फिर लौट जाएंगे उस देश कुरजां

जाड़ा शुरू होने से पहले ही वो भारत आ जाते हैं और जाड़ा खत्म होते ही वापस लौट जाते हैं। अब भारत में गर्मी शुरू हो रही है और कुरजां के लौट जाने का समय हो रहा है।
दूर देश से चले आते हैं पक्षी…दूर देश को चले जाते हैं…क्योंकि  इन्होंने दुनिया को नहीं बांटा…। साइबेरिया और अन्य उसके आसपास के इलाकों में जब बर्फ जमने लगती है, जब वहां कुरजां पक्षी दाने को मोहताज होने लगते हैं, तब उन्हें भारत की याद सताती है और सबसे ज्यादा याद आता है फलौदी का खींचन गांव। वे पांच हजार किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी से उड़े चले आते हैं। हवाओं को पहचानते और भारत की सुगंध को याद करते हजारों की संख्या में…आकार बनाकर, समूह बनाकर, अपना एक आदर्श नेता बनाकर पूरे अनुशासन में उड़ते…वाकई इन्हें देखकर मन कह उठता है…कोई सरहद ना इन्हें रोके..
खींचन गांव/फलोदी। लगता है, यह कुरजां का अपना गांव है। एक साथ दस-बारह हजार की संख्या में एक ही प्रजाति के पक्षी को देखना रोमांच पैदा कर देता है। अंग्रेजी के वी अक्षर के आकार में समूह के समूह दूर धोरों से उड़कर आते कुरजांओं के कलरव से इन दिनों खींचन गांव आबाद है। खेतों, तालाबों, धोरों, मैदानों से लेकर आकाश तक कुरजांओं का हुजूम दिखाई पड़ता है।

रंग और मफलर
सजग, तेज, लंबी टांग, सुगढ़ पंखों वाले कुरजां हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। उन्हें आकाश ने अपना रंग दिया है और प्रकृति ने उनके गले में हल्का काला मफलर-सा डाल रखा है। काफी ऊंचाई पर उड़ते हुए ठंड से ये मफलर ही उन्हें बचाते होंगे। मोर के आकार-आकृति का यह लाल आंखों वाला तीन से पांच किलोग्राम का पक्षी सदियों-पीढिय़ों से भारत और साइबेरिया के बीच की दूरियां नापता आया है। बताते हैं, इनकी उम्र २५ साल तक होती है, यानी वे २५ बार भारत आकर लौट जाते हैं।

छह महीने का डेरा
वे यहां छह महीने ही रहते हैं और फिर पांच हजार किलोमीटर दूर चले जाते हैं। लोगों को आश्चर्य होता है, दुनिया भर के पक्षी प्रेमी और विशेषज्ञ खींचन आते हैं। बताते हैं कि साइबेरिया में इन्हें देखना मुश्किल है, लेकिन भारत में ये सहज दिखते हैं। इनके जीवन, यात्रा और संघर्ष पर शोध जारी है।

जरा फासले से मिला करो
वे बहुत सतर्क रहते हैं। मोटरसाइकिल की आवाज सुनकर भी इनकी गर्दनें सीधी हो जाती हैं, इनकी आवाज में चेतावनी का तीखापन बढ़ जाता है। शुक्रवार ३० जनवरी की सुबह एक छोटा-सा पिल्ला कुरजांओं के मैदान में टहल रहा था, कुरजांओं ने उससे भी लगभग दस मीटर की दूरी बरकरार रखी। जब ये अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो जाते हैं, तब उनके कलरव में कमी आ जाती है और दाना चुगने या सुस्ताने लगते हैं। एक समूह दाना चुगकर उड़ता है, तो दूसरा समूह आ जाता है।

जो नहीं लौट पाते
कुरजांओं के समूह में कुछ कुरजां गाढ़े रंग के अलग नजर आते हैं। ये वे कुरजां हैं, जो किन्हीं कारणवश पिछले साल भारत में ही रह गए थे, उड़कर न जा पाए थे। भारत की आबोहवा ने उनका रंग बदल दिया। पक्षी जानकार बताते हैं, अब इस साल जब गर्मियों की आहट पर कुरजां यह देश छोडऩे लगेंगे, तब पिछले साल छूटे हुए कुरजां भी उनके साथ ही उड़ चलेंगे। वे मार्च तक चले जाएंगे, फिर सितंबर में लौट आने के लिए।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *