भोजपुरी के सबसे बड़े गीतकार की राम कहानी
महेंद्र मिसिर
भोजपुरी गीतकार व गायक
वह दादी के दुलारे थे। उन्हें दादी ने ही महादेव के मंदिर महेंद्रनाथ में माथा टेकते मांगा था। सब मान रहे थे कि महेंद्रनाथ के प्रताप से ही पत्थर पर पुष्प खिला है, आंगन में बरसों इंतजार के बाद किलकारियों की बहार आई है। इसलिए नाम रख दिया गया- महेंद्र और सभी लोग प्यार से ‘महेंदर’ पुकारने लगेे।
बालक महेंद्र की कद-काठी दिनों-दिन बढ़ी और वह गीत-गवनई में डूबते चले गए। बहुत गुणी थे। जिस कला में हाथ लगाते, पारंगत हो जाते थे। घोड़ा चढ़े, तो शानदार घुड़सवार हो गए, अखाड़े में उतरे, तो बड़े-बड़ों को धूल चटाने लगे। बस, एक समस्या थी, पढ़ने से भागते थे। पिता बड़े चिंतित हुए, घर का बड़ा बेटा पढ़ ले, तो जमींदारी संभाले। एक दिन पिता ने अपनी मां को समझाया कि मां, अपने दुलारे पोते को समझाओ। दादी ने एक सुबह पोते को फटकारा,‘बबुआ, गीत-गवनई ठीक नहीं है और अब पूरा ध्यान पढ़ने में लगाओ?’ इतना सुनना था कि तर्कशील महेंद्र ने दादी पर प्रश्नों की बौछार कर दी, ‘गीत-गवनई बुरी बात है, तो आप लोग बात-बात पर गाने क्यों बैठ जाती हो? महिलाएं झूमते हुए झूमर और सोहर क्यों गाती हैं? और मैंने सुना है कि मेरे जन्म के बाद महीनों घर-द्वार पर संगीत के कार्यक्रम हुए थे, ऐसा क्यों किया गया था? क्या राम, कृष्ण और अन्य देव-देवियों पर गीत गाना गलत है? गीत-गवनई गलत कैसे समझाओ?’
दादी निरुत्तर हो गईं, तो सुनकर पिता भी सहम गए, क्योंकि वह भी बेटे को टोकने-रोकने की तैयारी में थे। बड़ा बेटा कहीं नाराज होकर चला गया, तो क्या करेंगे? वाकई, महेंद्र के प्रश्न निर्णायक साबित हुए। नतीजा यह कि पुत्र महेंद्र गीत-गवनई में दिन-रात तरक्की करते गए। अपना लिखने-गाने लगे। शिवरात्रि पर लोगों की मांग हुई, तो गांव के मंदिर पर गवनई का कार्यक्रम रखा गया। युवा हो चुके बेटे ने अपना ही लिखा गीत गाया, सब झूम उठे- कहत महेंदर जप लऽ रोज त्रिपुरारी, / राख लीहन सरन कैलास के बिहारी,/ जेकरा बैला के असवारी।
गीत सुन पिता की आंखों में आंसू भर आए। पिता को यह जानकर ज्यादा खुशी हुई कि महेंद्रनाथ जी की कृपा से उत्पन्न पुत्र महेंद्र ज्यादातर भगवान के ही गीत गा रहे हैं। जल्दी ही महेंद्र की चर्चा छपरा के सबसे बड़े जमींदार हलिवंत सहाय तक पहुंची, जो पिता से परिचित थे। एक दिन बड़े जमींदार साहब की मांग हुई, तो पिता के साथ महेंद्र पहुंच गए हलिवंत के दरबार में। वहां महफिल सजी, तो गीत पेश किया- मोरा अंखिया के निनिया बैरनिया भइली ना। / पिया कलकतिया से घरे भेजे नाहीं पतिया।
सुनकर हलिवंत मंत्रमुग्ध हो गए। गीत के बाद गीत सुनते गए -पटना से बैदा बोलाई दऽ, नजरा गइली गुईयां। यह गीत जैसे ही पूरा हुआ, हलिवंत ने महेंद्र को गले लगा लिया। तब पिता शिवशंकर मिसिर के आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। वह आश्वस्त हो गए कि अब उनका बड़ा बेटा वाकई बड़ा हो गया, गीत-गवनई में इतना आगे निकल गया है कि अब पीछे मुड़कर नहीं देखेगा।
अद्भुत कलाकार हुए महेंद्र। सुबह व दिन की सभा में भजन गाते- एतना बता के जइहऽ कइसे दिन बीती राम, तो शाम की महफिलों में प्रेम-शृंगार गीत- अमवा महुअवा के झूमे डरिया, तनी ताक न बलमुआ हमार ओरिया। और, देर रात की महफिलों में भी वही सबसे ज्यादा दिल लूटते- दिल ले के यार मेरा आखिर दगा न करना। / रखना दिल के अंदर हरगिज जुदा न करना।
वह केवल साहित्यकार नहीं थे, क्रांतिकारी भी थे। फर्जी नोट छापते, ताकि अंग्रेजों की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचे और ईमानदार इतने थे कि चोरी का एक पैसा उनके घर में नहीं लगता था। जब सोना 12 रुपये तोला था, तब वह नंबरी अर्थात सौ रुपये के नोट छापते थे। खैर, गोपीचंद नाम के जासूस ने उन्हें पकड़वा दिया, जो तीन वर्ष उनके घर नौकर बनकर रहा, इस पर भी निराश महेंद्र मिसिर ने गीत लिखा, पाकल-पाकल पनवा खियवले गोपीचनवा, पिरितिया लगा के ना। यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि इस तर्ज पर अनेक गीत लिखे गए। उन्हें दस वर्ष की सजा हुई। एक दिन वह जेल में बहुत दर्द लिए गा रहे थे- कवना बिरिछ तले भींजत होइहें से/ राम लखन दुनू भइया हो लाल।
यह मार्मिक गीत सुनकर जेलर से रहा न गया। उसने महेंद्र मिसिर (1865-1946) को लिखने-गाने की पूरी सुविधाएं दीं और महेंद्र अपने अनुपम रचना पुष्पों से भोजपुरी साहित्य की माला पिरोने लगे। तीन बरस पहले ही जेल से छूट गए। भिखारी ठाकुर और अनेक कलाकारों को उन्होंने आगे बढ़ाया। लगता था कि गीत-गवनई के लिए ही उनका जन्म हुआ है और यही करते हुए वह 26 अक्तूबर को इस दुनिया से विदा हो गए, पर उनके गीत अमर हैं। उनके गीतों की खुमारी आज भी चढ़ी हुई है– अंगुरी में डसले बिया नगिनिया रे, ए ननदी दीयरा जरा द।








