पंद्रह साल बाद लौंडा नाच का नचनिया मनोज फिर गांव में दिखा। उसे देखते ही पुरानी यादें ताजा हो गईं। साल 2010 में उससे मुलाकात हुई थी, तब वह पैदल ही घर के सामने से जा रहा था और उसे रोककर मैंने कुछ बातें की थीं, जिसे मैंने तब लिखा भी था।
इस बार साल 2025 में छठ के दो दिन पहले गांव के प्रसिद्ध हलवाई बच्चा मास्टर की दूकान पर अचानक ही मनोज भी नजर आया। अब उसका शरीर भर गया है, लेकिन शरीर में हलकी लचक शेष है। मैंने उसे टोका, तो उसने बताया कि अब वह गांव में नहीं रहता, धनबाद रहता है। आगे बातचीत के लिए मैं उसे रोकना चाहता था, लेकिन वह नहीं रुका। शायद मुझसे बात करना नहीं चाहता था। खैर, बच्चा मास्टर से मैंने पूछा कि मनोज धनबाद में क्या करता है?
जवाब मिला, यही नाच-गाना करता है, और क्या करेगा?
मैंने पूछा, अब तो नाच वगैरह खत्म हो गया है। शादी बैंड पार्टी में भी लौंडा नाच की परंपरा लगभग खत्म है, तो यह कहां नाचता है?
जवाब मिला, अब यह किन्नरों के साथ रहता है। इसकी स्थिति बहुत सुधर गई है। गांव और धनबाद में भी इसने घर बना लिया है। परिवार को अच्छे से रख रहा है। किन्नरों के साथ रहकर ठीक कमाई होती है। लौंडा नाच करके यह इतना नहीं कमा पाता।
मैं सोचने लगा कि मनोज क्या करता होगा? अब कैसे नाचता होगा या किन्नरों के साथ कैसे तालमेल बिठाता होगा?
फिर अचानक दस दिन पहले की एक घटना मुझे याद आई। अचानक एक सामान लेने नोएडा के अट्टा मार्केट जाना हुआ। वहां कपड़े की दूकान पर अचानक किन्नरों की टोली आ खड़ी हुई थी। अधिकार के साथ उद्घोष करते हुए कि ला रे दे दे, दीपावली की बधाई। सब लोग अलग-अलग दो। जितना गल्ला, उतना उपहार।
तभी उस समूह के पुरुष सदस्य ढोलक वाले ने लचककर बजाना और गाना शुरू किया – गीत भोजपुरी ही था –
केहू लुटेरा केहू चोर हो जाला, आवेला जवानी बड़ा शोर हो जाला।
बच्चा मास्टर की दूकान पर ही अट्टा बाजार का यह दृश्य नजरों के सामने चलने लगा। युवा किन्नर आगे बढ़कर लचककर नाचने लगे, तो बुजुर्ग किन्नर मांगने के काम में लग गए, लेकिन बीच-बीच में वो भी लचककर सुर में सुर मिला देते थे –
अरे सबके नजरिया हमरी ओर हो जाला.. आवेला जवानी बड़ा शोर हो जाला।
पूरी उस किन्नर टोली के मधुर संगीतमय तालमेल में मैं मनोज को भी रखकर देखने लगा।








