शायद जाग रहे बिहारी

बिहार तो बहुत रुलाता ही है, पर उत्तर प्रदेश को भी अक्सर अपशब्द सुनने पड़ते हैं। जिसे देखिए, वही उत्तर प्रदेश और बिहार को निशाने पर लेकर आलोचना करता है। लोग यह भूल गए हैं कि देश जब आजाद हुआ था, तब 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश (तब अविभाजित) देश का सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र था। उत्तर प्रदेश का भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 14.4 प्रतिशत का योगदान हुआ करता था। महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 12.5 प्रतिशत थी। पश्चिम बंगाल 10.5 प्रतिशत के साथ तीसरे स्थान पर था और तमिलनाडु चौथे स्थान पर आता था।

सबसे ज्यादा आश्चर्य तो लोग आज इस बात पर करेंगे कि 1960 के दशक में बिहार राज्य देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने के मामले में पांचवें स्थान पर था। बिहार का योगदान 7.8 प्रतिशत था। बिहारी यह सोचकर खुशी से झूम उठेंगे कि तब गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्य बिहार से पीछे हुआ करते थे।

मोटे तौर पर तमिलनाडु तब देश के सौ रुपये में आठ रुपये और बिहार सात रुपये का योगदान दे रहा था। बिहार के मुख्यमंत्री की बात में वजन होता था, लेकिन शायद बिहार ने कभी अपने लिए खुलकर मांगा नहीं। तमिलनाडु ने खुलकर मांगा, अपना अधिकार समझकर मांगा, भयादोहन से मांगा और उसे मिलता गया। आज तमिलनाडु देश का दूसरे नंबर का सबसे अमीर राज्य है और देश की सकल घरेलू उत्पाद में उसका योगदान 9 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि बिहार का योगदान 3 प्रतिशत से भी नीचे चला गया है।

बिहार रुलाता है, क्योंकि पिछले पचास वर्ष में उसके सात रुपये घटकर ढाई रुपये हो गए हैं। हां, इधर के कुछ वर्षों से नीतीश बाबू 14 प्रतिशत से भी ज्यादा गति से विकसित हो रहे हैं, पर तमिलनाडु की विकास दर भी 13 प्रतिशत से ज्यादा बनी हुई है।

एक तमिल एक साल में अगर तीन लाख रुपये से ज्यादा कमाता है, तो एक बिहारी की आय सत्तर हजार रुपये भी नहीं है। यह बात देश के प्रधानमंत्री के ध्यान में भी जरूर होगी कि 1960 के दशक में देश में पांचवें स्थान पर बिहार था, लेकिन अब गुजरात पांचवें स्थान पर है और बिहार सबसे नीचे पहुंच गया है। यहां प्रधानमंत्री के पूर्व करीबी बिहारी विद्वान प्रशांत किशोर सही कहते हैं कि गुजरात में बुलेट ट्रेन का मुद्दा चलता है, जबकि बिहार में मुफ्त अनाज का। वाकई, बिहार आज भी ऐसे गरीब और सस्ते श्रमिकों को बाड़ा है, जिन्हें देश में कहीं भी प्रताड़ित किया जा सकता है। बिहारी जब प्रताड़ित होते हैं, तो उनके नेताओं का यह गर्व महा-फर्जी साबित होता है कि बिहारी मजदूरों के बिना महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों का काम नहीं चल सकता।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन की पार्टी गर्व करती है कि उनका राज्य तरक्की कर रहा है, क्योंकि वहां काऊ बेल्ट पार्टी भाजपा का खाता भी नहीं खुलता है। उत्तर भारत से लगभग नफरत करने वाले स्टालिन बिहार चुनाव प्रचार के लिए आए हैं, वह उत्तर भारत के विकास के लिए नहीं आए हैं। बिहारियों को यह बताने आए हैं कि उनका वोट चोरी हो रहा है। एक और मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी भी बिहारियों को यही बताने आए थे। शुक्र है, उन्होंने बिहारियों को यह नहीं कहा कि उनका डीएनए कमतर है। यह विचित्र तरह का प्रयोग है कि दक्षिण भारत से उन दलों और नेताओं को बिहार लाया जा रहा है, जो खुलेआम बिहारियों के प्रति हिकारत का इजहार कर चुके हैं।

