हिन्दुस्तान और हिंदी की मजबूत वकालत
श्रीधर वेम्बू
कंप्यूटर वैज्ञानिक व उद्यमी
वह फूलों का मौसम था। सारे फूल खिले हुए थे या खिलने को मचल रहे थे। अमेरिका में बसंत की बहार थी। देखकर मन खिल उठता था, खिले हुए मन में अच्छे-अच्छे विचार आते थे। उस 26 वर्षीय युवा के मन में भी यादें उमड़ आती थीं कि कैसे अपने तमिलनाडु के गांवों में भी फूल खिले होंगे। बसंत की बहार ने वहां भी अपनी हरियाली-खुशहाली से कोना-कोना सजा दिया होगा! और, यहां परदेश में मुझे कितने बरस बीत गए!
आईआईटी की पढ़ाई के बाद मद्रास क्या छूटा, अपना देश भारत ही छूट गया। यहां एमएस और पीएचडी की पढ़ाई भी पूरी हो गई है, तो अब तय करना है कि दुनिया में कहां बसना है। वैसे भी, भारत के प्रतिभावान युवाओं को दुनिया के तमाम देश अपने यहां रखना चाहते हैं। वह युवा इंजीनियर महोदय शिक्षा के क्षेत्र में जाना चाहते थे। ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की फैकल्टी में शामिल होने का प्रस्ताव सामने रखा था। एक तरह से हमेशा के लिए ऑस्ट्रेलिया में बस जाने का मौका था। शिक्षक की नौकरी मतलब पूरी सुरक्षा और कोई फेल हो या पास, कोई तनाव नहीं। ज्यादातर युवा ऐसे प्रस्ताव पर खुशी से झूमने लगते हैं, पर यहां युवा इंजीनियर महोदय उदास थे। लगने लगा था कि एक इंजीनियर के रूप में सेवा करना ज्यादा बेहतर होगा। मन में अचानक यह भाव भी आया कि क्या भारत ने जिस फूल को खिलने लायक बनाया, वह ऑस्ट्रेलिया में खिलेगा? इस फूल पर तो अमेरिका से भी ज्यादा हक भारत का है।
सौभाग्य से उनके एक भाई भी अमेरिका में साथ थे, उनको भी वतन की याद सताती थी। बसंत के समय ही दोनों भाइयों के बीच बातचीत हुई। सूचना प्रौद्योगिकी केवल अमेरिका में ही नहीं, भारत में भी करवट ले रही है। अपने देश में भी आईटी पर बहुत काम होगा। यहां का क्या है? यहां कितनी भी सेवा कर लो, हम तो रहेंगे भारतीय ही। यहां हमें मन से अपना कौन मानेगा? देश से पलायन की इस प्रथा को तोड़ने की जरूरत है। आज एक योग्य युवा गांव से शहर आता है, शहर में जब उसकी योग्यता बढ़ जाती है, तो वह विदेश चला जाता है। फिर तो अमेरिकी बसंत में ही रम जाता है, भूल जाता है कि अपने देश में भी फूल खिले होंगे, चांद निकला होगा। अपनी माटी भी इंतजार करती होगी कि इल्म हासिल करने गए हैं जो बच्चे बाहर, कभी तो घर लौटेंगे।
बसंत के प्रवाह में युवा ने दृढ़ता से तय किया कि हर हाल में भारत लौट जाना है और उसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया से आए ऑफर को उन्होंने ठुकरा दिया। तय किया कि असली दुनिया में जाना है और ऐसी कंपनी में असली इंजीनियरिंग करनी है, जो असली उत्पाद बनाकर असली दुनिया में बेचती हो।
तत्काल भारत लौटने के बजाय अनुभव लेना जरूरी था, तो उन्होंने एक नामी अमेरिकी आईटी कंपनी में काम शुरू किया। काम कुछ समझ में आया, तो अचानक नौकरी छोड़ अलग-अलग तरह के काम सीखने की शुरुआत की। कोडिंग से मार्केटिंग तक सीखने के बाद उन्होंने अपने भाइयों और एक पार्टनर के साथ मिलकर एक आईटी कंपनी की नींव रखी।
चार साल में ही उनकी कंपनी ने आईटी बाजार में पैर जमा लिए और लोग उन्हें युवा उद्यमी श्रीधर वेम्बू के नाम से जानने लगे। बाजार में हमेशा फायदे के फूल नहीं खिलते, पतझड़ भी आता है, पर श्रीधर में यह काबिलियत थी कि पतझड़ के दिनों में भी उनकी कंपनी फूल खिलाती थी। दूसरों से आगे बढ़कर सोचने, देश, देश के युवाओं और उनकी योग्यता के बारे में सोचने का सिलसिला चल पड़ा। श्रीधर वेम्बू की कंपनी जोहो आज एक अरब डॉलर से भी ज्यादा की कंपनी है। दुनिया के 140 से ज्यादा देशों में अपने सॉफ्टवेयर उत्पाद बेचती है। चालीस से ज्यादा कारगर व्यावसायिक एप चलाती है। पिछले साल इस कंपनी को 2,800 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का शुद्ध मुनाफा हुआ था। पारंपरिक वस्त्र लुंगी पहनने वाले खांटी तमिल श्रीधर वेम्बू भारत के चालीस सबसे अमीर लोगों में शुमार हैं।
उनकी कहानी यहीं नहीं रुकती। वह स्थायी रूप से अमेरिका से भारत आ चुके हैं। इतना ही नहीं, तमिलनाडु में अपने गांव से ही अपनी विशाल कंपनी का संचालन करते हैं। वह हिन्दुस्तान ही नहीं, हिंदी के भी बड़े पैरोकार हैं। जिस तमिलनाडु में हिंदी विरोध की राजनीति जहर उगलती रहती है, वहां श्रीधर वेम्बू तमिल युवाओं को बार-बार सलाह देते हैं कि राजनीति में मत पड़ो, हिंदी सीखो। नहीं सीखोगे, तो नुकसान होगा। हिंदी बोलने-समझने में ही तमिलनाडु और देश की तरक्की है। आज वेम्बू की कामयाबी तमाम भारतीय युवाओं के लिए एक संदेश है कि अपने फूलों के सौंदर्य, अपने फलों की मिठास और अपने फलदार पेड़ों की छांव पर सबसे ज्यादा हक अपने देश का है।








