उदय शंकर, महान भारतीय नर्तक
कहा जाता है, बिना डूबे मोती हासिल नहीं होता। वह युवा भी अपने हिस्से के मोती की खोज में लगा था। कला दुनिया में ही रहता था, लंदन में रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट में शिक्षा ले रहा था। मन में भारत बसा था, वह कला समृद्ध भारत, जिसके एक हाथ में तुलिका, तो दूसरे में वीणा, एक पांव में मंदिर की सीढ़ियों पर होने का संकोच, तो दूसरे में कभी घुंघरू बज उठते थे। वह दौर ऐसा था, जब टैगोर को साहित्य का नोबेल मिल चुका था, स्पेनिश फ्लू और विश्व युद्ध के कहर से निकलकर दुनिया विभिन्न प्रकार की कलाओं में नवजीवन खोज रही थी। उस युवा को भी कलाओं का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा था, तभी तो वह दुनिया के एक बेहतरीन आर्ट कॉलेज में पढ़ने आया था।
कहा जाता है कि एक कला दूसरी को अनायास अपनी ओर खींचती है। यही हुआ, एक दिन एक विख्यात नर्तकी का बुलावा आया। उस दौर में सबसे बेहतरीन बैले नर्तकी थीं अन्ना पावलोवा, रूसी थीं, पर ब्रिटेन में बस गई थीं। अपनी नृत्य मंडली के साथ दुनिया घूमती रहती थीं। ताजा-ताजा भारत से लौटकर आई थीं और भारत की स्नेहिल माटी उनके मन, वसन से झड़ जाने को तैयार न थी। उन्हें लगने लगा था कि उनके कला कोश में कुछ भारतीय भी जरूर होना चाहिए। ऐसी महान बैलेरीना अन्ना पावलोवा ने उस कला छात्र को बुलाया था कि भारत का कुछ सुंदर कैसे हासिल हो पाए। खैर, क्या खूब सत्संग हुआ!
तुम्हें पता है, तुम्हारे भारत में कितना नृत्य है? पोर-पोर में गीत है। दे गए हैं ऋषि, तपस्वी बहुत आदि विद्या, पर विद्या का होना ही महत्वपूर्ण नहीं, उस विद्या से आपने अपने लिए क्या गढ़ा, यह ज्यादा मायने रखता है। मतलब, अपने देश से प्यार कौन-सी बड़ी बात है, सबको होता है, पर सार्थकता तब है, जब प्यार ठीक से निभा दिया जाए। खजाना मिल जाना बड़ी बात नहीं, खजाने को बचाना-बढ़ाना ही सब कुछ होता है।
फूल से भी सुंदर वह महान नृत्यांगना जब समझा रही थीं, तब शायद भारत में कहीं पहुंच गई थीं और उस युवा को बनारस, उदयपुर याद आ रहा था। कैसे सारंगी बजाने वाले गाते-गाते नाचने लगते हैं। बजाना गाने में गुलजार होता है और गाना नाचने में साकार। हमारे यहां लोग यूं ही नहीं नाचते हैं, यहां देवता भी खूब बजाते, गाते, नाचते हुए हैं। तांडव से लीला तक हमने उन्हीं से सब सीखा है। शिव-पार्वती से राधा-कृष्ण तक। वह नृत्यांगना चकित हैं कि देवता भी नाचते हैं! नाचना भक्ति है और शक्ति भी। वह चहककर सवाल करती हैं कि क्या हम वैसा ही कुछ कर सकते हैं, जैसे मैं राधा बन जाऊं और तुम कृष्ण?
अब वह युवा अचंभित है, कभी छोटी-बड़ी खुशी में इधर-उधर कमर मटकाने और मंच पर नाचने में बड़ा अंतर है। महान नृत्यांगना मुझे कृष्ण बनाकर नचाना चाहती हैं। यह अवसर कैसे जाने दिया जाए? इस एक मुलाकात ने जीवनधारा को बदलकर रख दिया। कृष्ण बनकर नाचना है, तो सोचना पड़ेगा कि कृष्ण कैसी दैवीय भाव कुशलता से नाचते होंगे। युवा ने जब नाचने में डूबना शुरू किया, तब कला की पढ़ाई पीछे रह गई। वह याद करने लगा कि पिता के नियोक्ता, झालावाड़ के राजा के महल में नर्तकियां कैसी कोमलता के साथ सुरताल में नाचती थीं।
अन्ना पावलोवा तो स्वयं बैले नृत्य की विख्यात गुरु थीं। उनका पूरा शरीर किसी हंस की तरह मनोरम लय में लहराता था, जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा दबे पांव उतर रही हो, आहिस्ता। पैरों की उंगलियों के बल पर धरती का सहारा लिए और हाथों को फैलाए लंबी सुंदर उंगलियों से पूरा संसार टटोलते हुए।
देख-देखकर वह युवा भी नाचने लगा कि हे ईश्वर, यह नृत्य तुम्हारे प्रति आभार प्रदर्शन ही है कि तुमने हमें जन्म दिया। रूस की नृत्यांगना और भारत का युवा, दोनों राधा और कृष्ण बनकर क्या खूब नाचे! जल्दी ही लोगों ने पहचानना शुरू कर दिया कि जो युवा कृष्ण बनते हैं, उनका नाम उदय शंकर है। जोड़ी मशहूर हो चली। कहा जाता है, राधाजी कृष्ण से उम्र में बड़ी थीं, तो यहां पावलोवा भी उदय शंकर से उन्नीस साल आगे थीं।
दोनों साल भर दुनिया में जगह-जगह नृत्य प्रदर्शन करते रहे। उदय शंकर (1900-1977) ने सीख लिया कि कैसे नृत्य मंडली को संजोया जाता है। दुनिया भर में उनके खूब प्रशंसक और मित्र बने। 25 की उम्र में उन्होंने अपनी नृत्य मंडली की स्थापना की और दुनिया में जगह-जगह गए। ऐसा आकर्षक नृत्य, जिसमें शास्त्र भी था, लोक भी और थोड़ा-सा रूसी बैले भी। उनके नृत्य समूह में उनके छोटे भाई रवि शंकर भी शामिल थे, जो बाद में विख्यात सितार वादक हुए। आज भी जब आधुनिक भारतीय नृत्य की चर्चा होती है, तब उदय शंकर को पितामह के रूप में याद किया जाता है।








