(प्यारे साथी अमलेंदु के लिए)
हमने जीया है
गले तक बहता
बारिश भर प्यार।
हरियाये पहाड़ों के रोमछिद्रों
से उमड़ते, उतरते
बहते बादल
कभी गले से नथुने तक।
मां की तरह
रंगबिरंगी छोटी-छोटी
नावों के ख्वाब दिखाकर
धीरे से उस नदी ने हमें पिला दिया है
सच्चे प्यार का मटमैलापन।
और निगोड़ी जीभ
आज भी मानती है
उस स्वाद का लोहा।
और जाड़े के पहाड़ों
में खिलती है मस्ती
कमर भर गीली नदी पर
पसरी अपनी परछाई में
ललियाया सूरज
आहिस्ते डूबता है,
आहिस्ते लौटाती है नदी
उसे उसकी परछाई।
यह तमाशा नहीं,
रोजमर्रा का सच्चा सौदा,
प्यार है,
जिसे नींद से जागकर
देखते हैं हम
सुबह की नाभी भर नदी में
शर्म से लाल लोटपोट सूरज।
और गर्मियों में वस्त्र उतार
तप करते हैं पहाड़।
रूखे-सूखे-सूने
सुलग उठती है आग
जगह-जगह।
जिन्हें दूध के साथ
घुट-घुट पीते हैं
उस शहर के बच्चे।
और सबकी आग के नीचे
वह नदी सिमट आती है
घुटने भर प्यार में
जिसमें खड़ी एक सांवली
कुछ धोती है
पलटकर आंखों से कहती है
अभी क्या देखते हो,
आना जब नदी कमर भर आएगी।








