न्याय की गुहार लिए बस एक टेलीग्राम

अडूर गोपालकृष्णन, मशहूर फिल्मकार

\"\"बादल जब अपने भारत आगमन का बिगुल बजा देते हैं, तब सबको पता है, वे आएंगे और सबसे पहले केरल को नहलाएंगे। ठीक पचास साल पहले भी यही सब हो रहा था, लेकिन उसी समय केरल में एक ऐसे युवा फिल्म निर्देशक थे, जो बहुत निराश थे। लगभग सात साल इंतजार के बाद एक फीचर फिल्म बनाई थी, लेकिन ऐसा लगता था कि उस फिल्म को लोग झुठलाने में जुटे हों। चालू फिल्मों की भीड़ में एक अलहदा मुकम्मल फिल्म को किनारे लगाने या भुलाने की साजिशें हो रही थीं। बहुत उम्मीद थी कि लोग अलग सी इस फिल्म को हाथोंहाथ लेंगे, लेकिन फिल्म बिरादरी ही पीछे पड़ जाए, तो आम दर्शकों को क्या कहा जाए? उस 31 वर्षीय युवा निर्देशक के साथ यही हो रहा था।

अव्वल तो फिल्म के लिए पैसे जुटाने में ही खूब मुश्किलें आई थीं, निर्माण में कुल ढाई लाख रुपये लग गए थे। पूरे उधार के पैसे से ही वह फिल्म बनी थी। पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट से पढ़कर निकले इस युवा को अगली फिल्म के लिए भला कौन पैसे देता? फिल्म न सिनेमा हॉल में कमाई कर पाई थी और न कोई पुरस्कार नसीब हुआ था। फिल्म मास्को फिल्मोत्सव में भी गई थी। भारत से गई सभी फिल्मों को कोई न कोई पुरस्कार मिला था, लेकिन यह युवा निर्देशक खाली हाथ लौटे थे। इस युवा निर्देशक को एक दुख यह भी था कि तमिल सिनेमा के एक बड़े अभिनेता, जो बाद में अपने राज्य के मुख्यमंत्री भी हुए, मास्को साथ गए थे। वहां दोनों के बीच खूब बातचीत हुई थी, युवा निर्देशक ने तमिल सुपर स्टार अभिनेता के लिए बहुत मेहनत से भाषण का अनुवाद किया था। उस भाषण की खूब तारीफ हुई थी, लेकिन भारत लौटकर तमिल स्टार ने आलोचना और निंदा के साथ एहसान चुका दिया।

बड़ी उम्मीद थी कि दक्षिण का फिल्म बोर्ड इस अलग सी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भेजेगा, लेकिन वहां भी घाघ निर्देशकों ने फिल्म को नालायक करार दिया। उन निर्देशकों को लगा कि सिनेमा पढ़कर निकले किसी नए निर्देशक का भाव क्यों बढ़ाया जाए। खैर, जब सूचना मिली कि फिल्म राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भी नहीं भेजी गई है, तब दिल टूट गया। बडे़ सम्मान की उम्मीद थी, लेकिन अपमान की घटनाएं दिमाग में सिलसिलेवार चल पड़ीं। पहले मास्को में उपेक्षा, फिर मास्को से लौटकर मीडिया के हमले। एक सिने पत्रिका ने तो यहां तक लिख दिया कि इस निर्देशक की फिल्म ने मास्को में भारत को शर्मसार कर दिया। और उस बड़े तमिल स्टार ने मीडिया को बताया कि केरल का युवा निर्देशक मास्को में भारत की गरीबी बेच रहा था। कभी पथेर पांचाली  फिल्म के बाद सत्यजित राय पर भी यही आरोप लगाया गया था। निराशा के पलों में ऐसा ही होता है, तमाम नई-पुरानी मुश्किलें बेतरतीब उमड़ आती हैं।

कुछ पल को ऐसा भी लगा कि सिनेमा जीवन का अंत हो जाएगा, सारे रास्ते बंद नजर आने लगे। फिर अचानक दिमाग में यह बात भी आई कि ऐसे कैसे हार मान जाएं? अपनी मेहनत बेकार क्यों जाने दें? क्षेत्रीय बोर्ड ने नाइंसाफी की है, तो केंद्रीय बोर्ड तक बात जरूर पहुंचनी चाहिए। ज्यादा समय नहीं था, किसी सामान्य पत्र का केंद्रीय बोर्ड तक पहुंचना मुश्किल था। न सीधे कोई फोन नंबर था और न ई-मेल का जमाना था। तब युवा निर्देशक ने एक लंबा टेलीग्राम किया। वह कलम के धनी थे ही, पूरे एहसास को अल्फाज में उडे़लकर भेज दिया। तब टेलीग्राम की यह खासियत थी, वह इधर-उधर भटकता नहीं था। राष्ट्रीय पुरस्कार समिति के अध्यक्ष रमेश थापर तक गुहार पहुंच गई। लिखित में कोई जवाब तो नहीं आया, लेकिन एक दिन दोस्तों के साथ चाय पीते हुए रेडियो पर खबर सुनाई पड़ी, केरल के निर्देशक श्रीमान अडूर गोपालकृष्णन की फिल्म स्वयंवरम  को चार-चार राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं- सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और सर्वश्रेष्ठ सिनेमॉटोग्राफर। राष्ट्रीय चयन बोर्ड ने सार्थक सिनेमा का सम्मान किया, तब केरल ही नहीं, भारतीय सिनेमा ने भी नई करवट ली। फिल्म में न कोई गीत था, न नृत्य, और न कोई विदूषक। मुख्यधारा सिनेमा की नाटकीयता से दूर पूरी तरह यथार्थवादी फिल्म थी। फिर भी लोग इसे देखने उमड़ पड़े थे। अपनी मर्जी से शादी करने वाली एक लड़की के संघर्ष की बेबाक कहानी देख लोग चकित थे।

फिल्म ने देखते-देखते धन-मान की इतनी कमाई कर ली कि अडूर ऋणमुक्त होकर रातोंरात संपन्न व प्रसिद्ध हो गए। उनके एक टेलीग्राम ने इतिहास रच दिया। भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहेब फालके से सम्मानित अडूर कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं। स्वयंवरम  को पचास साल हो गए, लेकिन उसकी चर्चा आज भी जारी है।

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