हम भी अपने दस साल का हिसाब करें

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दस वर्षों में क्या-क्या किया है? प्रमुख विपक्षी दल अखिल भारतीय कांग्रेस ने पिछले दस वर्षों में कहां-कहां झंडे गाड़े हैं? वामपंथियों ने पिछले दस वर्षों में लोगों के बीच कैसे अपनी पैठ बढ़ाई है? समाजवादी पार्टी ने समाज के सामने समाजवाद का कौन सा नया आदर्श खड़ा किया है? बहुजन समाज पार्टी ने बीते दस वर्षों में बहुजनों का विश्वास कितना जीता है?
ऐसे न जाने कितने सवाल हैं, जो चुनाव के समय कुछ ज्यादा तीखे हो जाते हैं और इस देश के लोगों को सवाल पूछने का पूरा हक है। सवालों के एक ही कठघरे में सबको खड़ा करना चाहिए। ऐसा नहीं कि भाजपा के लिए अलग कठघरा हो और कांग्रेस के लिए अलग। कोई केंद्र की सत्ता में है, तो कोई किसी राज्य की सत्ता में, लोगों ने लगभग हर पार्टी पर विश्वास किया है और आजमाया है। यह हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती है कि कोई किसी राज्य में भी एक दीया ठीक से जलाए, तो उसकी रोशनी की मांग दिल्ली में भी होने लगती है। तेल, बाती और दीया, हर राज्य के पास है, केवल केंद्र सरकार के पास नहीं। खैर, राजनीति की बुनियाद यही है कि दूसरे के दीये की समीक्षा की जाए और अपना दीया भले ही बुझ गया हो।
ठीक यही बात हम सभी पर लागू होती है। हमें भी तो सोचना चाहिए कि बीत दस वर्ष में हमने कितनों को छला? हमने कितनों को आगे बढ़ाया? हमने अपने आसपास गरीबों या अभावग्रस्त लोगों की कितनी सेवा की? हमें जब मौका मिला, तब हमने भी क्या भाई-भतीजावाद किया? क्या हमने भी किसी पर अपनी कुरसी का रौब गालिब किया? क्या हमने भी वैसा ही अहंकार किया, जैसा हमारे नेता चुनाव जीतने के बाद करते हैं? क्या जब मौका लगा, तब हमने भी रिश्वत लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी? क्या हमने देश के सभी कानूनों की पूरी पालना की? क्या हम अपने परिवार और कुटुंब के प्रति पूरी तरह ईमानदार रहे? क्या हमने अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभाया? क्या हमने अपनों के बीच भी ईष्र्या का संवद्र्धन किया? हमने अपने आसपास प्रेम का विस्तार किया या घृणा और स्वार्थ का? हमने परिवार समाज में अपने गठबंधन को कितने प्रेम से चलाया और उसके लिए कितना त्याग किया? हम हर नेता और पार्टी की समीक्षा कर रहे हैं, पर कहां है हमारी ईमानदारी?
गौर कीजिए, आज का हर दूसरा युवा यही सोचता है कि कोई मुझे एक मारेगा, तो मैं पांच मारूंगा। जब समाज में सोचने का ढंग स्वार्थी या मतलबी हो गया हो, तब हम अपने लिए कैसे नेताओं की उम्मीद करते हैं?
हम मनमाना आचरण करते हैं, जहां मौका मिलता है, धर्म और संविधान के विरुद्ध चलने लगते हैं और सोचते हैं कि हमें भला किससे वोट लेना है? हमें कौन जो अपने में सुधार करके लोगों का दिल जीतना है? दुर्भाग्य, ज्यादातर लोग ऐसे ही सवालों के साथ सोचने और जीने लगे हैं।
गौर कीजिए, दरअसल, हमारी इसी सोच के नेता और राजनेता भी होते हैं, क्योंकि वे हमारे बीच से ही आते हैं। उनमें से ज्यादातर में सुधार की तमन्ना जरा भी नहीं है, पर वोट के लिए सुधर जाने का दिखावा करते हैं। जैसे हम भी अपने अटके हुए किसे काम को कराने या अपने समाज-परिवार से मदद पाने के लिए सुधर जाने का दिखावा करते हैं। व्यक्तिगत रूप से सुधरना जरूरी नहीं है, बस सुधरने का दिखावा करके काम निकाल लेना है।
अगर हम खुद को सुधारने को तैयार नहीं हैं, तो हमें बहुत अच्छी सरकार, बहुत उत्तम नेता के अपने ख्वाब से भी समझौता कर लेना चाहिए। आप देखेंगे कि जिन नेताओं या जिन लोगों ने यह समझौता कर लिया है, उनके विकास की गति ज्यादा तेज है। सफलता के पैमाने बदल गए हैं और सच्चा सम्मान एक वीरान मंच है, जिस पर विराजमान होने की आकांक्षा विरल होती जा रही है।
इसलिए जरूरी है कि लगे हाथ अपने भी दस साल के सद्विचार, सत्संग, सद्व्यवहार की समीक्षा भी कर लीजिए, शायद इसी से शुरू हो जाए सुधार।

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