज भी खोजता है। उन्होंने 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और टेलीविजन पर भी खूब दिखे। उनकी यादगार फिल्मों में ‘किस्मत’, ‘अछूत कन्या’, ‘महल’, ‘परिणीता’, ‘अफसाना’, ‘ज्वेलथीफ’, ‘आशीर्वाद’, ‘खट्टा-मीठा’, ‘खूबसूरत’ इत्यादि खास हैं। वर्ष 1943 में प्रदर्शित उनकी फिल्म ‘किस्मत’ पहली भारतीय फिल्म है, जिसने कमाई में एक करोड़ रुपये के आंकड़े को पार किया था।

योगदान – नायक के रूप में युवाओं के प्रेरणास्रोत, सहज और संभ्रांत, सहज पहनावा, शहरी पहनावा, सहज अभिनय, अति-नाटकीयता से परहेज, परिवार भाव का विस्तार, सभ्य-शालीन भारतीयता को बढ़ावा, भले मानुष का भाव।

गुरु दत्त

1925-1964

भारतीय सिनेमा की एक सबसे सम्मानित हस्ती अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, नृत्य निर्देशक, सिनेमाई तकनीक और संगीत की गहरी समझ रखने वाले गुरु दत्त की चर्चा हम देव आनंद के अध्याय में कर चुके हैं। मात्र 39 वर्ष की आयु उन्हें मिली और भारतीय सिनेमा में वे अपने पीछे एक बड़ा शून्य छोड़ गए, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हुई है।  

योगदान – बहुमुखी प्रतिभा का महत्व, अच्छे कथा वाचक और प्रस्तुतकर्ता, जीवन की निराशा और भावुकता का वैभव, अच्छे निर्देशक, अच्छे अभिनेता, लाइट इफेक्ट – रोशनी और छाया का कमाल, अच्छी टीम-अच्छा चयन, अच्छे संगीत की समझ, मध्यवर्गीय अपील, कलात्मकता का व्यवसाय तलाशने की कोशिश, अपने जीवन संघर्ष और मौत में भी संदेश।

महिपाल

1919-2005

पौराणिक, ऐतिहासिक, तिलिस्मी फिल्मों के लिए मशहूर महिपाल या महिपाल भंडारी ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। उनकी स्टंट और जादूगरी से भरी फिल्मों को खूब कामयाबी हासिल होती थी। इसी तरह की भूमिकाओं के लिए मशहूर चंद्रशेखर (जन्म 1923) जैसे अभिनेताओं के बीच महिपाल की जगह हमेशा खास रही। उन्हें भगवान राम की भूमिका निभाने के लिए भी खूब याद किया जाता है। 100 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले महिपाल को ‘नवरंग’, ‘पारसमणि’, ‘हनुमान पाताल विजय’, ‘संपूर्ण रामायण’, ‘श्रीगणेश’, ‘अली बाबा चालीस चोर’, ‘अलादीन और जादुई चिराग’, ‘जय संतोषी माँ’ के लिए ज्यादा याद किया जाता है।

योगदान – सुदर्शन छवि का महत्व, धर्म ध्वजा के वाहक, सेकुलर छवि के अभिनेता, मुस्लिम देशों में भी समान रूप से लोकप्रिय, अपनी सीमा को पहचानना, सीमित भूमिकाओं में सफल अभिनय, खूब मेकअप के साथ ड्रामा-अभिनय।

भारत भूषण

1920-1992

भारत भूषण अपने समय के स्टार अभिनेता थे। हिन्दी सिनेमा के सबसे सुदर्शन अभिनेताओं में एक। उन्हें पौराणिक और ऐतिहासिक चरित्रों को पर्दे पर जीवंत करने के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। उनका अभिनय आदर्श होता था। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्मफेयर का दूसरा पुरस्कार उन्हें ‘श्री चैतन्य महाप्रभु’ फिल्म में अभिनय के लिए हासिल हुआ था। उनके स्मार्ट चेहरे के पीछे एक भोलापन था, जिसका उपयोग अधिक हुआ। बाद में यह भोलापन त्रासद पात्रों में खर्च हुआ और वे शानदार हीरो से सामान्य कलाकार में बदलते चले गए। फिल्म निर्माण उतरने का व्यावसायिक फैसला भी नाकाम रहा और वे आर्थिक रूप से टूट गए। लगातार छोटी-मोटी भूमिकाएँ करते रहे। उन्हें ‘बैजू बावरा’ ने बड़ा स्टार बना दिया। 50 से ज्यादा फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारत भूषण की खास फिल्में हैं ‘आनंद मठ’, ‘मिर्जा गालिब’ और ‘बरसात की रात’। भारत भूषण की ही परंपरा में स्टार अभिनेता प्रदीप कुमार(1925-2001) और चंद्रशेखर (1922) को भी याद किया जाता है।

योगदान : थिएटर से सिनेमा तक पौराणिक और ऐतिहासिक चरित्रों में अभिनय के आदर्श। स्मार्टनेस के साथ-साथ त्रासदी की भी बेहतर प्रस्तुति। व्यक्तिगत जिंदगी में भी दूसरे कलाकारों के लिए एक सबक।

मोतीलाल

1910-1965

बेहद स्वाभाविक अभिनेता मोतीलाल जिन्हें मैथड एक्टिंग या पद्धतिबद्ध अभिनय के लिए सबसे पहले पहचान मिली। दिलीप कुमार से भी पहले मोतीलाल ने मैथड एक्टिंग की शुरुआत कर दी थी। एक ऐसे अभिनेता थे, जो पर्दे पर आते ही छा जाते थे। इनसे अभिनय सीखने वाले भी बहुत रहे हैं। उनसे थोड़ा पहले और उनके समय ही याकूब खान (1904-1958) एक अच्छे अभिनेता के रूप में याद किए जाते हैं। 70 से ज्यादा बेहतर फिल्मों में काम करने वाले मोतीलाल राजवंश की खास फिल्में हैं – ‘तकदीर’, ‘अरमान, ‘मिस्टर संपत, ‘देवदास, ‘पैगाम, ‘जागते रहो, ‘अनाड़ी, ‘असली नकली, ‘लीडर और ‘वक्त’।

योगदान – खुशनुमा छवि के अभिनेता, अभिनय में सरलता-सहजता के प्रेरक, सिनेमाई अभिनय के घोषित शिक्षक, चरित्र भूमिकाओं में यादगार।

बलराज साहनी

1913-1973

बलराज साहनी भारतीय सिनेमा के एक सम्मानित रत्न के रूप में पूरी चमक के साथ दर्ज हैं। बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, अभिनेता बलराज साहनी बेहद संवेदनशील और प्रभावी व्यक्तित्व रहे। भारतीय सिनेमा समाज को सभ्य और कलात्मक बनाने में उनका योगदान है। एक समय वे पारिवारिक और सामाजिक फिल्मों की जान रहे थे। वे बहुत अच्छे लेखक थे, ‘बाजी’ जैसी शानदार क्राइम थ्रिलर फिल्म उनकी कलम से निकली। वे टैगोर के शांतिनिकेतन में अंग्रेजी पढ़ाते थे, अंग्रेजी में लिखते थे, बाद के दिनों में पंजाबी की ओर मुड़े। भारतीय व्यावसायिक फिल्मों में उन्होंने अनेक बार पिता और बड़े भाई के चरित्रों को कालजयी बनाया। करीब-करीब 90 फिल्मों में उन्होंने काम किया और जिनमें से ‘दो बीघा जमीन’, ‘काबुलीवाला, ‘दो रास्ते, ‘भाभी, ‘छोटी बहन, ‘वक्त, ‘गरम हवा’ बहुत विशेष हैं।

योगदान – आम भला आदमी, भला भारतीय, गरीबों का शुभचिंतक-पक्षधर, परिवार को मजबूती देने वाला, सहज कलाकार, सहज अभिनय, आकर्षक लेखन, शानदार पिता और भाई।

राजेन्द्र कुमार

1929-1999

राजेन्द्र कुमार को दिलीप कुमार की शैली का भावुक रोमांटिक अभिनेता माना जाता है। राजेन्द्र कुमार अपनी कलाकारी से पारिवारिकता और प्रेम का विस्तार करते हैं। सामाजिक व व्यावसायिक फिल्मों में उन्हें लगातार अच्छा काम करते देखा गया। एक समय था, जब उनकी फिल्में सिल्वर जुबली मनाती थीं और उन्हें जुबली कुमार के रूप में ख्याति मिली थी। 70 से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने काम किया और उनकी खास फिल्मों में ‘मदर इंडिया’, ‘धूल का फूल, ‘दिल एक मंदिर, ‘ससुराल, ‘आरजू, ‘गूँज उठी शहनाई, ‘अमन, ‘संगम, ‘झुक गया आसमान, ‘आई मिलन की बेला, ‘तलाश’, ‘गंवार’ शामिल है।

योगदान – भावुकता और सहजता का सम्मान, पारिवारिकता को मजबूती, अच्छाई के साथ रोमांस, भला आदमी, प्रयोगधर्मी, मददगार, प्रेम के लिए त्याग-बलिदान का भाव, जमीन से जुड़ाव।

राज कुमार

1926-1996

भारतीय सिनेमा के एक बेहद सम्मानित अभिनेता राज कुमार को शाही अंदाज, दमदार आवाज और आकर्षक संवाद अदायगी के लिए ज्यादा याद किया जाता है। बलूचिस्तान में जन्मे कश्मीरी कुलभूषण पंडित, जो बाद में राज कुमार के नाम से जाने गए, एक ऐसे अभिनेता थे, जिनकी स्टाइल देखने और संवाद अदायगी सुनने का लोग इंतजार करते थे। इन्होंने करीब 60 फिल्मों में काम किया, जिनमें से ‘मदर इंडिया, ‘वक्त, ‘दिल एक मंदिर, ‘काजल, ‘हीर रांझा, ‘पाकीजा, ‘सौदागर, ‘तिरंगा’ इत्यादि फिल्में प्रमुख हैं।

योगदान – शाही या रईस भाव, आवाज और संवाद का जादू, प्राकृतिक स्वरूप, सितारा होने के प्रति सजग, व्यक्तिगत जीवन को महत्व, फिल्म दुनिया और समाज में श्रेष्ठता या विशेषता का प्रभाव इत्यादि।

सुनील दत्त

1929-2005

अति सहज भोला भारतीय चेहरा। सात्विक अभिनय में कुशल स्वाभाविक अभिनेता। भारतीय सिनेमा जगत के एक सबसे भले आदमी सुनील दत्त के दामन पर कोई दाग नहीं। अपने पुत्र संजय दत्त के अव्यवस्थित जीवन के बावजूद सुनील दत्त को एक आदर्श पति और पिता के रूप में याद किया जाता है। सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नरगिस के साथ उनका वैवाहिक सम्बंध आज भी आदर्श माना जाता है। राजनीति में आने, सांसद और मंत्री बनने के बावजूद वे बेहद सहज और सामाजिक व्यक्ति रहे। बाद का जीवन उन्होंने समाजसेवा को ही अर्पित कर दिया। भारतीय सिनेमा जगत ने भारतीय राजनीति को जितने भी नेता दिए हैं, उनमें अब तक के सर्वश्रेष्ठ सुनील दत्त ही हैं। करीब-करीब 100 फिल्मों में काम करने वाले सुनील दत्त को ‘मदर इंडिया, ‘सुजाता, ‘साधना, ‘छाया, ‘पड़ोसन, ‘मिलन, ‘खानदान, ‘मुझे जीने दो, ‘वक्त, ‘मेहरबान, ‘मिलन, ‘यादें, ‘दर्द का रिश्ता’ के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

योगदान – भले आदमी का भाव, सामाजिक चेतना, गँवई या देहाती वैभव, हास्य की समझ, अच्छी छवि के राजनेता, सेकुलर देश-समाज प्रेम, जनसंपर्क में माहिर, बाल सुलभ भोलापन, समझदारी, सहजता, विविधता और गहराई, किरदार से न्याय, हिन्दी सिनेमा जगत के सबसे अच्छे प्रतिनिधि कलाकार।

शम्मी कपूर

1931-2011

पश्चिमी अंदाज के पहले रोमांटिक हीरो – लवर ब्वाय, जिन्हें दर्शकों का खूब प्यार मिला। उनके प्रेम प्रदर्शन में चेहरे पर जो तीव्र भाव आवेग, मोहकता और गहराई झलकती थी, वह दुर्लभ है। प्रेम में गंभीरता के साथ ही खिलंदड़ापन भी था। नृत्य या व्यायाम की कुछ मुद्राओं के जरिये हल्के झटकों के साथ स्वयं को अभिव्यक्त करने की शैली। वे कोई अच्छे नर्तक नहीं थे, लेकिन उन्होंने फिल्मों में एक नायक के लिए नृत्य की जरूरत को बढ़ाया। वास्तविक रूप से स्मार्ट, तकनीकी रूप से समृद्ध। गाडिय़ों का उन्हें शौक था और साइबर वल्र्ड से बहुत अच्छी तरह जुड़े थे। करीब 70 फिल्मों के करियर में उन्हें – ‘तुम सा नहीं देखा’, ‘दिल देके देखो’, ‘जंगली’, ‘प्रोफेसर’, ‘ब्लफ मास्टर, ‘तीसरी मंजिल और ‘ब्रह्मचारी के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

योगदान – शहरी युवाओं के लिए प्रेरणा, आंगिक अभिनय का महत्व, नृत्य का महत्व, खिलंदड़ापन, बिंदास अंदाज, प्रेम का महत्व, रोमांस की आवश्यकता, स्मार्टनेस या सौंदर्य का महत्व, समय के साथ तालमेल इत्यादि।

शशि कपूर

1938-2017

शशि कपूर संपूर्णता में बहुत सक्षम और जमीनी कलाकार थे। वे कपूर परिवार में पिता पृथ्वीराज कपूर के बाद सबसे सहज अभिनेता थे। उनसे मिलना-संवाद करना भी सबसे आसान था। फिल्मों के अलावा वे थिएटर से भी हमेशा जुड़े रहे। एक अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के रूप में भी उन्होंने अपनी एक सशक्त पहचान कायम की। सिनेमा समाज को सभ्य और समृद्ध करने में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वे एक ऐसे अभिनेता थे, जिन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ ही फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले। कला बिरादरी के साथ ही फिल्म बिरादरी भी उनसे पूरी तरह जुड़ी हुई थी। वे अंग्रेजी की फिल्मों में भी बहुत सहजता से काम करते थे। करीब 160 फिल्मों में उन्होंने काम किया, जिनमें से ‘हसीना मान जाएगी’, ‘चोर मचाए शोर’, ‘शंकर दादा, ‘जब जब फूल खिले, ‘कलयुग, ‘सत्यम शिवम सुंदरम, ‘त्रिशूल, ‘दीवार, ‘जुनून, ‘उत्सव, ‘न्यू दिल्ली टाइम्स’ इत्यादि। वे बहु-सितारा फिल्मों की जान थे। अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी बहुत सफल रही।

योगदान – उच्चस्तरीय कलाबोध, सौंदर्यबोध, मुस्कराहट का महत्व, स्मार्ट, खुशमिजाज नायक, बदलाव के पक्षधर, समय के साथ तालमेल, स्वाभाविकता, सरलता, अच्छी फिल्में देने की कोशिश, पश्चिम से जुड़ाव, अच्छे सहयोगी, रोमांटिक भाव, युवाओं के प्रेरणास्रोत।

धर्मेन्द्र

वर्ष 1935 में जन्में धर्मेन्द्र को रोमांटिक, दबंग, एक्शन हीरो के रूप में पहचाना जाता है। वे भारतीय सिनेमा के सर्वाधिक चर्चित अभिनेताओं में से एक रहे हैं। सुदर्शन और सशक्त छवि के अभिनेता, जिन्हें मारधाड़ विशेषज्ञता की वजह से ‘ही मैन’ भी कहा गया। उन्होंने अपने बिंदास पंजाबी अंदाज को कभी नहीं छोड़ा। स्वभाव और प्रभाव में दबंग छवि के मालिक धर्मेन्द्र राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं। 200 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले धर्मेन्द्र की खास फिल्में हैं – ‘आई मिलन की बेला’, ‘फूल और पत्थर’, ‘मेरा गाँव मेरा देश’, ‘यादों की बारात’, ‘रेशम की डोरी’, ‘शोले’, ‘सत्यकाम’, ‘धर्मवीर’ इत्यादि।

योगदान – संपूर्ण मर्दाना छवि, रोमांस भाव, क्रोध की अभिव्यक्ति, मस्ताना भाव, हास्यबोध, सुलझा हुआ व्यक्तित्व, कस्बाई आबादी को सपने दिखाए, सहयोगी रवैया, तन की ताकत और एक्शन का महत्व।

मनोज कुमार

वर्ष 1937 में जन्में एक अच्छे कलाकार, निर्देशक, निर्माता मनोज कुमार भी दिलीप कुमार से प्रभावित अभिनेता रहे, लेकिन उन्होंने अपनी एक अलग पहचान भी निर्मित की। अभिनेता के रूप में भावपूर्ण थे और निर्देशक-निर्माता के रूप में देशप्रेम की फिल्मों के लिए उन्हें याद किया जाता है। भारतीय सिनेमा जगत में देशप्रेम पर केन्द्रित सबसे अच्छी सफल व्यावसायिक फिल्मों का निर्माण मनोज कुमार ने ही किया। उन्हें भारत कुमार भी कहा गया। उन्हें भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च दादा साहेब फालके सम्मान भी प्राप्त हुआ। करीब 50 फिल्मों में काम करने वाले मनोज कुमार को ‘उपकार, ‘क्रांति, ‘पूरब और पश्चिम, ‘रोटी कपड़ा और मकान, ‘बेईमान, ‘शोर, ‘संन्यासी के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

योगदान – देशभक्ति, देश सेवा, सामाजिक संदेश, सुधार की कोशिश, भावना प्रधान फिल्म संयोजन, अच्छी फिल्मों का निर्माण, प्रेरणास्रोत, अच्छा गीत-संगीत, गुड इंडियन ब्वाय पहली बार।

ओमप्रकाश

1919-1998

हिन्दी सिनेमा में चरित्र भूमिकाओं और चरित्र अभिनेताओं का अपना ही महत्व रहा है। चरित्र अभिनेताओं में सर्वाधिक चर्चित ओमप्रकाश बेहद कुशल सहज अभिनेता के रूप में अपना प्रभाव छोडऩे में कामयाब रहे। वह एक ऐसे अभिनेता रहे, जिनकी खूब चर्चा हुई। अनेक चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को उन्होंने अभिनय कला में डूबकर साकार किया। उनकी विशेष आवाज व संवाद शैली खूब चर्चित है। हास्य के साथ ही गंभीर भूमिकाओं में भी उन्होंने शानदार काम किया। 250 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले ओमप्रकाश को ‘खानदान, ‘अमर प्रेम, ‘चुपके-चुपके, ‘अपना देश, ‘पड़ोसन, ‘जूली, ‘मनमौजी, ‘शराबी इत्यादि फिल्मों के लिए याद किया जाता है।

योगदान – चरित्रों या किरदारों की बारिकी को पकडऩा, अभिनय में बहुमुखी प्रतिभा, चरित्र भूमिकाओं का महत्व स्थापित किया, हास्य और गंभीरता का तालमेल, मुख्यधारा के अभिनेताओं के साथ उनका समन्वय और संवाद अदायगी।

संजीव कुमार

1938-1985

भारतीय सिनेमा के एक बेहद सक्षम अभिनेता संजीव कुमार को भुलाया नहीं जा सकता। उनको याद करने के लिए उनकी आवाज ही काफी है। आप उन्हें न देखिए, उनकी आवाज या उनके संवाद को ही सुन लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि कोई ऊँचे दर्जे का कलाकार है। संवाद अदायगी में साँसों का पूरा खेल इन्हें मालूम है, इस मामले में वे दुर्लभ हैं। उनके पास समय नहीं था, वह महज 47 की उम्र में दुनिया से चले गए, यह भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी क्षति थी। कलात्मक सफलता के साथ ही व्यावसायिक पहचान भी उन्हें खूब मिली, प्रतिष्ठा मिली। संजीव कुमार ने 150 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और उन्हें ‘शोले, ‘अंगूर, ‘त्रिशूल, ‘कोशिश, ‘आंधी, ‘मौसम, ‘सत्यकाम, ‘खिलौना, ‘अनुभव, ‘आशीर्वाद, ‘शतरंज के खिलाड़ी, ‘नया दिन नई रात जैसी फिल्मों के लिए याद किया जाता है।

योगदान – शानदार संवाद अदायगी, साँसों का प्रयोग, अभिनय के प्रेरणास्रोत, चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को निभाना, किसी भी तरह की भूमिका से परहेज नहीं, व्यावसायिकता के महत्व को समझना, कलात्मकता को सबसे ऊपर रखना।  

जीतेन्द्र

भारतीय सिनेमा के चर्चित अभिनेता जीतेन्द्र का जन्म 1942 में हुआ था। जीतेन्द्र को भावना प्रधान अभिनय और अच्छे नृत्य के लिए जाना जाता है। शम्मी कपूर से नृत्य या देह संचालन की जो मुद्राएँ शुरू हुई थीं, उन्हें जीतेन्द्र ने बखूबी आगे बढ़ाया। डांसिंग स्टार के रूप में पहचाने गए। एक सुदर्शन, भावना प्रधान, स्मार्ट लवर ब्वाय। छोटी-बड़ी करीब 200 फिल्मों में उन्होंने काम किया, जिनमें से ‘गीत गाया पत्थरों ने, ‘फर्ज, ‘परिचय, ‘किनारा, ‘खुशबू, ‘हिम्मतवाला, ‘जानी दुश्मन, ‘मवाली, ‘तोहफा, ‘संजोग, ‘कांरवा, ‘अपनापन, ‘औलाद, ‘प्यासा सावन, ‘घर संसार, ‘मेरी आवाज सुनो इत्यादि प्रमुख हैं।

योगदान – युवा भाव, फिटनेस का संदेश, मुक्त शैली में अच्छा नृत्य, भावना प्रधान अभिनय, भले आदमी का भाव, पारिवारिक सामाजिक रोमांस, सहयोगी भाव, अपनी सीमा और समय का ज्ञान।

फिरोज खान

1939-2009

हिन्दी सिनेमा के सबसे स्टाइलिश या सजीले कलाकारों में अग्रणी फिरोज खान को उनकी काउ ब्वाय छवि के लिए पहचाना जाता है। फिरोज ऐसे शुद्ध सुदर्शन पुरुष रहे, जिनकी उपस्थिति मात्र से नायिकाओं या अभिनेत्रियों के चेहरे खिले नजर आते हैं। अच्छे और भावपूर्ण अभिनय के साथ ही उन्होंने बहुत सजीली व दिलचस्प फिल्मों का निर्माण भी किया। 60 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले फिरोज की विशेष फिल्में हैं – ‘दीदी, ‘सफर, ‘उपासना, ‘खोटे सिक्के, ‘धर्मात्मा, ‘आदमी और इंसान, ‘इंटरनेशनल क्रूक, ‘औरत, ‘अपराध, ‘मेला, ‘कुर्बानी, ‘दो वक्त की रोटी, ‘एक पहेली, ‘जांबाज, ‘दयावान इत्यादि।

योगदान – पश्चिमी स्टाइल वाला भारतीय अभिनेता, प्रेरक काउ ब्वाय छवि, सुदर्शन स्वरूप, मोहक, स्टाइल या सजीलापन, सफल मनोरंजनकर्ता, युवा विषय आधारित फिल्म निर्माण के लिए प्रेरणा, आधुनिक अंदाज वाले फिल्मकार।

जॉय मुखर्जी

1939-2012

प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक शशधर मुखर्जी के पुत्र और अशोक कुमार के भांजे जॉय मुखर्जी को उनकी प्रेमी युवा छवि के लिए पहचान और लोकप्रियता मिली। जॉय मुखर्जी अपने समय में बेहद सुदर्शन और आकर्षक नायक थे। चालू भाषा में कहें, तो उस दौर में चॉकलेटी अभिनेताओं में अग्रणी। उनकी भोली मुस्कराहट खास थी, वे स्मार्ट थे। जॉय मुखर्जी ने करीब 35 फिल्मों में काम किया, जिनमें से ज्यादा यादगार फिल्में हैं – ‘लव इन शिमला, ‘लव इन टोकियो, ‘लव इन बाम्बे, ‘फिर वही दिल लाया हूँ, ‘शागिर्द, ‘एक बार मुस्करा दो’। इन्हीं की परंपरा के अभिनेता विश्वजीत चटर्जी (जन्म 1936) भी बहुत प्रभावी रहे थे।

योगदान – स्मार्ट लवर ब्वाय, सुदर्शन छवि, बांगला सौंदर्य, रोमांस, मध्यवर्गीय सपनों के प्रेरक।

शत्रुघ्न सिन्हा

बुलंद आवाज और जीवंत अभिनय के लिए पहचाने गए शत्रुघ्न सिन्हा का जन्म पटना में वर्ष 1945 में हुआ था। शॉटगन और शत्रु के नाम से संबोधित हुए शत्रुघ्न प्रसाद सिन्हा ने नायक और प्रति-नायक, दोनों ही तरह की भूमिकाओं में अपनी क्षमता को प्रमाणित किया। रफ-टफ खुरदुरा चेहरा, संघर्षशील आम आदमी का प्रतिनिधि चेहरा। कदकाठी और फिल्मी प्रतियोगिता में अमिताभ बच्चन से बराबरी की कोशिश करने वाले कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा भी एंग्री एक्शन हीरो के रूप में प्रसिद्ध हुए। अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी को काफी पसंद किया गया। हालाँकि उन्हें सीमित मौके ही नसीब हुए। उन्हें सहयोगी भूमिकाएँ ही ज्यादा मिलीं। शत्रुघ्न सिन्हा ने 150 से अधिक फिल्मों में बेहतर काम किया, जिसमें से ‘कालीचरण, ‘क्रांति, ‘नसीब, ‘दोस्ताना, ‘काला पत्थर, ‘तनहाई, ‘दोस्त, ‘यारों का यार, ‘विश्वनाथ, ‘जानी दुश्मन’ को ज्यादा याद किया जाता है। बाद में वे राजनीति में सक्रिय हुए, सांसद बने और केन्द्र सरकार में मंत्री भी रहे।

योगदान – पहला बिहारी बाबू, बिहार-यूपी के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत, आवाज का जादू, अभिनय का जोर, औसत छवि के साथ भी सफलता, सपना, तैयारी और संघर्ष, राजनीतिक सामाजिक सक्रियता, बेहतर जीवन प्रबंधन, समय की समझ इत्यादि।

विनोद मेहरा

1945-1990

बेहद सक्षम और आकर्षक भाव वाले स्मार्ट अभिनेता विनोद मेहरा उसी टैलेंट हंट में दूसरे स्थान पर रहे थे, जिसमें राजेश खन्ना टॉप थे। विनोद मेहरा का बालसुलभ चेहरा, मर्दानापन और संवाद अदायगी उनकी खासियत रही। विनोद मेहरा मात्र 45 की उम्र में हार्ट अटैक के शिकार हुए। उनमें एक बेहद सफल निर्देशक होने की पूरी संभावना थी, उनका जल्दी जाना भी हिन्दी सिनेमा के लिए क्षति है। उन्होंने 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, जिसमें से ‘अनुराग, ‘अनुरोध, ‘अमर प्रेम, ‘अमर दीप, ‘बेमिसाल, ‘बिन फेरे हम तेरे, ‘घर, ‘साजन बिना सुहागन’ को हमेशा याद किया जाता है।

योगदान – अच्छी भावपूर्ण छवि, आकर्षक बालसुलभ भाव, संवाद अदायगी की अपनी शैली, सहजता, रोमांटिक छवि, मध्यवर्गीय प्रभाव, आम युवा, संघर्ष के साथ अपनी जगह तैयार करने वाले कलाकार, कम समय में भरपूर जीवन जीने वाले युवा।

विनोद खन्ना

1946-2017

सुदर्शन कदकाठी के आकर्षक नायक विनोद खन्ना को हमेशा बेहतर सहज अभिनय के लिए जाना गया। एंग्री यंग मैन परंपरा के ही एक अभिनेता रहे और अमिताभ बच्चन के मुकाबले में एक समय बराबरी पर खड़े नजर आए। हालाँकि वे जीवन के दूसरे क्षेत्रों की ओर भटके भी बहुत। वे उपदेशक रजनीश के शिष्य होकर कुछ समय के लिए साधु हो गए, लगभग दस साल वह रजनीश से जुड़े रहे और करीब पाँच साल पूरी तरह से रजनीश के दल में शामिल रहे और फिल्मों को अलविदा कह दिया। वर्ष 1985 में वापस फिल्मों में लौटे। वे ऐसे स्मार्ट और आदर्श छवि के अभिनेता थे, जिन्हें व्यावसायिक फिल्मों के अलावा कलात्मक फिल्मों में भी समान रूप से पसंद किया गया। अध्यात्म से दूर हुए, तो राजनीति की ओर बढ़ गए। केन्द्र सरकार में मंत्री भी रहे, लेकिन अच्छी फिल्मों में काम करना नहीं छोड़ा। उन्हें मरणोपरांत वर्ष 2018 में दादा साहेब फालके सम्मान हासिल हुआ। 100 से ज्यादा अच्छी फिल्मों में उन्होंने काम किया, जिनमें से ‘मेरे अपने, ‘अचानक, ‘अमर अकबर एंथोनी, ‘मुकद्दर का सिकंदर, ‘सत्यमेव जयते, ‘लेकिन, ‘रिहाई, ‘कुर्बानी, ‘चांदनी, ‘दयावान’ के लिए उन्हें याद किया जाता है।

योगदान – अवसर का बेहतर उपयोग, अपनी सुदर्शन छवि के प्रति सजग, अच्छा सहज अभिनय, पौरुष के एक आदर्श सिनेमाई प्रतीक, आध्यात्मिक रुझान, व्यावसायिक समझ, कलात्मकता को सम्मान, राजनीति में सक्रियता और भारतीय सिनेमा के एक अच्छे प्रतिनिधि कलाकार।

ऋषि कपूर

1952-2020

भारतीय सिनेमा के सबसे बेहतर प्रेमी युवा नायक ऋषि कपूर का जन्म 1952 में हुआ था। राज कपूर के ऐसे सक्षम पुत्र, जिनका जन्म ही मानो फिल्मों में अभिनय के लिए हुआ था। अपनी पहली ही वयस्क भूमिका में बॉबी फिल्म के लिए वर्ष 1974 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार उन्हें हासिल हुआ, तब उनकी उम्र महज 21 साल थी। लवर ब्वाय या प्रेमी युवा नायक के रूप में उनकी ऐसी ब्रांडिंग हुई कि लगभग 30 वर्ष तक वह ऐसी ही भूमिकाएँ निभाते रहे। बाद में उन्होंने चरित्र भूमिकाओं में स्वयं को ढाल लिया और हमेशा ही बेहतर कलाकार सिद्ध हुए। 10 से ज्यादा बेहतर नायिकाओं ने उनके साथ ही फिल्मों में पदार्पण किया। लगभग 150 फिल्मों में वह काम कर चुके हैं, जिनमें से प्रमुख हैं – ‘मेरा नाम जोकर, ‘बॉबी, ‘रफू चक्कर, ‘अमर अकबर एंथोनी, ‘खेल खेल में, ‘कर्ज, ‘जहरीला इंसान, ‘हम किसी से कम नहीं, ‘सागर, ‘लैला मजनूं’।

योगदान – पहला असली प्रेमी किशोर या युवा, युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत, शहरी रोमांस, पारिवारिक छवि, सहजता, मनोरंजन करने के प्रति समर्पित, हास्य अभिनेता, सह-कलाकारों व अभिनेत्रियों से तालमेल बनाने में माहिर, समय के साथ बदलाव, चरित्र भूमिकाओं में भी बेहद सफल-प्रेरक।

अमोल पालेकर

भारतीय सिनेमा के एक सहजतम शांत चित्त अभिनेता अमोल पालेकर का जन्म 1944 में हुआ था। पड़ोस का लड़का वाली उनकी छवि सिनेमा के एक बड़े दर्शक वर्ग को बहुत राहत का अहसास कराती थी। जहाँ बड़े पर्दे के ज्यादातर बड़े अभिनेता व्यावसायिक मनोरंजन की आँधी लाते थे, ठीक उसी समय अमोल पालेकर ठंडी हवा के झौंके की तरह थे। उन्हें खास किस्म की कॉमेडी, पारिवारिक और सामाजिक फिल्मों में बहुत सम्मान से देखा गया। वे हिन्दी के अलावा मराठी और दक्षिण की फिल्मों में भी बहुत सक्रिय रहे। फिल्म निर्देशक के रूप में भी उन्होंने खुद को साबित किया। अमोल ने 50 से ज्यादा बहुत बेहतर फिल्मों में काम किया, जिसमें से ‘रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात, ‘नरम गरम, ‘गोल माल’, ‘चित्त चोर, ‘घरोंदा, ‘बातों बातों में’ सबसे खास हैं। अमोल पालेकर से ही मिलती-जुलती गंगा-जमुनी परंपरा में फारूक शेख (1948-2013) को एक बेहद सक्षम अभिनेता के रूप में याद किया जाता है।

योगदान – शांत छवि के कलाकार, आम आदमी, सीधा-भला आदमी, स्वाभाविक अभिनय, मध्यवर्गीय अपील, सर्जनात्मकता, कलात्मकता, व्यावसायिक भीड़ में भी लोकप्रिय, समाज में सामान्य अच्छे आदमी की हमेशा जरूरत और माँग।

गंभीर खलनायक अभिनेता

के. एन. सिंह, प्राण, प्रेम नाथ, अजीत

खल चरित्रों के लिए विख्यात प्राण (1920-2013) के बिना हिन्दी सिनेमा जगत पूरा नहीं होता। खल चरित्र और खलनायक के अभिनय की गंभीर शुरुआत कृशन निरंजन सिंह (1908-2000) ने की थी। प्राण खल भूमिकाओं में वास्तव में के.एन. सिंह की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले अभिनेता रहे। आँखों, आवाज और जोरदार अभिनय के जरिये प्राण ने खलनायिकी को बहुत विस्तार दिया। प्राण चरित्र भूमिकाओं के साथ ही हास्य अभिनय में भी बहुत सफल रहे। वे भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के से 2012 के लिए सम्मानित किए गए। के.एन. सिंह और प्राण की परंपरा में ही अजीत (1922-1998) और प्रेम नाथ (1926-1992) भी गिने जाएँगे। इस परंपरा को बाद के दौर में अनुपम खेर ने आगे बढ़ाया।

खतरनाक सजीला खलनायक अभिनेता

अमजद खान, डैनी, अमरीश पुरी

खल चरित्र को पर्दे पर सर्वाधिक जीवंत और आक्रामक रूप में पेश करने वाले अमजद खान (1940-1992) को भुलाया नहीं जा सकता। विश्व सिनेमा में गब्बर सिंह की भूमिका कालजयी है। बेहद सक्षम अभिनेता, कदकाठी से भारी और चेहरे से निष्ठुर, धूर्त-से दिखने वाले अमजद खल अभिनय में हमेशा प्रेरक रहेंगे। एंग्री यंगमैन के दौर में अमजद खान के अलावा डैनी डेंगजोंगपा (जन्म 1948), अमरीश पुरी (1932-2005) ने भी अपनी शानदार प्रतिभा से फिल्मों को संपन्न बनाया। इनके द्वारा निभाए गए खल चरित्रों से समाज ने बहुत कुछ सीखा। इन अभिनेताओं ने सकारात्मक चरित्र भूमिकाओं में भी स्वयं को साबित किया। ये अभिनेता समाज में अनेक लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत भी रहे। अमजद खान को भावपूर्ण खलनायिकी, डैनी को उनकी शानदार स्टाइल और अमरीश पुरी को उनके मेकअप और आवाज की वजह से ऊंचा मुकाम हासिल हुआ। अमजद को ‘शोले, डैनी को ‘अग्निपथ, अमरीश पुरी को ‘मिस्टर इंडिया के लिए याद किया जाएगा। ओम शिवपुरी और रजा मुराद भी इसी श्रेणी के खलनायक अभिनेता थे।

धूर्त खलनायक अभिनेता

जीवन, कन्हैयालाल, प्रेम चोपड़ा

खलनायिकी की निम्नस्तरीय धूर्तता को जीवन (1915-1987) और कन्हैयालाल (1910-1982) ने पर्दे पर बखूबी साकार किया। कुटिल निगाह, चालाकी भरी मुद्राएँ, अति नाटकीय खलनायक। सीधे लडऩे की बजाय साजिशों को अंजाम देना। अपना बनकर पीठ पर छुरा भोंकना। जीवन तो 50 से ज्यादा बार पौराणिक चरित्र नारद बनकर सामने आए थे और बाद के दिनों में केवल खल भूमिकाएँ ही निभाने लगे। कन्हैयालाल को ‘औरत’ और ‘मदर इंडिया’ के सुखी लाला के रूप में बहुत याद किया जाता है। जीवन और कन्हैयालाल की परंपरा में ही प्रेम चोपड़ा हुए। ये सब ऐसे प्रभावी अभिनेता थे कि इन्हें देखते ही दर्शक को लगता है, अब जरूर कुछ बुरा होगा। इनका अभिनय खल अभिनेताओं के लिए प्रेरणा है, इनके चेहरे और हाव-भाव से ही खलनायिकी टपकती है। इसी खलनायक परंपरा में मदन पुरी, रंजीत और आगे चलकर शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर भी हुए।

हास्य अभिनेता

भगवान दादा, जॉनी वाकर, महमूद, आई.एस. जौहर, असरानी

भारतीय सिनेमा में हास्य अभिनेताओं की भी लंबी परंपरा रही है, लेकिन इनमें से भगवान दादा (1913-2002), जॉनी वाकर (1926-2003), महमूद (1932-2004), आई.एस. जौहर (1920-1984) और असरानी (जन्म -1941) को नींव माना जा सकता है। पाँचों की अलग-अलग शैली रही, पाँचों ने ही दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। हालाँकि प्रतिभा के मामले में महमूद भारतीय सिनेमा के सबसे सक्षम हास्य कलाकार कहे जाएँगे। उन्होंने अभिनय के अलावा निर्देशन और फिल्मों का निर्माण भी खूब किया। अपने समय के स्टार भगवान दादा को ‘अलबेला’, जॉनी वाकर को ‘चोरी चोरी, ‘प्यासा’ के लिए, महमूद को ‘पड़ोसन और ‘बाम्बे टु गोवा’ के लिए, आई.एस. जौहर को ‘जॉनी मेरा नाम’ और ‘जौहर-महमूद इन गोवा, असरानी को ‘शोले’ और ‘हम नहीं सुधरेंगे’ के लिए ज्यादा पहचाना जाता है। आई.एस. जौहर (1920-1984) हिन्दी सिनेमा में गंभीर व्यंग्य के लिए पहचाने जाते हैं। जौहर बेहद प्रतिभावान कलाकार थे, उन्होंने 10 से ज्यादा हास्य फिल्मों का निर्माण-निर्देशन भी किया।

देविका रानी

1908-1994

देविका रानी को भारतीय सिनेमा की पहली सशक्त महिला कहा जाता है। विदेश में पढ़ी-लिखी, सभ्य और संभ्रांत माहौल में पली-बढ़ी देविका रानी महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की बहन सुकुमारी देवी के बेटे डॉक्टर मनमथनाथ चौधरी की बेटी थीं। उनकी माँ लीला देवी चौधरी की माँ इंदुमती देवी की माँ सौदामिनी देवी टैगोर की बहन थीं। देविका रानी ने अपने प्रसिद्ध फिल्मकार पति हिमांशु राय (1892-1940) के साथ फिल्मों में काम शुरू किया। जिंदादिल, खुले विचारों वाली, बोल्ड, स्मार्ट और खूबसूरत अभिनेत्री देविका रानी हमेशा ही प्रेरणास्रोत हैं। वर्ष 1933 में हिमांशु राय ने ‘कर्मा’ फिल्म का निर्माण किया था, जिसमें हिमांशु और देविका का चार मिनट लंबा चुंबन दृश्य था। उस दौर में यह किसी दु:साहस से कम नहीं था। हिमांशु राय के निधन के बाद बांबे टॉकीज की बागडोर देविका रानी के हाथों में आई और वे निर्माता के रूप में भी कामयाब रहीं। फिर अचानक उन्होंने एक रूसी चित्रकार एस. रोयरिच से विवाह कर लिया और फिल्मी दुनिया से अलग जा बसीं। उनका जीवन बहुत विवादित और चर्चित रहा। अपने से 16 साल बड़े हिमांशु राय से उन्होंने मर्जी से विवाह किया था। हिमांशु राय से विवाह के बाद भी उनके कथित प्रेम सम्बंध और उनका भाग जाना भी चर्चित रहा था। उन्होंने हर वह काम आसानी और आजादी के साथ कर दिखाया, जो उस दौर की महिलाएँ नहीं कर पाती थीं।

भारत सरकार ने जब दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की स्थापना की, तो पहला पुरस्कार देविका रानी को ही दिया गया। देविका रानी ने करीब 16 फिल्मों में अभिनेत्री के रूप में काम किया और बांबे टॉकीज के तहत लगभग 29 फिल्मों के निर्माण से जुड़ी रहीं। उन्हें ‘अछूत कन्या’, ‘निर्मला, ‘दुर्गा, ‘जवानी की हवा के लिए ज्यादा याद किया जाता है।

योगदान – भारतीय सिनेमा संस्कृति का निर्माण, नया करने का साहस और दु:साहस, कलात्मकता, बिंदास जीवन शैली, पढ़ी-लिखी अच्छे घरों की महिलाओं के लिए इन्होंने रास्ता तैयार किया, दिलीप कुमार और अन्य अनेक अच्छे अभिनेताओं को मौका दिया, अभिनय के साथ ही फिल्म निर्माण में भी टीम बनाकर काम करने की कला।

जुबैदा

1911-1988

भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ (1931) में नायिका की भूमिका निभाने वाली जुबैदा ने अपने समय में हिन्दी फिल्मों को एक प्रभावी शुरुआत दी। जुबैदा की बड़ी बहन सुल्ताना और माँ फातिमा बेगम भी फिल्मों में खूब सक्रिय थीं, शुरुआती दौर के हिन्दी सिनेमा में इनका बड़ा योगदान है। मूक फिल्मों के दौर में जुबैदा ने 1923 में ही अपनी पहचान कायम कर ली थी और ‘आलम आरा’ के साथ उनकी ख्याति पूरे देश में फैल गई थी। पहली बार किसी नायिका को पर्दे पर बोलते हुए देखा और सुना गया। 40 से ज्यादा अच्छी फिल्मों में जुबैदा ने काम किया और उन्हें ‘आलम आरा’ के अलावा ‘देवदास (1937 में निर्मित) में पारो की भूमिका के लिए भी याद किया जाता है।

(भारतीय सिनेमा में जुबैदा बेगम (1926-1952) नाम की एक अन्य अभिनेत्री नृत्यांगना भी हुईं, जिनकी शादी जोधपुर के महाराज हनुवंत सिंह से हुई थी और जो मात्र 26 की उम्र में अपने 28 वर्षीय पति के साथ हवाई दुर्घटना में मारी गई थीं। इन्हीं जुबैदा पर श्याम बेनेगल के निर्देशन में वर्ष 2001 में फिल्म का निर्माण हुआ।)

रूबी मेयर्स सुलोचना

1907-1983

एक बेहद आधुनिक आकर्षक यहूदी अभिनेत्री रूबी मेयर्स जिन्होंने स्मार्ट, खूबसूरत अभिनेत्रियों का दौर शुरू किया। मूक दौर में ही वह काफी प्रसिद्ध हो चुकी थीं। अपने समय की सबसे महंगी और चर्चित अभिनेत्री थीं। बोलती फिल्मों में भी लंबे समय तक उन्होंने काम किया और अपना फिल्म स्टूडियो भी स्थापित किया। उन्हें वर्ष 1971 में दादा साहेब फाल्के सम्मान भी हासिल हुआ। ‘सिनेमा क्वीन’, ‘बलिदान’, ‘जुगनू’, ‘अनारकली, ‘बांबे की बिल्ली’ इत्यादि उनकी खास फिल्में हैं। चरित्र भूमिकाओं में भी उनकी लंबे समय तक माँग रही।

सुरैया

1929-2004

भारत की शुरुआती प्रतिभावान अभिनेत्रियों में से एक सुरैया की चर्चा हम देव आनंद के अध्याय में भी कर चुके हैं। सुरैया एक अच्छी अभिनेत्री होने के साथ ही एक बहुत अच्छी गायिका भी थीं। उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों में काम किया और 350 के करीब गीत गाए। उन्होंने न केवल अपने लिए बल्कि दूसरी नायिकाओं के लिए भी गीत गाए। वे अपने समय में भारत की सबसे मशहूर अदाकारा थीं। सुरैया के फिल्मी सफर से तो बाद की अभिनेत्रियों ने सीखा ही, उनका जीवन भी एक सबक रहा। उस दौर की लाखों किशोरियों-युवतियों ने सुरैया का अनुकरण किया। उनकी स्टाइल की चर्चा आज भी होती है। उनकी खास फिल्में हैं – ‘इशारा, ‘तदबीर, ‘फूल, ‘परवाना, ‘अनमोल घड़ी, ‘मिर्जा गालिब, ‘दिल्लगी, ‘दुनिया।

योगदान – सहज अभिनय, सहज गायन शैली, सजग शहरी लड़की, शहरी व्यवहार कुशलता, युवाओं के बीच आदर्श।

नरगिस

1929-1981

भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक चर्चित अभिनेत्रियों में सर्वश्रेष्ठ नरगिस कलात्मक परिपक्वता वाली सुसभ्य प्रभावी हस्ती थीं। नरगिस की चर्चा हम राज कपूर वाले अध्याय में भी कर चुके हैं। नरगिस का कला जीवन के साथ ही व्यक्तिगत जीवन भी सभी के लिए सबक बना। उनका सार्वजनिक जीवन भी अनुकरणीय है। ऐसे बहुत कम कलाकार होते हैं, जिनके हर कदम दूसरों के लिए रास्ता तैयार करते हैं। अपने मशहूर अभिनेता-नेता पति सुनील दत्त और अभिनेता पुत्र संजय दत्त के रूप में वे समृद्ध विरासत भी छोड़ गईं।

योगदान – शहरी सुसभ्यता, सुंदरता, कलात्मकता, प्रभावी अभिनय, व्यवहार कुशलता, युवाओं के बीच आदर्श, जीवन की अच्छी समझ, अपने जीवन का पूरे साहस के साथ निर्माण, राजनीति और फिल्म समाज के बीच कड़ी, सार्वजनिक जीवन में भी प्रभावी, समाज सेवा में सक्रिय।

मीना कुमारी

1933-1972

हिन्दी सिनेमा की सर्वाधिक सक्षम अभिनेत्रियों में से एक मीना कुमारी अपने आप में एक अलग मुकाम की तरह हैं। शायद ही कोई अभिनेत्री रही होगी, जो उनसे प्रभावित होने से बच गई हो। कलात्मक, सृजनशील, बुद्धिजीवी, विद्वान अभिनेत्री मीना कुमारी अपने आप में कलाकारी का स्कूल रही हैं। नृत्य, अभिनय, संवाद, प्रदर्शन, जीवन इत्यादि हर प्रकार से उन्होंने एक अलग ही परंपरा को जन्म दिया। मात्र 38 की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया, वरना जिस स्तर की वह अभिनेत्री थीं, उनको आगे जीवन में अनेक मुकाम हासिल होते। मीना कुमारी ने करीब 100 फिल्मों में काम किया। उनकी यादगार फिल्मों में शामिल है – ‘बैजू बावरा, ‘परिणीता, ‘साहिब बीवी और गुलाम, ‘काजल, ‘आजाद, ‘सहारा, ‘आरती, ‘मैं चुप रहूँगी, ‘दिल एक मंदिर, ‘फूल और पत्थर, ‘पाकिजा’।

योगदान – मदभरी सुंदरता, सौंदर्य का शाही अंदाज, सहज अभिनय, आकर्षक नृत्य, आँखों की अदाकारी, सृजन और बुद्धि के मामले में प्रेरक, प्रतिस्पद्र्धा के दौर में सहयोगी भाव वाली अभिनेत्री। बिंदास जीवन के साथ ही परंपराओं का भी पालन। जीवन में हर पल खुशी की तलाश और उसके लिए संघर्ष।

गीता बाली

1930-1965

भारतीय सिनेमा की बेहद सक्षम और चुलबुली अभिनेत्रियों में सर्वश्रेष्ठ गीता बाली बहुत कम समय में अपना गहरा प्रभाव सिनेमा समाज पर छोड़ गईं। गीता बाली की चर्चा हम देव आनंद के अध्याय में भी कर चुके हैं। उनमें गजब की ऊर्जा और प्रेरक क्षमता थी। वह अपने पति शम्मी कपूर के अलावा भी अनेक व्यक्तित्वों के निर्माण में बड़ी पे्ररक रहीं। कुदरत ने दुनिया में उन्हें भी बहुत कम समय दिया।

योगदान – खुशनुमा, साहसी, निडर, स्वाभाविक अभिनय, बड़े शहर की लड़की, युवाओं के बीच आदर्श।

मधुबाला

भारतीय सिनेमा की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में सर्वश्रेष्ठ मधुबाला सर्वाधिक चर्चित हैं। उन्होंने लोगों का खूब मनोरंजन किया और आज भी उन्हें बहुत सम्मान के साथ याद किया जाता है। मधुबाला की चर्चा हम सि‍नेमा ह‍िन्‍दुस्‍तानी पुस्‍तक के दिलीप कुमार और देव आनंद वाले अध्याय में विस्तार से कर चुके हैं। मधुबाला का कला और व्यक्तिगत जीवन दूसरों के लिए सबक और प्रेरणास्रोत है।

योगदान – बेमिसाल सुंदरता, बिंदास, स्मार्ट, मुखर, सहज आकर्षक अभिनय, चुलबुलापन, खुशी से भरपूर, सजग शहरी लड़की, युवाओं के बीच आदर्श।

नूतन

1936-1991

भारतीय सिनेमा में सबसे ज्यादा प्रशंसित और पुरस्कृत अभिनेत्री नूतन ने अपनी बेहद सक्षम माँ शोभना समर्थ की विरासत को बहुत खूब आगे बढ़ाया। वह अभिनय के मामले में सबसे आगे थीं। अभिनेत्रियों में सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ उन्हें ही मिलती थीं। केवल नाचने-गाने वाली भूमिकाओं से इतर नूतन ने गंभीर और प्रभावी महिला किरदारों को बहुत सहजता से अंजाम दिया। कोई ऐसा मौका नहीं आया, जब उन्होंने कला के साथ कोई समझौता किया हो। वह एक ऐसी अभिनेत्री थीं, जो बड़े-बड़े अभिनेताओं पर भी भारी पड़ती थीं और फिल्मों को अपनी कला के जोर पर चर्चित व सफल बनाती थीं। 90 से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने काम किया। उनकी खास फिल्में हैं – ‘सरस्वतीचंद्र, ‘सीमा, ‘छलिया, ‘तेरे घर के सामने, ‘सुजाता, ‘बंदिनी, ‘अनाड़ी, ‘मिलन, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की, ‘अनुराग, ‘सौदागर, ‘कर्मा’।

योगदान – अभिनेत्रियों के लिए प्रेरणास्रोत, सर्वश्रेष्ठ अभिनय, दूसरों से अलग करने और दिखने की कोशिश, मात्र सुंदर गुडिय़ा की छवि को तोड़ा, अर्थपूर्ण भूमिकाओं का निर्वहन, कला जीवन की सीमाओं का ध्यान, स्त्री के सम्मान के प्रति सचेत, व्यक्तिगत जीवन में भी सजग।

वैजयंतीमाला

हिन्दी सिनेमा की पहली प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय सुगढ़, सुंदर अभिनेत्री वैजयंतीमाला को भावपूर्ण अभिनय के साथ ही शानदार नृत्य के लिए भी पहचाना जाता है। वर्ष 1936 में जन्मीं वैजयंतीमाला ने हिन्दी सिनेमाई नृत्य को शास्त्रीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनके पहले की ज्यादातर अभिनेत्रियों को सामान्य नृत्य या ज्यादा से ज्यादा कथक की कुछ मुद्राओं के साथ देखा गया था, लेकिन वैजयंतीमाला ने भारतनाट्यम जैसी आकर्षक नृत्य शैली के साथ रुपहले पर्दे पर सबका ध्यान खींचा। सुंदर कजरारे नयन, नृत्य के पैमाने पर उन जैसी सधी हुई देह और विशेष मुकुटनुमा केशसज्जा यादगार है। 60 से ज्यादा बेहतर फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्री की प्रमुख फिल्में हैं – ‘देवदास, ‘नया दौर, ‘मधुमती, ‘गंगा जुमना, ‘संगम, ‘आम्रपाली, ‘ज्वैल थीफ, ‘सूरज, ‘गंवार।

योगदान – दक्षिण भारतीय सौंदर्य को मुख्यधारा में पहचान, भारतीय शास्त्रीय नृत्य और नृत्यांगनाओं को पूरा सम्मान, देह की सुगढ़ता, अभिनय भी नृत्य का ही विस्तार है, उन्होंने अपने प्रदर्शन से सिद्ध किया। राजनीति और संसद में भी सक्रियता।

माला सिन्हा

हमेशा चुनौतियों का स्वागत करने वाली नेपाली-बांगला मूल की सुंदर भाव-भंगिमा संपन्न अभिनेत्री माला सिन्हा, जो कुछ खोने के प्रति ज्यादा चिंतित नहीं थीं। ऐसी भूमिकाओं को भी उन्होंने स्वीकार किया, जिसे दूसरी अभिनेत्रियों ने अपनी छवि की रक्षा के लिए ठुकरा दिया। सितारा भाव की बजाय माला सिन्हा ने अभिनेत्री भाव को ही आगे बढ़ाया। वर्ष 1936 में जन्मीं माला सिन्हा ने 100 से ज्यादा बेहतर हिन्दी व बांगला फिल्मों में काम किया। उन्हें धूल का फूल, प्यासा, जहाँ आरा, हिमालय की गोद में, बहुरानी, अनपढ़, बहारें फिर भी आएँगी, हरियाली और रास्ता के लिए याद किया जाता है।

योगदान – मोहक अदाओं, भाव मुद्राओं के लिए प्रेरक, नई भूमिकाओं की चुनौतियों का स्वागत, नेपाली और बांगला समाज को हिन्दी फिल्मों से जोडऩे में योगदान, व्यावसायिक और पेशेवर रूप से सजग।

हेलेन

हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ नाचने वाली या नृत्यांगना हेलेन को भले ही मुख्य भूमिकाएँ नहीं मिलीं, लेकिन उन्होंने छोटी भूमिकाओं और अपने मोहक, मादक नृत्यों के जरिये दर्शकों को खूब लुभाया। वर्ष 1938 में जन्मीं हेलेन सहज उपलब्ध होने का अहसास कराती थीं, इसलिए उनकी चर्चा हमेशा रहती थी। एक समय हर दूसरी फिल्म में हेलेन का नृत्य या कैबरे डांस रखना पड़ता था। अभिनेत्री न होते हुए भी उनके हिस्से में खूब गाने आए, जो मस्ती भरे थे, जो किसी उत्सव, क्लब या पार्टी का हिस्सा बने। अनेक भाषाओं की करीब 600 फिल्मों में काम करने वाली हेलेन की प्रमुख हिन्दी फिल्में हैं – ‘हावड़ा ब्रीज, ‘इंतकाम, ‘कारवां, ‘शिकार, ‘डॉन, ‘ऐलान, ‘लहू के दो रंग’।  

योगदान – उत्सवों और पार्टियों की जान, आकर्षक नृत्य और देह मुद्राओं का महत्व स्थापित हुआ, समूह नृत्य की बजाय एकल नृत्य का महत्व बढ़ा, नृत्यांगनाओं और नर्तकों के लिए आज भी प्रेरक, समाज में नृत्य सीखने की ललक बढ़ी।

वहीदा रहमान

हिन्दी सिनेमा की एक सशक्त विचारवान और कुशल अभिनेत्री वहीदा रहमान को उनके शानदार कला प्रदर्शन के लिए पहचाना जाता है। वर्ष 1938 में जन्मीं वहीदा का नाम परंपरा अनुसार अनुकूल नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने नाम को बदलने से इनकार कर दिया था। यह अपने आप में एक बड़ी बात थी कि वह अपने समय में नई अभिनेत्री होने के बावजूद अपना स्वतंत्र विचार रखती थीं। व्यावसायिक सफलता के साथ ही कलात्मक सफलता भी उन्हें खूब मिली। जब उनका दौर ढलने लगा, तब उन्होंने अपने आप को बहुत बेहतर तरीके से अपने परिवार के लिए समेटा, लेकिन सिनेमा दुनिया से पूरी गरिमा के साथ जुड़ी रहीं। 70 से ज्यादा बेहतरीन फिल्मों में अभिनय करने वाली वहीदा की प्रमुख फिल्में हैं – ‘प्यासा, ‘कागज के फूल, ‘साहिब बीवी और गुलाम, ‘गाइड, ‘चौदहवीं का चांद, ‘बीस साल बाद, ‘तीसरी कसम, ‘राम और श्याम, ‘फागुन, ‘मुझे जीने दो, ‘नीलकमल, ‘खामोशी, ‘प्रेम पुजारी, ‘कभी कभी, ‘नमकीन, ‘लमहे ।

योगदान – भारतीय सुंदरता, सुसभ्य, संवाद अदायगी, बेहतर नृत्य और सहज अभिनय, उन्होंने संभ्रांत मुस्लिम परिवारों की लड़कियों को भी फिल्मों में आने के लिए प्रेरित किया, चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को भी साकार किया।

आशा पारेख

भारतीय सिनेमा में भावपूर्ण अभिनय और नृत्य के लिहाज से आशा पारेख अग्रणी अभिनेत्री हैं। भारतीय परंपरा के अनुरूप पर्दे पर प्रेम और रोमांस की शानदार प्रस्तुति, गरिमामय गंभीर दृश्यों के अलावा तनावपूर्ण दृश्यों में भी आशा पारेख लाजवाब हैं। वर्ष 1942 में जन्मीं आशा का चेहरा अभिनय के लिए बेहद उर्वर रहा, हर तरह के भाव खुलकर निखरते थे – बड़ी-बड़ी आँखें, सुगढ़ नासिका, भरे-भरे होंठ, चेहरे का एक दुर्लभ आकार। दुखी दिखती थीं, तो सबको रुला देती थीं और खुश दिखती थीं, तो कली-कली मुस्कराने लगती थी। करीब 80 शानदार फिल्मों में भूमिका निभाने वाली आशा की प्रमुख फिल्में हैं – ‘कटी पतंग, ‘उधार का सिंदूर, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की, ‘जब प्यार किसी से होता है, ‘फिर वही दिल लाया हूँ, ‘कारवां, ‘बिन फेरे हम तेरे, ‘आया सावन झूम के, ‘उपकार, ‘मेरे सनम, ‘तीसरी मंजिल, ‘समाधी, ‘घराना, ‘कन्यादान, ‘आए दिन बहार के, ‘मेरा गाँव मेरा देश’।

योगदान – गहरा सौंदर्य, तीखे नैन-नक्स, पात्रों में डूब जाने में माहिर, भिन्न-भिन्न किरदारों की चुनौती को स्वीकार करना। अपने समय में युवाओं की आदर्श। उनकी सजावट और शैली का गाँवों से शहर तक अनुकरण हुआ।

शर्मिला टैगोर

भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ सम्मानित अभिनेत्रियों में अग्रणी शर्मिला टैगोर (जन्म – 1944) ने किसी भी चुनौतीपूर्ण भूमिका से कभी परहेज नहीं किया। वह अभिनय के प्रति समर्पित रहीं और उम्रदराज किरदारों को निभाने में भी पीछे नहीं रहती थीं। अमीरी के साथ ही गरीबी को भी समान गुणवत्ता के साथ प्रदर्शित करने में सक्षम शर्मिला को उनकी मुस्कान, डिंपल और बेहतरीन अभिनय के लिए याद किया जाता है। वे प्रयोगधर्मी निर्देशकों की पहली पसंद थीं। मशहूर फिल्मकार सत्यजित राय की बांगला फिल्मों में भी उन्होंने अपनी कला को सिद्ध किया। 90 से ज्यादा हिन्दी और बांगला फिल्मों में उन्होंने काम किया और उन्हें ‘आराधना, ‘मौसम, ‘चुपके चुपके, ‘अमर प्रेम, ‘त्याग, ‘अनुपमा, ‘चरित्रहीन, ‘सफर, ‘यकीन, ‘आ गले लग जा, ‘कश्मीर की कली, ‘आविष्कार के लिए ज्यादा पहचाना जाता है।

योगदान – अभिनेत्रियों में एक सर्वश्रेष्ठ प्रेरणा स्रोत। शुद्ध अभिनेत्री। गाँव से विदेश तक सहज। ग्लैमर से गंभीरता तक बेमिसाल। अच्छे कला कर्म के प्रति समर्पित, चरित्रों में उतरने की कला में माहिर, सहज भावपूर्ण अभिनय, सौंदर्य के साथ ही विद्वता की भी प्रतिनिधि और प्रेरक, कोई भूमिका निभाने में किसी तरह का बंधन या परहेज नहीं।

हेमा मालिनी

भारतीय सिनेमा की ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी (जन्म 1948) एक मिथक की तरह हैं। अभिनेत्री के रूप में एक ऐसा नाम, जो अपने आप में सुंदरता और कला का एक मुहावरा है। दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करके गली-गली में मशहूर हेमा मालिनी भारतीय सिनेमा की अति सक्रिय अभिनेत्रियों में शामिल रही हैं। अभिनय दुनिया से अलग उनका नृत्य प्रेम अलग से रेखांकित करने लायक है। इसके अलावा राजनीति के प्रति उनका झुकाव भी उन्हें दूसरी तमाम नायिकाओं से अलग कर देता है। सांसद रहते हुए लंबा अरसा होने के बावजूद उनकी छवि एक सजग अभिनेत्री के रूप में कायम है। वह भारतीय सिनेमा की एक सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि हैं। 125 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुकीं हेमा को ‘शोले, ‘सीता और गीता, ‘अंदाज, ‘मीरा, ‘ड्रीम गर्ल, ‘जॉनी मेरा नाम, ‘नसीब, ‘अंधा कानून, ‘प्रेम नगर, ‘कुदरत, ‘सत्ते पे सत्ता, ‘रजिया सुल्तान, ‘रिहाई, ‘एक चादर मैली सी, ‘बागबाँ’ के लिए खूब सराहा जाता है।

योगदान – भारत में स्त्री शक्ति की एक प्रतीक, निरंतर सक्रियता, ग्लैमर, असीम ऊर्जा, पूर्णत: आत्मनिर्भर नायिका, कुशल नृत्यांगना, दक्षिण भारतीय सौंदर्य की सबसे सफल प्रतिनिधि, व्यावसायिकता के साथ ही कलात्मकता को समान रूप से भाव देना, अपने नृत्य ज्ञान व कला प्रदर्शन को स्वतंत्र रूप से जीवित रखना, राजनीति के माध्यम से सेवा और सक्रियता।

मौसमी चटर्जी

शुद्ध भारतीय देशी सौंदर्य की प्रतिनिधि मौसमी चटर्जी हिन्दी फिल्मों में तब आईं, जब उनका विवाह हो चुका था। देशी बेटी, देशी प्रेमिका, देशी पत्नी की भूमिकाओं को मौसमी ने पर्दे पर साकार कर दिया। वर्ष 1948 में जन्मीं मौसमी ने अपनी पहली ही फिल्म ‘अनुराग’ में एक अंधी लड़की का किरदार निभाकर सबको मोहित कर दिया। वह दर्शकों में घरेलू अहसास पैदा करने वाली नायिका थीं, उन्होंने 110 से ज्यादा बेहतर हिन्दी और बांगला फिल्मों में काम किया। उनकी यादगार फिल्में हैं – ‘बालिका वधू’ (बांगला), ‘अनुराग, ‘अंगूर, ‘प्यासा सावन, ‘स्वयंवर, ‘मंजिल, ‘इतनी सी बात’।

योगदान – सहज देशी सौंदर्य की सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि, अपनी छवि को लेकर सजग, गंभीर सहज अभिनय, परंपरा, मर्यादा का पालन, घरेलू या अच्छी लड़कियों, महिलाओं के लिए प्रेरक, विवाह के बाद भी सिनेमा दुनिया में सक्रियता की एक मिसाल।

जया भादुड़ी

भारतीय सिनेमा की एक शुद्ध अभिनेत्री, जिन्होंने अपनी सीमाओं के बावजूद जब भी मौका मिला उच्च स्तरीय अभिनय किया। बेहद सम्मानित जया भादुड़ी (जन्म 1948) ने व्यावहारिकता, समकालीनता, परिवार प्रेम, जीवन की सहजता को कायम रखा है। वे राजनीति में भी सक्रिय हैं। इनकी चर्चा हम अमिताभ बच्चन वाले अध्याय में भी कर चुके हैं।

योगदान – अभिनय के प्रति समर्पित, प्रशिक्षण और अभ्यास का महत्व, अपनी सीमा में रहते बहुत आकर्षक अभिनय, छोटी भूमिकाओं को भी यादगार बना देना, बेहतर भूमिकाओं का चयन, किसी भी तरह की अंधी दौड़ में कभी शामिल नहीं हुईं, जब जरूरी लगा, तब काम किया।

रेखा

भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक चर्चित और विवादित अभिनेत्री रेखा (जन्म 1954) आज एक मिथक हैं। उनकी लोकप्रियता उन समुदायों तक भी है, जिन्होंने उनकी फिल्मों को नहीं देखा है। बिंदास अंदाज में मुक्त जीवन जीने वाली रेखा कला, अभिनय, नृत्य, भाव अभिव्यक्ति, संवाद अदायगी की एक मिसाल हैं। रेखा भी दर्शकों को सहज उपलब्ध होने का अहसास कराती रही हैं, इसलिए उन्हें याद करने वालों की संख्या बहुत है। विवादों के बावजूद कलात्मकता में उनका कोई मुकाबला नहीं है। हमेशा दुल्हन की तरह सजकर स्त्री होने का आनंद उठाने वाली रेखा दुर्लभ कलाकार हैं। करीब 150 फिल्मों में वे काम कर चुकी हैं, लेकिन उन्हें ‘उमराव जान, ‘इजाजत, ‘कलयुग, ‘मुकद्दर का सिकंदर, ‘सिलसिला, ‘आंचल, ‘संसार, ‘उत्सव, ‘दो अनजाने, ‘आलाप, ‘घर’ के लिए पहचाना जाता है।

योगदान – सौंदर्य की दुनिया के लिए प्रेरक, ग्लैमरस, अपने आपको निरंतर सुधारना, स्वयं को समय, कला और आवश्यकता के अनुरूप गढऩा, प्रयास करके स्वयं को आदर्श भारतीय सौंदर्य का प्रतीक बना लेना, स्त्री होने का उत्सव, आजाद खयाल किंतु परंपराओं का भी ध्यान, गीतों पर प्रभावी नृत्य-अभिनय, चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं का स्वागत, सबसे बेहतर संवाद अदायगी, कुशल साज-सज्जा, स्वयं को बेहतर स्वरूप में प्रस्तुत करना, भारतीय परिधान साड़ी की एक ब्रांड अंबेसडर।