वाकई बिहारी भोले हैं, तभी तो दूसरे राज्यों के नेताओं को भी अपने यहां राजनीति का मौका देते हैं।

आर्थिक उदारीकरण के दौर में अगर हम देखें, तो यह दुर्भाग्य की ही बात है कि बिहार आमतौर पर केंद्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के खिलाफ ही गया है। यहां विधानसभा चुनाव अनेक बार लोकसभा चुनाव के साल भर बाद ही हुए हैं। जो दल लोकसभा में जीतता है, वह विधानसभा में हार जाता है। मिसाल के लिए, लालू के हाथों में जब बिहारी जनता सत्ता सौंप रही थी, तब केंद्र में कांग्रेस या भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारें थीं। केंद्र सरकार ने एक तरह से लालू को खुला ही छोड़ दिया, नतीजा पूरे बिहार ने भुगता। जब बिहार लालू की लालटेन की रोशनी में था, तब बिहारियों की प्रति व्यक्ति आय में 0.12 प्रतिशत की गति से बढ़ रही थी। सोचकर रोना आता है कि आर्थिक उदारीकरण के शुरुआती दशक में एक आम भारतीय की सालाना आय में चार प्रतिशत से ज्यादा का बढ़ोतरी होने लगी थी, तब बिहारियों की आय में एक प्रतिशत का भी इंक्रीमेंट नहीं हो रहा था।

दुर्भाग्य देखिए, नीतीश कुमार जब बदलाव की बयार का वादा करके सत्ता में आए, तब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बन गई और केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन में लालटेन को भी मौका मिल गया। नीतीश कुमार 2005 में जब सत्ता में आए, तब पहले वर्ष तो बिहार की अर्थव्यवस्था में गिरावट दर्ज हुई, लेकिन अगले ही वर्ष बिहारियों को एक ही बार में 15 प्रतिशत से ज्यादा का इंक्रीमेंट मिला। उसके बाद से बिहारियों का सालाना इंक्रीमेंट औसतन दस प्रतिशत के आसपास बना हुआ है। बिहारियों की विकास दर बीच-बीच में देश को चौंका देती है।

ध्यान रहे, बिहारियों को अपशब्द बोले जाते हैं, बिहारियों में तमाम कमियां हैं, पर बिहार पर्याप्त सहयोग के बिना ही लगभग 14 प्रतिशत की विकास दर से प्रगति कर रहा है। अगर सहयोग मिले और बिहार सरकार अपनी आर्थिक-बौद्धिक पूंजी का आह्वान करे, तो यह विकास दर सालाना 28 प्रतिशत की भी हो सकती है।

अब सवाल यह है कि बिहार के विकास का रोडमैप किसके पास है? क्या कथित वोट चोरी रोक देने से विकास गति पकड़ लेगा? वोट चोरी एक मुद्दा जरूर है, पर देश के सबसे पिछड़े राज्य के लिए यह बहुत उपयोगी नहीं है। चिंता होती है कि स्टालिन दूर दक्षिण से बिहार विकास को बल देने के लिए नहीं आए हैं, वोट चोरी रोकने के लिए आए हैं। काश! बिहारियों को विकास का उपदेश देने आते। काश, वह भारतीयों को अपने राज्य के प्रति स्वार्थी होने के लिए प्रेरित करने आते? स्टालिन से बिहारियों को कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। वह संविधान के अनुरूप बिहारियों को राजनीतिक अधिकार देने के खिलाफ हैं? वह चाहते हैं कि बिहार या उत्तर प्रदेश की राजनीतिक ताकत समय के साथ कम हो। उन्हें भी अपने उद्योगों के लिए बिहार से सस्ते मजदूर चाहिए, उन्हें अवश्य चिंता होगी कि बिहारी अगर विकास की बात करने लगेंगे, तो अन्य राज्यों में मजदूरी करने के लिए कम निकलेंगे? हम यह आसानी से महसूस कर सकते हैं कि बिहार के गरीब रहने में अमीर राज्यों का फायदा है। क्या बिहारियों की समझ बढ़ेगी? क्या सुधार होगा?

नीतीश कुमार की सरकार की भी यह नीति रही है कि जो बिहारी बाहर चले गए हैं, वो लौटकर न आएं। यह नीति भी बाहर गए बिहारियों को रुलाती है। बहुत हर्षित मन से बिहारी मजदूर-अफसर बिहार जाते हैं और बहुत भारी मन से हर बार नौकरी पर लौट आते हैं। अंदर कहीं न कहीं यह इच्छा हिलोरे लेती है कि एक दिन घर जरूर लौटेंगे।

यही वह इच्छा है, जिसकी उम्मीदें प्रशांत किशोर पर जा टिकती हैं, वह आकर्षित करते हैं, क्योंकि उनके पास बिहार के विकास का एक ऐसा रोडमैप है, जिसमें बाहर गए बिहारियों के लौट आने की गुंजाइश है।

वैसे, प्रशांत किशोर पर भी बहुत लोगों को शक होता है, क्योंकि वह पैसे लेकर काम करने वाले हार्डकोर पेशेवर रहे हैं। देश में लगभग हर कामयाब पार्टी के भुगतानशुदा सलाहकार रह चुके हैं।

क्या यह मान लिया जाए कि अब प्रशांत किशोर की पूर्ण निष्ठा हमेशा के लिए बिहार और बिहारियों के प्रति हो गई है? अगर उनमें वाकई निष्ठा है, तो वह बिहार के विकास को वहां से बहुत आगे ले जा सकते हैं, जहां तक उसे नीतीश कुमार ने पहुंचा दिया है।

बहरहाल, इसमें कोई दोराय नहीं कि बिहारी भारतीय जनता पार्टी को पसंद करते आए हैं, पर यह खुद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को सोचना चाहिए कि वह बिहारियों की उम्मीदों पर कहां तक खरा उतरा है? बिहार में नेतृत्व के मामले में बार-बार पीछे बैठने या पीछे खड़े हो जाने की भाजपा की राजनीति को प्रशांत किशोर अगर निशाना बना रहे हैं, तो भाजपा को अवश्य जागना चाहिए।

बिहार जाग रहा है या जागने के संकेत दे रहा है। संविधान बदलने का मुद्दा तो लोकसभा चुनाव में चल गया था, लेकिन उससे ही मिलता-जुलता वोट चोरी का मुद्दा विधानसभा चुनाव में कितना चलेगा, कहना मुश्किल है।

इतना समझ लेना चाहिए कि बिहारी अब लालटेन जलाकर या कमल खिलाकर ज्यादा समय तक खामोश नहीं रहेंगे। बिहारियों से बात करके देखिए, अब कोई बिहारी भटकना नहीं चाहता, सब बिहारी लौट जाना चाहते हैं, बिहारी अब अपने बिहार को संपन्न देखना चाहते हैं, जो पार्टी इस उम्मीद को पूरा करने की ओर बढ़ेगी, वह ज्यादा समय तक सत्ता से दूर नहीं रहेगी।

फिलहाल सवाल यही है कि बिहार को लेकर किस पार्टी का क्या सपना है? अगर विकास का कोई मुकम्मल सपना नहीं है, तो फिर वह पार्टी बिहार के लिए बेकार है। वह युग आ रहा है, जब विकास से मुंह मोड़कर फिजूल की सियासत करने वाली पार्टियों से लोग बहुत घृणा करने लगेंगे। घृणा तो अभी भी है, जिसका एहसास बाहर रहने वाले बिहारियों को भली-भांति है, जिस दिन इस घृणा का एहसास बिहार में राजनीतिक पार्टियों को होने लगेगा, उसी दिन से बिहार के विकास की रफ्तार दोगुनी हो जाएगी।

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