जब प्रभात झा 42 के थे और नरेंद्र मोदी 48

श्रद्धांजलि लेख
बीसवीं सदी के समापन वर्ष बीत रहे थे। एक दिन भोपाल में अरेरा कॉलोनी स्थित भाजपा कार्यालय पहुंचा। आलीशान पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिसर और उसमें दायीं ओर आवासीय परिसर था, जहां नंद कुमार साय जैसे नेता अक्सर रहते-मिलते थे, जो नमक नहीं खाते थे। भवन में घुसते ही बायीं ओर, प्रेस वार्ता के लिए हॉल था और वहीं प्रेस हॉल के पीछे के कमरे में पहली बार प्रभात झा के दर्शन हुए थे। यही उनका कमरा था, प्रदेश भाजपा के ऊर्जावान प्रवक्ता, उनकी उम्र बमुश्किल 42 रही होगी और मेरी 24, बहुत उत्साह के साथ इस नए रिपोर्टर के साथ उन्होंने नाम-परिचय किया और एक सवाल पूछा, ‘गांव कहां है?’
मैंने जवाब दिया, ‘गांव सारण, बिहार में है, पर मैं कभी वहां रहा नहीं, जन्म से पढ़ाई तक राउरकेला, ओडिशा में ही रहा।’
उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया था, ‘मेरा गांव भी बिहार ही है, पर मैं कभी वहां नहीं रहा। ग्वालियर, मध्य प्रदेश में पला-बढ़ा हूं।’
पहली मुलाकात में ही प्रभात जी से ऐसा संबंध बना कि कई तरह की औपचारिकताएं ओझल हो गईं। मैं तब भी छात्र था और आज भी छात्र हूं। खैर, तब मेरी दिनचर्या में शामिल था, एक बार न्यू मार्केट, भोपाल के चौराहे के पार स्थित कांग्रेस दफ्तर जाना, जहां पहले माले पर अक्सर प्रदेश प्रवक्ता माणक अग्रवाल बैठे मिलते थे और कम से कम एक चक्कर भाजपा कार्यालय का लगाना, जहां प्रभात जी प्रसन्न मुद्रा में मिलते थे। भाजपा तब सत्ता में नहीं थी, दिग्विजय सिंह सरकार चला रहे थे। तब रोज देखकर ही समझ में आ जाता था कि भाजपा सत्ता में आने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। दुर्लभ प्रजाति के प्रवक्ता प्रभात जी एक-एक पत्रकार के साथ मेहनत करते थे, मदद तो बहुत छोटी बात है। कभी कैलाश जोशी आते, कभी सुंदरलाल पटवा, उमा भारती, तो कभी कुशाभाऊ ठाकरे, तो कभी लालकृष्ण आडवाणी, हम पत्रकारों को प्रभात जी लगभग हर दिन खूब खुराक उपलब्ध कराते थे, पर कभी पलटकर पूछते नहीं थे कि खबर लिखी, कैसी लिखी, कितनी लिखी।
मैं तब भोपाल के वरिष्ठों – महेश पाण्डेय, एन के सिंह, लव कुमार शर्मा, कल्पेश याज्ञनिक, राजेश बादल इत्यादि के सवाल-जवाब घ्यान से सुनता था कि कहां से खबर उठेगी, तब प्रभात जी उत्साहित करते थे, ‘उपाध्याय जी, सवाल भी कीजिए।’
तब अनेक बार मैं भोलेपन में तीखे सवाल कर देता था, तो प्रभात जी चकित होते थे, पर टोकते नहीं थे। वह हमेशा कोशिश करते थे कि बाहर से आने वाले नेताओं से मुझे अलग से मिलवा दें। प्रभात जी बहुत मेहनती और निष्ठावान थे, जबकि उनके समकक्ष कांग्रेस के प्रवक्ता माणक अग्रवाल कुछ अव्यस्थित, आक्रामक और मुखर थे। माणक जी पार्टी में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए। प्रभात जी को भाजपा ने कुछ देर से ही सही, राज्यसभा में मौका दिया। वह दो बार राज्यसभा सांसद रहे, तीसरी बार भी वह राज्यसभा में जाना चाहते थे, पर विशेष रूप से 2019 की जीत के बाद अति आत्मविश्वास से लैस भाजपा में बुनियादी स्तर पर काम करने वाले प्रभात जी जैसे नेताओं की जगह शायद नहीं रह बची थी। वह भाजपा के ऐसे नेताओं में शुमार हो गए थे, जो पार्टी के लिए करना तो बहुत कुछ चाहते थे, पर पार्टी का कारवां अपने नए लोगों के साथ आगे बढ़ चुका था।
बाद के वर्षों में वह खूब लेख लिखते थे और ऐसा लगता था कि वह किसी की नजरों में आना चाहते हैं। उनके लेखन में एक पत्रकार नहीं, बल्कि एक नेता की बेचैनी झलकने लगी थी। वह अक्सर लेख भेजते थे, जिनमें से कुछ ही छप पाए, पर प्रभात जी ने कभी नाराजगी नहीं जताई।
फोन पर कभी बात होती थी, कभी बोलते भी थे कि मिलने आइए। मुझे मिलने की कभी इच्छा होती तो थी, पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बमुश्किल 25 किलोमीटर दूर रहने के बावजूद मिलने का कभी संयोग ही नहीं बना। एक श्रमजीवी पत्रकार के पास अपने अध्ययन, लेखन, काम और शोध से कहां फुरसत है? मेरा भी अपना स्वभाव है, कभी किसी नेता से बिना पत्रकारिता मिलना उचित नहीं लगता। कभी किसी मंत्री, नेता को मैंने न एक काम जोर देकर कहा और न किसी नेता ने मेरा कोई काम किया। प्रभात जी यह बात जानते थे कि किसी नेता या किसी पार्टी से मेरा कोई बही-खाता नहीं है। कई बार वह दूसरों से संदेश भी भिजवाते थे कि कभी मिलते हैं, पर शायद मेरी किस्मत में ही नहीं था। क्षमा कीजिएगा, प्रभात जी।
वह मुझे इसलिए भी जंचते थे, क्योंकि उनमें चुनाव लड़ने वालों का चवन्नीपना बिल्कुल नहीं था। कभी उन्होंने इसके लिए कोशिश भी नहीं की। दामन साफ था, कोई आपराधिक मामला उन पर दर्ज नहीं था। पैसे की भी कोई भूख नहीं थी। सत्ता का दिखावा नहीं था। दरअसल, प्रभात झा जैसे नेताओं ने ही एक दौर में यह एहसास कराया था कि भारतीय जनता पार्टी दूसरी पार्टियों से अलग है और बहुत अनुशासित है।
मुझे आज भी याद है, साल 1999 का चुनाव था, महासचिव नरेंद्र मोदी मध्य प्रदेश चुनाव प्रभारी बनकर आए थे और प्रभात जी ने ही भोपाल के पत्रकारों से उनका पुन: परिचय कराया था। तब नरेंद्र मोदी वहीं भाजपा के आवासीय परिसर में रहते थे, खूब मेहनत करते थे। हम पत्रकारों से टकराते ही अक्सर हालचाल पूछते थे, तब बहुत कम बोलते थे। अब लगता है कि उस दौर में सहज-सरल, महज 48 वर्षीय नरेंद्र मोदी अपने पांव को सियासी अखाड़े में मजबूती से जमाने में लगे थे और आज दुनिया उनकी छलांग देखकर दंग है। अनेक मौकों पर मैंने नरेंद्र मोदी और प्रभात झा को कार्यालय परिसर में कहीं कुछ पल खड़े होकर त्वरित चर्चा करते देखा है। वास्तव में, तब संयुक्त मध्य प्रदेश में कांग्रेस का जादू लंबे समय बाद-लंबे समय के लिए ढल रहा था और भाजपा की बुलंदी मुकम्मल हो रही थी, जिसमें एक बड़ा योगदान प्रभात जी का था। आज कोई आश्चर्य नहीं, मध्य प्रदेश में भाजपा को उखाड़ना आसान नहीं।
मुझे याद है, एक दिन सुबह-सुबह भाजपा कार्यालय पहुंचते ही प्रभात जी ने कहा था, ‘राजगढ़ चले जाइए, आडवाणी जी की सभा है। यहां से कार जाएगी, उसी से जाना है, उसी से लौटना।’ राजगढ़ सीट पर मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह के खिलाफ भाजपा ने टीवी के कृष्ण नीतीश भारद्वाज को मैदान में उतारा था। वहीं आडवाणी जी को करीब से देखने और सुनने का मौका मिला, वैचारिकी चाहे जो हो, आडवाणी जी की जीवनशैली और व्यवहार का तब भी कोई मुकाबला नहीं था।
