राम-भाव ने उन्हें भारत पहुंचा दिया

कामिल बुल्के
रामकथा के मर्मज्ञ
हमारे संसार की गाथा में रामकथा ऐसी घुली हुई है, मानो दूध में मिश्री। धरती के रोम-रोम पर रामकथा का रस ठीक वैसे ही झर रहा है, जैसे सुबह सूर्यदेव की किरणें। रामकथा बेल्जियम के उस युवा तक भी पहुंची है, जो सिविल इंजीनियरिंग का विद्यार्थी है। वह अपनी भाषा में ही रामायण का अनुवाद पढ़ रहा है और रोम-रोम से हर्षित हो रहा है। वह बालकांड से होते हुए अयोध्याकांड में पहुंच गया है कि अब राम राजा बनेंगे। पर यह क्या, अचानक प्रसंग ऐसा आ गया है कि राम को अयोध्या छोड़कर वनवास पर चले जाना है। पिता दशरथ का वचन निभाने के लिए राम सहर्ष तत्पर हैं, उनके मन में तनिक भी संशय नहीं है। माता कैकयी ने कह दिया और शोकाकुल पिता की भाव-भंगिमा से संकेत मिल गया है कि राम अब तुम्हें 14 वर्ष के लिए वनवास जाना है और तुम्हारे स्थान पर छोटे भाई भरत का राज्याभिषेक होगा।
राम अद्भुत हैं, राजसत्ता हाथ से जा रही है, किंतु प्रसन्न हैं कि उनके वन चले जाने से पिता का मान-सम्मान बढ़ेगा। पिता का अवसाद दूर होगा और छोटे भाई भरत को राज-पाट मिलेगा, इससे बड़ी खुशी और क्या होगी! राम अपने शोकग्रस्त पिता को समझा रहे हैं कि इस पृथ्वीतल पर उस पुत्र का जन्म धन्य है, जिसके चरित्र को सुनकर पिता को परम आनंद होता है। जिस पुत्र को माता-पिता प्राणों के समान प्रिय होते हैं, चारों पदार्थ- अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष- उसकी मुट्ठी में रहते हैं।
अपनी भाषा में यह पढ़ते हुए वह युवा भाव प्रबलता से बहने लगा। उसके मन-मस्तिष्क में रामायण का यह पद मधुर संगीत की भांति गूंजने लगा, हृदय के वे तार भी झंकृत होने लगे, जो तब तक अछूते थे। आंसुओं का एक सागर-सा आंखों में लहराया था कि संसार में कोई ऐसा पुत्र भी है, जो राज-पाट को क्षण भर में त्यागने को तैयार हो गया है। क्या यह वही संसार नहीं है, जहां पुत्र अपनी सुख-सुविधा से कोई समझौता नहीं करते हैं, जहां अनेक पुत्रों ने सत्ता के लिए अपने पिता को ठिकाने लगाया है? वहां, एक राम भी हैं, जो अपने पिता के लिए लुट जाने को विकल हैं।
वह युवा सोच में पड़ गया कि ऐसे राम का देश कैसा होगा? संयोग ही है कि उस युवा के गांव का नाम रामस्केपेल है। राम शब्द की ध्वनि बचपन से साथ जुड़ी है। अब हृदय में राम भाव का स्पर्श होते ही उन्होंने अपने संकल्प की घोषणा कर दी कि वह अर्थात कामिल बुल्के रामकथा का समग्र अध्ययन करेंगे और यदि संभव हो, तो राम की अयोध्या वाले देश जाएंगे। बुल्के का लक्ष्य था कि भारत की मूल भाषा हिंदी और संस्कृत में राम को समझना। वही राम, जो मर्यादापुरुषोत्तम हैं, जो सगुण हैं और निर्गुण भी। जो आदर्श पुत्र, भाई, सखा, प्रेमी, योद्धा और राजा हैं।
पर तब भारत पहुंचना कठिन था। भारत ब्रिटिश गुलामी में दिन बिता रहा था, वहां इंजीनियरों की जरूरत नहीं थी, तो वहां कैसे पहुंचा जाए? अंतत: एक राह दिखी कि ईसाई मिशनरी बना जाए, तो भारत पहुंचा जा सकता है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर दृढ़ संकल्पों वाले युवा कामिल बुल्के मिशन में शामिल हो गए और उस दिन उनके हर्ष का ठिकाना न था, जिस दिन 26 की आयु में उन्होंने राम की मूल भूमि पर पग धरे।
मिशन का अपना कार्य था, पर उनकी प्राथमिकता थी हिंदी और संस्कृत सीखना। तीन वर्ष बाद वह गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस की उस मूल चौपाई तक पहुंच गए, जहां राम अपने शोकाकुल पिता से कह रहे हैं –
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।
तुलसी के वह भक्त हो गए। विनय पत्रिका से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। हिंदी और संस्कृत में पारंगत हुए, तो उन्होंने रामकथा की उत्पत्ति और विकास विषय पर अत्यंत गंभीर शोध किया और तमाम रामकथाओं या रामायणों से गुजरते हुए विशेष रूप से हिंदी और भारतीयता के स्नेहिल पुजारी हो गए।
जब भारत आजाद हुआ, तब यह चर्चा चली कि विदेशी धर्म प्रचारकों को भारत से जाना होगा, तो यह सुनकर फादर कामिल बुल्के(1909-1982) रोने लगे कि इस पुण्यभूमि या भविष्य में कभी रामराज्य की संभावना वाली भूमि को छोड़कर कैसे जाऊंगा? यहीं मुझे एक दिन मिट्टी में मिलकर धन्य होना है।
तब देश के तमाम नेता और विद्वान फादर बुल्के के महान कार्य से परिचित थे, किसी ने उन्हें नहीं कहा कि आप भारत से जाइए। वह साल 1951 में भारत के नागरिक हो गए। निरंतर रामकथा पर काम करते रहे। एक वृहद हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश भी उन्होंने तैयार किया, जिसे मानक माना जाता है। वह रांची में रहते थे और जब उन्हें कोई बिहारी कहता था, तो आह्लादित हो जाते थे कि राम के देशवासियों ने मुझे अपना मान लिया।