साधना

1941-2015

हिन्दी सिनेमा की पहली ऐसी अभिनेत्री, जिनके नाम से एक विशेष हेयर स्टाइल आज भी चर्चित है। चौड़े और थोड़े गोल माथे को छिपाने के लिए बालों को आगे किया गया और बन गया आकर्षक हेयर स्टाइल – साधना कट। उनका सौंदर्य अनायास किसी रहस्य का आभास कराता है। थ्रिलर फिल्मों के लिए उनकी छवि सर्वाधिक उपयुक्त थी। करीब 30 फिल्मों में काम करने वाली साधना शिवदासानी को ‘हम दोनों, ‘वो कौन थी, ‘अनीता, ‘वक्त, ‘मेरा साया, ‘राजकुमार, ‘इंतकाम, ‘एक फूल दो माली, ‘आप आए बहार आई’ के लिए ज्यादा याद किया जाता है।

योगदान : अपना चेहरा अपना स्टाइल। हेयर स्टाइल का महत्व केवल सिनेमा जगत में नहीं, बल्कि समाज में भी ज्यादा अच्छी तरह से स्थापित हुआ। स्थायी किशोरी भाव वाली कुशल अभिनेत्री। समाज के सभी वर्गों में अपनी स्टाइल की वजह से लोकप्रिय।

मुमताज

भारतीय सिनेमा में ग्लैमर, कुशल नृत्य और सुंदरता के लिए अपनी पहचान रखने वाली मुमताज कस्बाई और छोटे शहरों की प्रतिनिधि रहीं। 1947 में जन्मीं मुमताज ने लंबे संघर्ष से अर्जित कुशलता से अपना मुकाम बनाया। चेहरे से खुशदिल, मादक मुमताज भी दर्शकों को सहज उपलब्ध होने का अहसास कराती थीं, इसलिए उनकी लोकप्रियता दर्शकों के हर वर्ग में थी। एक समय वे युवाओं के सपनों की रानी थीं। करीब 80 ठीक-ठाक फिल्मों में काम करने वाली मुमताज की प्रमुख फिल्में हैं – ‘दो रास्ते, ‘बंधन, ‘सच्चा झूठा, ‘खिलौना, ‘राम और श्याम, ‘आदमी और इंसान, ‘लोफर, ‘आपकी कसम, ‘रोटी’।

योगदान – गीतों पर प्रभावी नृत्य-अभिनय, अवसर का बेहतर उपयोग, किसी भी अच्छे अवसर को हाथ से न जाने देना, संघर्ष से मुकाम हासिल करना, सीमित सौंदर्य में भी नृत्य, भाव भंगिमा के जरिये आकर्षण पैदा करना, दर्शकों को सोचने के लिए मजबूर करना, अन्य कलाकारों के साथ सहयोगी भाव-तालमेल की कला।

परवीन बॉबी

1949-2005

हिन्दी सिनेमा के महानगरीय पहलू को सशक्त करने वाली आधुनिक रंग-ढंग की पहली अमिनेत्री परवीन बॉबी की मोहकता आज भी लोग भूले नहीं हैं। उनका रूप लावण्य, उनकी संवाद शैली, अभिनय, उनका पहनावा आपको परंपरा से अलग संभ्रांत उच्चवर्गीयता का अहसास कराता है। वह भारतीय दर्शकों को सपने दिखाने वाली अभिनेत्रियों में शामिल हैं। परवीन ने करीब 45 प्रभावी फिल्मों में काम किया, जिनमें से प्रमुख हैं – ‘मजबूर, ‘अमर अकबर एंथोनी, ‘सुहाग, ‘शान, ‘दीवार, ‘महान, ‘क्रांति’।

योगदान – ग्लैमरस, स्मार्ट और मुखर सौंदर्य, महानगरीय लड़कियों के बीच आदर्श, देह और सौंदर्य का उपयोग, आधुनिकता को जीवंत किया, महानगरीय प्रभाव की अभिव्यक्ति।

जीनत अमान

प्रदर्शन की दुनिया में देह के स्थूल प्रयोग से कौन बचा है, न व्यावसायिक बिरादरी, न शुद्ध कला समाज। हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा में देह के उपयोग से उत्तेजना का नया दौर शुरू करने वाली जीनत को भुलाया नहीं जा सकता। वर्ष 1951 में जन्मीं जीनत पर देह की माया इस तरह हावी थी कि उनकी कलात्मकता की चर्चा ज्यादा नहीं हो सकी। व्यावसायिकता की दिशा में सिनेमा मुड़ा और एक चाह (टैस्ट) दर्शकों के बीच पैदा हुई, जिसने जीनत को आखिर तक उबरने न दिया। वह महानगरीय उच्च वर्ग की प्रतिनिधि के रूप में ज्यादा देखी गईं। 70 से ज्यादा सफल फिल्मों में काम करने वाली जीनत को ‘हरे रामा हरे कृष्णा, ‘सत्यम शिवम सुंदरम, ‘डॉन, ‘लावारिस, ‘रोटी कपड़ा और मकान, ‘पापी, ‘यादों की बारात, ‘कुर्बानी’ के लिए पहचाना जाता है।

योगदान – ग्लैमरस, देह का कोरा उपयोग बढ़ा, स्मार्ट और मुखर सौंदर्य, समाज विशेष में आदर्श युवती, जीवंत व्यावसायिक आधुनिकता, महानगरीय प्रभाव की अभिव्यक्ति।

शबाना आजमी

विश्व सिनेमा की बेहद सक्षम अभिनेत्रियों में शामिल शबाना आजमी व्यावसायिकता और कलात्मकता के बीच एक सफल सेतु की तरह रही हैं। वर्ष 1950 में जन्मीं शबाना ने चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं से कभी परहेज नहीं किया। खूब अच्छा काम किया, एक नई अभिनय धारा को आगे बढ़ाया, खूब सम्मानित हुईं। विद्वता और तर्क के साथ अपने करियर को आगे बढ़ाया। 125 शानदार फिल्मों में वह अब तक काम कर चुकी हैं, जिनमें से प्रमुख हैं – ‘अंकुर, ‘अर्थ, ‘खंडहर, ‘पार, ‘गॉड मदर, ‘मंडी, ‘मासूम, ‘निशांत, ‘जुनून, ‘शतरंज के खिलाड़ी, ‘अमर दीप, ‘फायर’ इत्यादि फिल्मों के लिए ज्यादा याद किया जाता है।

योगदान – भारतीय सिनेमा का अंतरराष्ट्रीय चेहरा, शुद्ध सिनेमा के लिए एक सफल प्रेरक, शुद्ध भारतीय ब्रांड, कला और व्यवसाय – दोनों को महत्व, यथार्थवादी अभिनय धारा को सशक्त किया, समांतर सिनेमा की मजबूत नींव रखी।  

स्मिता पाटिल

1955-1986

शुद्ध सिनेमा विधा की पवित्रता को सुस्थापित करने में अग्रणी अभिनेत्री स्मिता पाटिल अपने आप में एक विद्यालय की तरह रहीं। व्यावसायिक सिनेमा ने भी उनका लाभ उठाया, लेकिन वह वास्तव में समांतर सिनेमा विधा की नींव बनीं। शानदार अभिनय के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यावसायिक और कलात्मक रूप से सम्मानित हुईं। उन्होंने सिद्ध किया कि अभिनेत्रियों को केवल नाचना-गाना और रोमांस करना ही नहीं आता, वे वास्तव में कलाकार हैं और कला के दम पर अपना इतिहास लिख सकती हैं। करीब 75 शानदार हिन्दी और मराठी फिल्मों में उन्होंने काम किया। कला की धनी कलाकार किस्मत की ज्यादा धनी नहीं थीं। मात्र 31 वर्ष की आयु उन्हें नसीब हुई। उन्हें ‘मंथन, ‘भूमिका, ‘आक्रोश, ‘चक्र, ‘मिर्च मसाला, ‘अर्थ, ‘बाजार, ‘मंडी’ के लिए बहुत याद किया जाता है।

योगदान – बेहतर अभिनय का कोई विकल्प नहीं, अर्थपूर्ण भूमिकाओं को मजबूत किया, यथार्थवादी या समांतर सिनेमा को सशक्त किया, शानदार अभिनय, अभिव्यक्ति, संवाद अदायगी, अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के लिए सदा प्रेरक।

नीतू सिंह

भारतीय सिनेमा में जिन अभिनेत्रियों को नवयुवा या किशोरी स्वरूप में देखा गया उनमें नीतू सिंह अग्रणी हैं। चुलबुलापन, मुखर शैली, किशोरी की तरह संवाद अदायगी, पहनावा। वर्ष 1953 में जन्मीं नीतू सिंह हवा के नए झौंके की तरह आई थीं और ताजगी का अहसास कराती थीं। हालाँकि ऋषि कपूर से विवाह के बाद काफी कम आयु 26-27 की उम्र में उन्होंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया और फिर करीब 26 साल बाद नई सदी में वे चरित्र भूमिकाओं में लौटीं। बाल कलाकार बेबी सोनिया के रूप में उनका काम अनुकरणीय है। बाल कलाकारों के बीच भी उन्हें जरूर याद किया जाता है। बामुश्किल 8 वर्ष के वयस्क करियर में 50 से ज्यादा अच्छी प्रभावी फिल्मों में काम करने वाली नीतू सिंह को ‘रफू चक्कर’, ‘धर्मवीर, ‘अमर अकबर एंथोनी, ‘सेवक, ‘दूसरा आदमी, ‘दुनिया मेरी जेब में, ‘परवरिश, ‘खेल खेल में, ‘कभी कभी, ‘चोरनी, ‘प्रियतमा, ‘ढोंगी’ के लिए ज्यादा सराहा जाता है।

योगदान : बाल कलाकार के रूप में अनुकरणीय। वयस्क कलाकार के रूप में खुशनुमा भाव, सहज और मुखर अभिनय, बिंदास, आधुनिक विचार, व्यवहार की अभिनेत्री।