लौह पुरुष तो एक ही थे सरदार वल्लभभाई पटेल

(सरदार वल्लभभाई पटेल, महान राजनेता की कहानी)

छायादार पेड़ हो या इंसान, किसी एक दिशा में नहीं, अनेक दिशाओं में बढ़ता है। जो बाहर से कड़क लगता है, वह अंदर नरम भी हो सकता है। ऐसे सज्जन भी होते हैं, जो समय की नजाकत या जरूरत देखते हुए खुद को अंदर या बाहर से कभी फौलादी तो कभी फूल बना लेते हैं और अक्सर वही लोग बड़े होते हैं, जो मन में फूल और फौलाद साथ लिए चलते हैं।

ठीक ऐसे ही थे 22 की उम्र में मैट्रिक पास करने के बाद एक वकील के सहायक के रूप में काम सीख रहे वह युवक। तब जेब में गिनती के पैसे होते थे। किसी तरह जिला वकील की परीक्षा पास करने के बाद वह गोधरा में वकालत करने लगे थे। दिली तमन्ना थी, विदेश जाकर पढ़ना है। युवा ने पता किया था, इंग्लैंड जाने के लिए 7 से 10 हजार रुपये की जरूरत थी। युवा ने तय किया कि पैसे की यथासंभव बचत की जाए और इंग्लैंड में हर हाल में जाना और पढ़ाई करना संभव हो। पत्नी को पता चला कि पति विलायती पढ़ाई करना चाहते हैं, तो उन्होंने भी खर्चों से यथासंभव हाथ खींच लिए। वकालत में खूब मेहनत और त्याग-संयम से जीवन बिताते हुए चार साल में जरूरी पैसे जुड़ गए। अब युवा वकील साहब इंग्लैंड की तैयारी में जुट गए। वह समय भी आया, जब पासपोर्ट और टिकट के लिए भी पैसे जमा हो गए, डाक से कागज मिलने भर का इंतजार था। लेकिन डाकिया एक जैसे नाम की गफलत में डाक बड़े भाई साहब को दे आया। बड़े भाई साहब चौंक पड़े कि छोटा भाई इंग्लैंड जा रहा है और मैं सोचता रह गया। इंग्लैंड तो मुझे भी जाना है, वहां वकालत की पढ़ाई के मायने ही अलग हैं। वहां से पढ़कर लौटने पर देश-समाज और वकालत में नाम चमक जाता है। उन्होंने छोटे भाई को बुलाया, तुम इंग्लैंड जा रहे हो, लोग क्या कहेंगे कि बड़ा भाई बाद में जाएगा और छोटा पहले हो आया। लोग क्या कहेंगे कि बड़े भाई ने छोटे भाई का अनुसरण किया, परिवार की क्या इज्जत रह जाएगी? इस बार मुझे जाने दो, तुम बाद में जाना।

बड़े भाई ने धर्मसंकट खड़ा कर दिया। उन्हें पता था कि छोटे भाई ने इंग्लैंड जाने के लिए मेहनत से पैसे जुटाए हैं, लेकिन उन्हें लग रहा था कि जब पासपोर्ट और टिकट उनके नाम का आया है, तो मौका हाथ से जाना नहीं चाहिए। यह मौका फिसला, तो न कभी नौ मन तेल होगा और न कभी राधा नाचेगी।

भलमनसाहत में छोटे भाई नरम पड़ गए, कोई और होता, तो त्याग न करता, मामला विदेश जाकर पढ़ने का था, पैसे बहुत तकलीफ झेलकर उठाए गए थे, लेकिन बड़े भाई को इनकार करना मुश्किल था। छोटे भाई ने इंग्लैंड में खर्चे के लिए जुटाए गए सात-आठ हजार रुपये भी बड़े भाई को दे दिए। बड़े भाई के परिवार की जिम्मेदारी भी छोटे पर छूट गई। सपना साकार करने की राह में ऐसी बाधा आई कि जीवन पूरी तरह बदल गया। संघर्ष की राह लंबी हो गई, लेकिन मन तनिक मैला न हुआ। भाई की इच्छा के आगे फौलादी इरादा समर्पित होकर त्याग के रूप में पुष्पित-पल्लवित होने लगा। यह कहना भी गलत नहीं है कि जो त्याग उन्होंने किया था, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। इंग्लैंड जाने का मौका हाथ से निकल गया था, लेकिन सपना टूटा नहीं था। छोटे भाई ने फिर पैसे जुटाने शुरू कर दिए थे। हां, मौका हाथ से निकलने के कुछ जख्म रह गए थे और युवा वकील साहब की पत्नी बीमार रहने लगी थीं।

एक दिन वह भी आया, जब वकील साहब अदालत में तीखी जिरह कर रहे थे, जज की इजाजत से एक अर्दली टेलीग्राम थमा गया। उस पर लिखा था, आपकी पत्नी नहीं रहीं। उस कागज को उन्होंने मोड़कर अपनी जेब में रख लिया और जिरह में जुटे रहे। मुकदमा जीत गए, तब जज ने पूछा, मिस्टर वल्लभभाई पटेल, ये तुमने क्या किया? पटेल ने जवाब दिया – ध्यान हटाता, तो एक निर्दोष आदमी को सजा हो जाती।

31 अक्तूबर को जन्म लेने वाले सरदार पटेल (1875-1950) की अनुपम दृढ़ता, त्याग और समर्पण इस देश की आजादी में शामिल है। बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल तीस महीने में डिग्री हासिल करके लौट आए थे, उसके लगभग दो साल बाद वल्लभभाई पटेल को 36 की उम्र में इंग्लैंड जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वह इतने तेज और मेहनती थे कि तीन साल का कोर्स उन्होंने दो साल में ही टॉप करते हुए पूरा कर लिया।

एक दौर आया, जब वह गांधीजी के समकक्ष गिने गए। बताया जाता है कि पंद्रह राज्यों में से 12 राज्यों की समिति ने उनके पक्ष में वोट किया, लेकिन गांधीजी ने सिर्फ इशारा भर कर दिया, तो सरदार ने सर्वोच्च पद से नाम वापस ले लिया था। उनका पूरा जीवन यह सिद्ध करता है कि त्याग भी वीर ही किया करते हैं और उनमें से कोई एक ही लौह पुरुष कहलाता है।

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