संपादन की समस्या और समाधान-4

खबर काटने में असावधानी

जल्दीबादी में कई खबरें स्थानाभाव में वहां से काट दी जाती हैं, जहां उनका कोई वाक्य पूरा हो रहा हो। कई बार खबर का महत्वपूर्ण हिस्सा ही कट जाता है, मूल बात ही कट जाती है। यह असावधानी इसलिए होती है, क्योंकि सम्पादन डेस्क सम्पादन के समय पृष्ठ पर उस खबर के लिए निर्धारित स्थान के अनुरूप बड़ी या छोटी खबर पहले से तैयार करने में विफल रहता है, पेज छोड़ने की जल्दी में फटाफट खबरों को काटना पड़ता है, ऐसे में खबर के साथ
बुरा सलूक होता है। खबरों को यथोचित आकार में पहले ही काटकर या सम्पादित करके तैयार रखना चाहिए। यह नहीं कि लंबी खबर तैयार कर दी है और पृष्ठ तैयार करवाने वाले सम्पादक के कंधे पर भार छोड़ दिया। अकसर पृष्ठ तैयार करने वाला सम्पादक ही खबरों के गलत कटने पर शिकायत सुनता है।
समाधान: यहां सर्वाधिक जिम्मेदारी डेस्क प्रभारी पर है। डेस्क प्रभारी अगर सजग रहे,तो सही या यथोचित आकार में खबर तैयार होती है। जरूरत से ज्यादा न तो किसी खबर को विस्तार मिलता है और न जरूरत से ज्यादा कोई खबर कटकर लगती है। एकाध मौके ही ऐसे आते हैं, जब पेज पर किसी खबर के साथ नाइंसाफी करनी पड़ती है। जिस खबर के कटने का खतरा हो, उस खबर के जरूरी हिस्सों को ऊपर रखना चाहिए। खबरें विलोम पिरामिड शैली में तैयार होनी चाहिए, ताकि नीचे से अगर खबर कटे भी तो अनर्थ न हो। प्रकाशन के लिए भेजने से पहले जैसे खबर की शुरुआत पर निगाह डाली जाती है, ठीक उसी तरह से खबरों के अंत पर भी जरूर निगाह डालनी चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि आखिरी वाक्य सही तरीके से खबर का समापन करे। ऐसा नहीं कि पाठक की जिज्ञासाओं को अधर में छोड़ दे।

शीर्षक का संकट

अच्छे शीर्षक दुर्लभ होते जा रहे हैं। घिसे-पिटे और चालू टाइप के शीर्षकों की भरमार होने लगी है। अच्छे शीर्षकों के लिए आंखें कई बार तरस जाती हैं, दिल मसोसकर रह जाना पड़ता है। शीर्षक लगाना भी एक कला है, जिसमें बहुत कम लोग सिद्ध हो पाते हैं। फिर भी काम लायक शीर्षक लगाना भी एक चुनौती है। शीर्षक निर्माण का भी कहीं प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। अच्छे शीर्षक का मसला पत्रकारों या सम्पादकों की व्यक्तिगत सृजनात्मकता पर छोड़ दिया गया है। अच्छा सम्पादक होगा, तो वह अच्छी शीर्षक लगा देगा, वरना ज्यादातर खबरें अनाकर्षक शीर्षक के साथ ही छपती हैं, जो अंततः समाचार पत्र या पत्रिका को निरस बनाती हैं। दैनिक समाचार पत्रों में शीर्षक की कमियों को एक हद तक माना जा सकता है, लेकिन पत्रिकाओं में शीर्षक की कमजोरी बहुत निराशाजनक कमजोरी है।

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समाधान: कहा जाता है कि समाचार पत्र नहीं बिकते, शीर्षक बिकते हैं। संपादन डेस्क को हर हाल में शीर्षकों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जरूरी नहीं है कि शीर्षक कोई ऐसी चीज है, जो झटके से दिमाग में आ जाए। सबसे बेहतर तरीका यह है कि शीर्षक खबर के अंदर के वाक्यों या जुमलों से निकाला जाए। समाचार के चरम-बिन्दुओं से निकाला जाए। जरूरी नहीं है कि हर खबर पर ताली बजवाने लायक शीर्षक लगे, लेकिन लगभग हर पृष्ठ पर कम से कम एक या दो शीर्षक तो ऐसे होने ही चाहिए, जो बरबस आकर्षित करें, अपनी छाप छोड़ें। प्रथम पृष्ठ पर हर हाल में अच्छे शीर्षकों की भरमार होनी चाहिए। अगर कोई समाचार पत्र अच्छे शीर्षक लगाने में माहिर पत्रकार को विशेष रूप से नौकरी पर रखे, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

शीर्षक लगाने की कला कोई एक दिन में नहीं आती है, इसके लिए अभ्यास की जरूरत पड़ती है। अभ्यास अगर सही तरीके से किया जाए, नकल में कम और अकल पर ज्यादा जोर दिया जाए, तो शीर्षक बनने लगते हैं। लेख या फीचर में तो कमजोर शीर्षक के लिए गुंजाइश नहीं होती है। डेस्क पत्रकारों को आकर्षक शीर्षक की खोज करते हुए बार-बार शीर्षक लिखना चाहिए, दस में से कोई तो शीर्षक पसंद आएगा।

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