ख्वाजा अब्दुल हामीद और अखंड भारत

दिल-दिमाग में बसा रहा अखंड भारत

भारतीय राष्ट्रवादी उद्यमी

कुछ शख्स ऐसे होते हैं, जिनकी जिंदगी में कदम-कदम पर बड़े  मोड़ आते  हैं। अलीगढ़ के उस नौजवान के साथ भी ऐसा ही था। दस की उम्र तक मदरसे में दीनी तालीम हासिल हुई, हाफिज हुए और उसके बाद अचानक जिंदगी सामान्य शिक्षा की ओर मुड़ी। इंटरमीडिएट तक पढ़ने के बाद लेदर अध्ययन में अचानक से रुचि जागी, वह लेदर की शिक्षा के लिए मद्रास गए। वहां से छुट्टियों में घर लौटे, तो मन बदल गया, लेदर की पढ़ाई छूट गई और वज्ञिान की शुरू हुई। उन्हीं दिनों जज पिता रिटायर हुए, तो पिता ने अपनी पसंद से अंग्रेजी दवा की दुकान खोल ली, वह नौजवान भी दुकान पर पिता की मदद करने लगे। करामाती अंग्रेजी दवाएं थीं, पर सब विदेश से आती थीं। दिल में कसक उठती थी, काश! देश में ही दवाइयां बनतीं, तो सस्ती होतीं।

तभी गांधीजी ने असहयोग आंदोलन का बिगुल बजाया, तो वह पढ़ाई छोड़ देश की आजादी के लिए कूद पड़े। यह आंदोलन जब खत्म हुआ, तो रसायन शास्त्र की पढ़ाई विदेश में करने की तमन्ना हुई, पर पैसों का टोटा था। तब मां ने बड़ा फैसला लिया, अपने हिस्से के दो मकान बेचकर बेटे को विलायत भेजा, पर बेटे ने बीच रास्ते में जहाज बदल लिया और जर्मनी पहुंच गए। बर्लिन में रसायन शास्त्र का अध्ययन शुरू हुआ। देश की खूब याद आती थी। एक दिन अवकाश मिला, तो वह बर्लिन की झीलों के दर्शन के लिए निकले। बड़ी नौका पर उन्हें एक युवती दिखी, पहली नजर में ही लगा कि पुराना नाता है। परिचय हुआ, तो पता चला कि लड़की पोलैंड की है, उच्च शक्षिा हासिल कर रही है। युवती ने प्रेम से पूछा कि तुम अपने और भारत के बारे में कुछ बताओ।

युवा ने कहा, मेरा देश बहुत बड़ा है, इसके बारे में बैठकर ही कुछ समझाया जा सकता है। युवा ने बकायदे कागज पर कलम से अपनी जिंदगी और भारत का नक्शा खींचना शुरू किया। कराची से रंगून तक विशाल देश, जहां तमाम मजहब के लोग मिलकर रहते हैं। ऊंचे पहाड़ों से पवत्रि नदियां बहती हैं। यह देश अभी गुलाम है, आजादी के लिए जंग जारी है और उस जंग में वह भी शामिल है। गांधीजी के साथ दो बार रहने का मौका मिला है।

युवक नेे कागज पर नक्शा खींच दिया। नक्शा इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि दोनों के बीच चंद जर्मन शब्दों के सहारे ही संवाद हो रहा था। युवक ने जर्मन सीखना शुरू ही किया था और युवती की जुबान पर भी जर्मन शब्द कम ही आते थे। युवक ने कागज पर ज्यादातर अंग्रेजी शब्द ही लिखे थे, पर अपना नाम हामीद (ख्वाजा अब्दुल हामीद) हिंदी या देवनागिरी में लिखा था। उस दिन देर तक वह भारत के बारे में बताते रहे और युवती मुग्ध भाव से सुनती  गईं। पूरा समझाने के बाद 27 वर्षीय हामीद ने 22 वर्षीय युवती लुबा डेरजांस्का को वह खास कागज भेंट किया। उसी कागज पर लुबा ने तारीख दर्ज की 18 अप्रैल 1925 और रसियन में लिखा – मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत दिन।

हामीद मुस्लिम और लुबा यहूदी, दोनों जानते थे कि ये मजहब जब साथ आए थे, तब स्पेन में इस्लामी इतिहास का स्वर्णिम अध्याय लिखा गया था। बर्लिन की उस मुलाकात से हामीद ही नहीं, लुबा की भी जिंदगी बदल गई। दोनों ने जिंदगी साथ जीने और भारत की सेवा का फैसला। भारत लौटकर दवाओं की प्रयोगशाला या संस्थान खोलने का काम आसान नहीं था। अंग्रेजों से सहयोग की रत्ती भर गुंजाइश नहीं थी। बहुत जद्दोजहद के बाद साल 1937 में हामीद की कंपनी सिपला ने दवाओं का उत्पादन शुरू किया और देखने के लिए गांधीजी भी आए और सरदार पटेल भी। ख्वाजा अब्दुल हामीद (1898-1972) एक अद्भुत राष्ट्रवादी साबित हुए। जिस दौर में अनेक युवा बंटते भारत का नक्शा लिए घूमते थे, उस दौर मे हामीद के दिलो-दिमाग में वही अखंड भारत धड़कता था, जिसका नक्शा उन्होंने बर्लिन में खींचा था। वह बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। वह मुस्लिम लीग के खिलाफ लड़कर चुनाव भी जीते थे। वह कहते रह गए कि मुस्लिम लीग लोगों को बरगला रही है। देश बांटने से पहले जनमत संग्रह कराया जाए और मुसलमानों को साफ बताया जाए कि अगर पाकिस्तान को वोट दिया, तो वहीं जाना पड़ेगा। देश के कामयाब उद्यमियों में शुमार हामीद की सलाह को कांग्रेस ने अनसुना कर दिया। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम लीग को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, बंटवारे को रोकना चाहिए।

खैर, वह भारत के हस्सिे आए। वह भारत को दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में जुटे रहे। आज देश की एक सबसे पुरानी दवा कंपनी सिपला का मूल्य 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। उन्होंने हर पल साबित किया कि एक भारतीय हमेशा भारतीय है। भारत से बेहतर जगह नहीं, जहां सब मिलकर रहते हैं। और हां, अखंड भारत के नक्शे वाला उनका वह कागज आज भी है।

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