हरि ओम शरण
भजन गायक
समय बदलावों की बारिश करते हुए भागता रहता है। बताते हैं, महाराजा रणजीत सिंह के समय लाहौर में बनारस से भी ज्यादा मंदिर, गुरुद्वारे थे। आज से सौ साल पहले हर दस लाहौरी में पांच टोपी वाले, तीन टीके वाले और दो पगड़ी वाले थे। अमृतसरी गेट और लाहौरी गेट के पास बड़ी संख्या में टीके वाले बसते थे। होली, दिवाली और त्योहारों पर आलम गजब हुआ करता था।
टीके वालों के मुहल्ले दूर से ही बता देते थे कि कार्तिक चल रहा है या सावन। दूर से ही सुनाई पड़ने लगता था, जब कोई साधु भिक्षाटन के लिए भजन गाते मुहल्ले में आता था। सुर में गाने वाले साधुओं का इंतजार रहता था। सुबह-शाम गीत सुनने की और कोई सुविधा नहीं थी। तब न साउंड बॉक्स थे, न चोंगे। कुछ सुनने का सबसे आसान जरिया यही था कि कोई साधु इधर से गुजरे, तो कुछ सुनाता जाए। अक्सर यही होता था, साधु उधर से गुजरते थे और उन्हें सुनने के लिए उस बालक के कान खड़े हो जाते थे। समस्या यह भी थी कि साधु भजन के बोल बार-बार दोहराते थे, बमुश्किल एक मुखड़ा या एक अंतरे में एक गली बीत जाती थी।
किसी दिन एक साधु आता, गाते हुए- जय भोला भंडारी शिवहर जय भोला भंडारी। उसके बाद दूसरे या तीसरे दिन जब कोई साधु आता, तब भजन आगे बढ़ता- तेरी याद भुला के जग में दुख पावें संसारी, जय भोला भंडारी।
तब उस बालक के पिता मुन्नीलाल शरण काम के सिलसिले में घर से बाहर रहते थे, माता संपत देवी घर के अंदर काम में जुटी रहती थीं और बेटा घर के दरवाजे पर खड़ा पूरे ध्यान से साधुओं को गाते देखता-सुनता था। गली में साधु के प्रवेश से प्रस्थान तक बालक की तमाम इंद्रियां भजन को ही समर्पित हो जाती थीं। तब के साधु भी बहुत भाव से गाते थे, उन्हें पता था कि वे जितने भाव से गाएंगे, उतनी ही ज्यादा भिक्षा-दक्षिणा मिलेगी। साधुओं को सुनते एक दिन वह बालक स्वयं गुनगुनाने लगा- जय कैलासपति शिव शंकर, सब जग के हितकारी, जय भोला भंडारी।
उसने तय किया कि मैं भी साधुओं की तरह गाऊंगा, क्योंकि गाते हुए मन प्रसन्न हो जा रहा है। फिर क्या था, सुनाते-सुनाते साधुओं ने ही गाना सिखा दिया। आसपास के लोगों ने जब बालक के मुंह से भजन सुने, तो बहुत खुश हुए। बालक के प्रति सम्मान बढ़ा। लोग जानने लगे कि मुन्नीलाल शरण जी के बेटे हरि ओम शरण अच्छा गाते हैं और धीरे-धीरे ख्याति बढ़ने लगी। हरि ओम की आवाज हृदय से निकलती है। धीर-गंभीर और सुरीली। स्वर में कहीं शोर नहीं, केवल शालीनता है। गले में मिठास का कोई दिव्य रसायन बहता है, जिसका स्पर्श कर जब ध्वनि-धारा फूटती है, तब श्रोता मन-मस्तिष्क से पवित्र स्नान करने लगते हैं। विशेष यह भी कि गाते हुए उनकी मुख मुद्रा कभी नहीं बदलती।
बहरहाल, बीच में बुरा दौर आया। देश बंट गया। लाहौर छूट गया। जिंदगी कई साल पीछे चली गई। तब हरि ओम मात्र 15 वर्ष के थे और उन्होंने खुद को पढ़ाई में लगा दिया। विज्ञान उन्हें प्रिय था और वाणिज्य की भी अच्छी समझ थी। परिवार के लिए कई काम उन्होंने किए, पर जब भी अवसर मिला, भजन गाते रहे। उनकी कभी इच्छा नहीं हुई कि सिनेमा की दुनिया में चले जाएं, फिल्मी गीत गाने लगें। उन्हें अनजान साधुओं ने केवल संत की तरह भजन गाना सिखाया था और वह संत की तरह ही गाते रहे। वक्त आया, देश की नामी कंपनी एचएमवी ने पुष्पांजलि नाम से एक रिकॉर्ड जारी किया। हरि ओम शरण तब 40 वर्ष के हो चुके थे और स्वर में साधना साफ खिलने लगी थी। उनके भजन गली-गली में गूंजने लगे- मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं। लोग उन्हें बार-बार सुनने लगे, मन ही नहीं भरता था- ऐसा प्यार बहा दे मैया, चरणों से लग जाऊं मैं ।
वाकई, उनके जीवन में ऐसा प्यार उमड़ा कि अंधकार हमेशा के लिए दूर हो गया। वह पूरी तरह से भजन में ढल गए। उन्हें उनके भजनों ने ही इतना कुछ दिया कि उन्हें कहीं भटकने की जरूरत नहीं पड़ी। देश से भी ज्यादा उन्हें दूसरे देशों में सुना जाने लगा। वह संत रूपी भजन गायक के रूप में पहचाने गए। कभी कोई हल्का या बनावटी भजन उनके कंठ से नहीं निकला और न वह कभी किसी पुरस्कार-सम्मान के पीछे भागे।
अफसोस! उनके समय देश में सिनेमाई गायकों का ज्यादा वर्चस्व था, पर उनके मोल को अमेरिका व वेस्टइंडीज के देशों में खूब समझा गया। वह न्यूयॉर्क, अमेरिका से ही स्वर्ग सिधारे। उन्होंने एक गायक के रूप में हॉलीवुड की ख्यात फिल्म होली स्मोक में भी काम किया। हरिओम शरण (1932-2007) प्रचार-प्रसार और महत्वाकांक्षाओं से परे थे, इसका प्रमाण उनकी भक्ति-भरी बेमिसाल आवाज है, जो दुखियों को सदा सहारा देती रहेगी- भव पार करो भगवान, तुम्हरी शरण पड़े ।









