मां के आंसुओं से उपजे महामना मदन मोहन मालवीय

मदन मोहन मालवीय

महान शिक्षक और राजनेता

संसार में अधिकतर लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। उन्हें लगता ही नहीं है कि दूसरों के हित में भी सोचना चाहिए। यहां तक कि उन्हें अपने निकट परिजन, परिवार की भी चिंता नहीं सताती है। ऐसे लोगों के लिए एक ऐसा घोंसला होता है घर, जहां वे केवल दाना-पानी और आराम फरमाने के लिए लौटते हैं। उन्हें भूख लगती है, तो घर आते हैं, पर घर आकर यह नहीं सोचते कि थाली में भोजन कहां से आया है, किसके परिश्रम से आया है?

कुछ ऐसी ही कहानी यहां भी थी। मां अपने उस बेटे के लिए हमेशा रोटियां बचाकर रखती थीं, जो सदा देश-दुनिया की चिंता में डूबा रहता था। मां को पता था कि बेटा जब भी आएगा, भूखा होगा और तब उसके सामने भोजन परोसना होगा। यही क्रम वर्षों से बना हुआ था। बेटा 23 का हो चला था, खूब पढ़ता था और पढ़ने से भी ज्यादा सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहता था। एक बार तो वह समाज में ऐसे व्यस्त हुआ कि बीए की परीक्षा में फेल हो गया, पर उसकी मां ने कभी कमी का एहसास न होने दिया। घर से निश्चिंत बेटे की सक्रियता समाज में बढ़ती ही चली गई। खैर, अगले साल वह बीए पास कर गया, तो मां को खुशी हुई कि चलो, अब बेटा परिवार की जिम्मेदारी उठाएगा, पर बेटे की प्राथमिकता में परिवार नहीं था। उसके मन में भारतीय शास्त्रों का व्याख्याता बनने और धार्मिक प्रवचन देने की तीव्र इच्छा थी। वह अपना जीवन सनातन की सेवा में समर्पित करना चाहता था। उसने एमए में प्रवेश ले लिया, तब भी उसके साथ एक ऐसी मां थी, जिन्होंने पुत्र-सेवा में कोई कमी न छोड़ी। बेटे को जरूरी सुविधाओं से सदा घेरे रखा। खैर, हर बात की एक सीमा होती है।

एक दिन उस युवक के रिश्तेदार नौकरी का प्रस्ताव लेकर आए। इंटर कॉलेज में शिक्षक की नौकरी थी, पर युवक ने साफ मना कर दिया कि उसे और पढ़ना है। तब उस रिश्तेदार ने ही उलाहना दिया कि तुम्हें अपने परिवार का पता है? माली हालात खराब होती जा रही है। तुम्हारी मां दिन में एक बार भोजन करती हैं, रोटियां बचाती हैं, ताकि जब तुम बाहर से लौटो, तो तुम्हारी भूख का समाधान हो। एक तुम हो, पूरी दुनिया का हाल पता है, पर अपने ही घर में तुमने कभी झांककर देखा नहीं कि घर आखिर तुम्हारी सेवा कैसे कर रहा है? यह सुनकर युवक को झटका-सा लगा। जब वह घर पहुंचा, तो मां की आंखों में आंसू थे। मां को पहले ही पता लग गया था कि बेटे ने नौकरी से मना कर दिया है। मां ने उदास स्वर में ही बेटे को आश्वस्त किया कि तुम चिंता मत करो, तुम्हें जो अच्छा लगे, करो। मुझे कोई समस्या नहीं है। जैसे अब तक चलता रहा है, वैसे ही आगे भी चलता रहेगा।

परिवार के प्रति अपने कर्तव्य से दूर रहने वाला युवा स्तब्ध रह गया। मां की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे। उन आंसुओं में इतनी गहराई थी कि युवक की तमाम मुरादें डूब जाने को बेताब होने लगी थीं। बेटे ने रूंधे गले से ही कहा था- मां, आप अब एक शब्द भी न बोलिए। मैं यह नौकरी जरूर करूंगा।

बेटा तत्काल इंटर कॉलेज गया और नौकरी के लिए आवेदन कर दिया। नौकरी मिल गई, चालीस रुपये महीना। वह इतना अच्छा शिक्षक साबित हुआ कि दो महीने में ही तनख्वाह बढ़कर 60 रुपये हो गई। उन दिनों यह ठीक-ठाक रकम हुआ करती थी, जब प्रति तोला सोने का भाव 20 रुपये भी नहीं था।

परिवार की जिम्मेदार का जैसे ही एहसास हुआ, जीवन का कायाकल्प हो गया। रोजमर्रा का काम बदला, तो उन्होंने अपना नाम भी बदल लिया। मल्लई से मालवीय हो गए और लोग उन्हें पंडित मदन मोहन मालवीय के नाम से जानने लगे।

अपने परिवार की खातिर एमए करने का इरादा टल गया, तो फिर उन्होंने कभी एमए न किया, जरूरत ही नहीं पड़ी। वह एक शिक्षक के रूप में इतने प्रसिद्ध हुए कि जीवन तेजी से बढ़ चला। हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और फारसी के विद्वान को पूरा इलाहाबाद जानने लगा। ज्ञान क्षेत्र से कुछ अलग वह कर्मक्षेत्र में ऐसे कूदे कि एक के बाद एक संस्थाएं बनाते चले गए। भाषा, हिंदी, समाज, सनातन, राजनीति, शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जितने संस्थान खड़े किए, उतना शायद किसी ने नहीं किए। मदन मोहन मालवीय (1861-1946) के काम इतने विविध हैं कि उनसे किसी राजनेता की तुलना नहीं हो सकती। कांग्रेस अध्यक्ष रहने से लेकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना तक उनके अनुपम कार्यों को देख उन्हें महामना कहा गया। हालांकि, वह बुनियादी रूप से शिक्षक ही रहे। अब जब 5 अक्तूबर को विश्व शिक्षक दिवस मनाया जाता है, तब भारत ही नहीं, दुनिया के बेहतरीन शिक्षकों में उनकी गणना बहुत गर्व से होती है।

यह भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है कि अपनी मां के आंसुओं से उपजे थे भारतरत्न महामना।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *