गंगा कभी-कभी उल्टी भी बहती है

भिखारी ठाकुर, प्रसिद्ध लोक कलाकार

सागर के स्वभाव में ही ऐसा उफान है, जो देखने वाले के तन-मन में ज्वार का रोग लगा देता है। उस दिन यही तो हुआ था। एक युवा हजाम सागर के पास अचंभित खड़ा था, ठीक वैसे ही जैसे कभी रामजी के साथ आए वानर खड़े होंगे। पहली बार सागर निहारते कि उस पार जाने कहां ले गया होगा सीता मैया को रावण और इस अथाह के पार हम कैसे लगेंगे, प्रभु? पूरी सेना में दो ही नर हैं, बाकी सब वानर, जानवर। हर कोई तो हनुमान महावीर नहीं होता। श्रीरामचरितमानस  में क्या खूब आया है सागर, जिससे पहले खूब याचना करते हैं रामजी। फिर क्रोध आ जाता है कि एक ही बाण से इसे सुखा देता हूं और क्षमा मांगता है सागर, जिसे पार कर जाती है रामजी की सेना सेतु बनाकर।
खड़गपुर में हजामत का काम करने वाले छपरा के उस युवा की आंखों के सामने भगवान की लीला चलने लगी है। कितना रस है और यहां इतना पानी, इसमें अपनी गंगा मैया का भी तो पानी होगा! अपने छपरा को छूती मैया आती है और यह सागर मानो पिता है। उमड़ रहा है, आती हैं लहरें ऊंची, तो साथी कहते हैं, लहर आए, तो झुक जाओ, बबुआ, पैर जमा लो, पर यह क्या, मन बहा जा रहा है। खड़गपुर में खूब देखी रामलीला, अकेला जीवन, पीछे गांव पूरा परिवार, माई, बाबूजी, पत्नी, बच्चे और यहां जगन्नाथजी अपनी बहन, भैया के साथ विराजमान। देह-मन की लीला में खिला-खुला बैठा कोणार्क, ओह, यह जीवन कितना विस्तृत है!

वह भाव-विभोर अंदर-बाहर से भीगकर सागर से निकलता है और चल पड़ता है वहां, जहां चार दिन का डेरा है। सारे मित्र पीछे नहा रहे हैं, मन ही नहीं भरता, पर वह चल पड़ता है अकेले… साथियों को छोड़कर। कुछ हो गया है। लौटते ही एक साथी की गठरी खोल निकालता है श्रीरामचरितमानस । अचानक खोलता है और उस फुलवारी में पहुंच जाता है, जहां राम-लखन हैं और सीता जी भी सखियों संग आई हैं। तुलसी बाबा लिखते हैं, चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत। माने, सीताजी के मन में पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई है, वह चकित सब ओर ऐसे देख रही हैं, मानो डरी हुई मृगछौनी इधर-उधर देख रही हो। इधर, जनकपुर के नर-नारियों को अपनी मोहिनी चलाकर वश में कर लेने वाले रामजी का जो हाल है, सिय मुख ससि भए नयन चकोरा । माने, सीताजी के मुखरूपी चंद्रमा के लिए उनके नयन चकोर बन गए हैं। देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदय सराहत बचनु न आवा ।

वाकई, सब लीला ही तो है। तुलसी बाबा मन और बाहर की लीलाओं का ही पवित्र बखान करते हैं, ऐसी ही कोशिश सबसे सार्थक है, मुझे भी करनी चाहिए। ऐसी लीला करनी चाहिए, जिसमें अपना और सबका मन लगे। अब उमर तीस होने को है, तो लौट जाना चाहिए, कब तक लोगों के बाल, नाखुन संवारते, मालिश करते जीएंगे? सब कर लेंगे, पर लीला जरूर करेंगे, शायद आगे जीवन में केवल लीला ही शेष रह जाए। इसी भाव के साथ इस देश की माटी के एक सिद्ध कलाकार भिखारी ठाकुर (1887-1971) की नींव पड़ी। वह स्कूल में पढ़ न सके थे, एक मित्र ने उन्हें कैथी में ककहरा सिखा रखा था, ताकि न्योता बांटने के लिए किसी का नाम-पता पढ़ने में सुविधा हो। गांव लौटकर भिखारी कुछ लिखने-गाने लगे। गंगा एक तरह से उल्टी बहकर सागर से गांव कुतुबपुर आ गई थी। भिखारी को दो पल भी चैन न था, रचनाओं की लड़ी लगी रहती थी। एक हजाम मित्र ने ही पहले गीत सुना, तो छंद और मात्रा गिनना सिखाकर उत्साह बढ़ाया। गांव में ही रामलीला खेलकर अच्छी शुरुआत हुई और उसके बाद नाच की ओर बढ़ चले भिखारी। तब लौंडा नाच में छिछोरापन बहुत बढ़ गया था, मानस के प्रेमी भिखारी का मन अश्लीलता देख  खट्टा हो जाता था। तब उन्होंने अपना नाच दल जुटाया और सच्चे-अच्छे गीत, संगीत, कीर्तन, संवाद, कथा की ओर बढ़ चले। उन्हें लगता था, किसी भी कवि कलाकार को समाज को कुछ अच्छा ही देना चाहिए, जैसे तुलसी बाबा दे गए थे। वह मनोरंजन ही नहीं करते थे, समाज की कुरीतियों पर जोखिम उठाते हुए प्रहार भी करते थे। लोग उनके नाटक देख हिल जाते थे। उनमें गजब मौलिकता थी। उनके बारह लोक-नाटक और बारह भजन-कीर्तन, कविता पुस्तकें उपलब्ध हैं।
जब भी 18 दिसंबर आता है, उन्हें बहुत याद किया जाता है। उनकी रचनाएं आज भी खूब रुलाती, हंसाती हैं। समाज की कुरुतियों पर आज भी उनके लोक-नाटक टूट पड़ते हैं। वह अपने जीवन के अंतिम छोर तक बार-बार यह गाते गए – केवल राम नाम कहि शानी। दुसर इष्ट मोर आदि भवानी।  राम प्रताप भइल यश नामा। कहत ‘भिखारीदास’ हजामा।

(हिन्दुस्तान में प्रकाशित अपने कॉलम से साभार)

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