भारतीय लोक संस्कृति की एक मुखरतम कलाकार तीजन बाई की विदाई अपूरणीय क्षति है। लोक नाट्य की मनमोहक शैली पंडवानी ने अपना एक ऐसा रत्न खो दिया है, जिसकी ख्याति अपने देश में ही नहीं, पूरी कला दुनिया में थी। केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, भारत की भी अपनी एक पहचान खो गई है। एक कलाकार के रूप में जो सम्मान तीजन बाई को प्राप्त हुआ, वह अपने आप में एक इतिहास है। कला क्षेत्र के हर संभव पुरस्कार उन्हें मिले थे। पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण के बाद केवल भारत रत्न जैसा विरल सम्मान ही उनके लिए शेष रह गया था। वह सदा प्रेरणा रहेंगी। भारत में जब भी कोई लोक कलाकार निराश होगा, तो उसके लिए तीजन बाई को याद कर लेना पर्याप्त होगा। जो संघर्ष तीजन बाई ने किया था, उसे सदैव याद रखने की जरूरत है। अनुसूचित जनजाति समाज से आने वाली तीजन बाई को पीछे रखने के लिए न जाने कितने रोड़े बिछाए गए। जितने रोड़े दुनिया ने बिछाए, उतने ही रोड़े स्वयं उनके समाज ने बिछाए। मात्र 12 की उम्र में विवाह कर दिया गया। वह जनजाति से बेदखल हो गईं। घर-परिवार छूट गया, पर पंडवानी को छोड़ने के लिए तैयारी नहीं हुईं।
भारतीय लोक कला में पंडवानी का स्थान अनूठा है। यह संवाद, गीत, संगीत, नृत्य, अभिनय और हर्ष ध्वनियों से सजा लोक नाट्य है। पंडवानी में पांडवों की गाथा अर्थात महाभारत की रोचक-नाटकीय कथाओं का प्रदर्शन-गायन होता है। ध्यान रहे, तीजन बाई की लोकप्रियता से पहले झाड़ूराम देवांगन का नाम पंडवानी का पर्याय था। देवांगन मंच पर बैठकर या चौकड़ी मारकर या घुटने के बल होकर गाते थे। पंडवानी की इस वेदमती शैली से अलग तीजन बाई ने कापालिक शैली को अपनाया। तीजन बाई की आवाज में बहुत दम था, वह कथा सुनाते-सुनाते पूरे उत्साह में आ जाती थीं। वध दुशासन का हो या कीचक का, बैठकर सुनाना उन्हें मंजूर नहीं था। वह खड़े होकर और झूम-झूमकर सुनाती थीं और कथा के भाव के साथ पूरा न्याय करती थीं। हाथ में तंबूरा लिए तीजन बाई स्वयं भी किसी महाभारत के योद्धा से कम नहीं लगती थीं। खूब जतन से सजाया गया तंबूरा कभी गदा हो जाता, तो कभी धनुष, तो कभी द्रौपदी के लंबे केश, कभी आकाश, तो कभी जमीन, तो कभी भगवान कृष्ण का पालना या पालकी। कोई आश्चर्य नहीं, झाड़ूराम देवांगन ने पंडवानी को जहां तक पहुंचाया, वहां से पंडवानी को बहुत दूर और ऊंचाई तक ले गईं तीजन बाई।
आज पंडवानी के कलाकार तो बहुत हैं, पर तीजन बाई जैसा कोई नहीं है। मोबाइल और रील वाले कलाकार तो बहुत हो रहे हैं, पर सच्चे लोक कलाकारों का टोटा होने लगा है। तीजन बाई अपने पीछे शून्य छोड़ गई हैं। लोकभाषा छत्तीसगढ़ी का समाज उन्हें हर उत्सव-आयोजन में खोजेगा। अब दुनिया में छत्तीसगढ़ और महाभारत से निकली कला पंडवानी का प्रतिनिधित्व कौन करेगा? उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी, पर बीते दस वर्ष से उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था। ध्यान देने की बात है कि तीजन बाई ने अपनी शैली और ख्याति से छत्तीसगढ़ के पारंपरिक संगीत को भी नवजीवन दिया। याद कीजिए, भारत के सुविख्यात नाटककार-अभिनेता हबीब तनवीर के नाटकों पर तीजन बाई का असर साफ दिखता था। मंच पर तंबूरा लिए तीजन बाई की वह भीम गर्जना और उसके साथ तबला, ढोलक, झाल, मंजीरे की मनोरंजक संगत अविस्मरणीय है। समग्रता में उनकी विरासत एक प्रकाश स्तंभ है, जो इस देश के कलाकारों को राह दिखाती रहेगी।
-संपादकीय के रूप में लिखा गया-