प्रभात जी ने ही त्वरित सूचना देकर एक सुबह कद्दावर नेता प्रमोद महाजन से मिलवाया था। पता दिया था और कहा था, ‘नींद से समझौता कीजिए, सुबह-सुबह चले जाइए, कोई दूसरा बड़ा काम नहीं आया, तो प्रमोद महाजन जी से चर्चा हो जाएगी।’
यह एक अलग ही किस्सा है, हम तीन युवा पत्रकार मौके पर समय से पहुंच गए थे। संदेशा भिजवाया और अंदर से तत्काल बुलावा आ गया, प्रमोद महाजन सुबह के बालभोग की तैयारी में थे, देखते ही उन्होंने कहा, ‘अच्छा किया आप लोग आ गए, सोच ही रहा था कि क्या किया जाए? आप लोग भी नाश्ता लीजिए और फिर चर्चा करते हैं।’
प्रमोद महाजन जैसा अकल्पनीय कुशलता, तेजी, तैयारी, खुशमिजाजी और हाजिरजवाबी से लैस नेता भाजपा में शायद दूसरा कोई न हुआ।
प्रभात जी के नाम से मेरे खाते में इतना कुछ दर्ज है कि सबका बखान बहुत मुश्किल है।
खास बात यह भी थी कि प्रभात जी सभी पत्रकारों और अखबारों की रिपोर्ट ध्यान से पढ़ते थे। कभी-कभी कमियां-खूबियां उत्साह से बताते थे। पत्रकारिता की उनकी समझ अद्भुत थी, यह पत्रकारिता के लिए अफसोस की बात है कि एक योग्य पत्रकार अपनी उम्र के लगभग तीसरे दशक में ही राजनीति की ओर मुड़ गया। उन्हें देखकर और उनके बारे में सोचकर अनायास लगता था कि राजनीति ने हमेशा ही पत्रकारिता का नुकसान किया है। राजनीति अच्छे पत्रकारों को निगलना जानती है, उसने कभी एक मुकम्मल पत्रकार खुद पैदा नहीं किया।
कई खबरें भाजपा की आलोचना में भी मैं लिखता था, पर प्रभात जी ने कभी नहीं टोका। मैं सोचता था कि आज कुछ जरूर बोलेंगे, पर वह ऐसे रहते थे, मानो कुछ हुआ ही न हो। वैसे, अक्सर जब भाजपा ऐसी खबरों से घिरती थी, तब एक से तीन दिन के अंदर ही कोई नया नेता कार्यालय आता था और उसके साथ ही भाजपा का पुख्ता जवाब प्रकाशित होता था। न तब फेकन्यूज था और न सोशल मीडिया, वो शायद स्वर्णिम पत्रकारिता के समापन वर्ष थे।
अब जब प्रभात जी नहीं हैं, तब यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि शुरुआती दौर में मुख्यधारा की राजनीति और उसके गुनताड़ों को समझने में उन्होंने एक पार्टी प्रवक्ता की तरह नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष पत्रकार की तरह मदद की थी। पार्टी के नए-पुराने खूब किस्से सुनाए और खुद समझने के लिए प्रेरित किया। वह व्यक्तिगत वैचारिक स्वतंत्रता के हिमायती थे।
ऐसा लगता है कि बाद के दिनों में वह राम मंदिर देखने के बाद कुछ ज्यादा आध्यात्मिक हो गए थे। उन्होंने अपना एक पिछला लेख रामनवमी पर बहुत भाव से लिखा था। उसकी कुछ पंक्तियां देखिए, कालिदास ने वर्णन किया है- “कौलिनभीतेन गृहन्निरस्ता न तेन वैदेहसुता मनस्त:”। अर्थात लोकापवाद के भय से श्री राम ने सीता को घर से बाहर निकाला, मन से नहीं। आदर्श शत्रु के रूप में जब रावण के भाई विभीषण ने उसकी मृत्यु के बाद दाह संस्कार करने से इनकार कर दिया, तब राम ने उससे कहा, “मृत्यु के साथ शत्रुता समाप्त होती है। यदि आप रावण का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे, तो मैं करूंगा। वह मेरा भी भाई है”।
राम का ऐसा स्नेहिल रूप वही देख और लिख सकता है, जिसके हृदय रस को सियासत ने अपने स्वार्थ की आंच से सुखाया न हो। शांति: शांति: शांति:

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