भारत की दरिद्रता
भारत में समाचार संस्थान लिखने वालों को उतना पारिश्रमिक नहीं दे पाते हैं, जिनसे लेखक का काम चल जाए। ज्यादातर हिन्दी व भाषायी अखबारों में मानदेय इतना कम है कि अच्छे लेखकों के मान-सम्मान पर चोट पहुंचती है। अखबार कहां से कहां पहुंच गए, लेकिन दो बातें नहीं बदली हैं। एक तो अखबारों की कीमत नहीं बढ़ी है, दूसरी बात, लेखकों का मानदेय नहीं बढ़ा है। विकसित अमेरिका में स्वतंत्र लेखक या स्वतंत्र पत्रकार अच्छा-खासा कमा लेते हैं। इतना कमा लेते हैं कि घर-बार अच्छी तरह से चला लें, चार पहिया वाहन खरीद लें, घर खरीद लें, लेकिन गरीब भारत में लेखक तो सबसे गरीब हैं। कुछ एकाध लेखकों को छोड़ दीजिए, तो अखबार में लिखकर ढंग से जीने वालों की संख्या नगण्य है। प्रकाशन संस्थान लेखकों को इतना भी नहीं देते हैं कि लेखक मानदेय से कुछ ढंग की किताबें खरीद सकें, किसी किताब पर पांच सौ या हजार रुपये खर्च कर सकें। क्या यह दुखद आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत में ज्यादातर प्रकाशन संस्थान लेखकों को मानदेय नहीं देते हैं?
पेशेवर रुख का अभाव लेखक पेशेवर नहीं बन पाए हैं। नियमित लिखना और नया लिखना, दोनों ही मुश्किल है। ज्यादातर लेखक समय या अखबार की जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने मन के हिसाब से चलते हैं। जो मन में आया, लिखा, मन में नहीं आया, तो किसी के कहने पर भी नहीं लिखा। लेख देने का वादा किया, लेकिन ऐन मौके पर मुकर गए, मोबाइल फोन ऑफ कर दिया। लेख पर जितनी मेहनत करनी चाहिए, उतनी नहीं की। मतलब यह कि जरूरत पर खरे नहीं उतर पाए। कभी जरूरत पहाड़ की थी, तो राई को पेश कर दिया। कहा जा सकता है, एक विकसित और संपन्न समाज में ही पेशेवर लोगों की फौज खड़ी होती है। भारत में चूंकि संपूर्ण विकास अभी भी एक सपना है, इसलिए पेशेवर लोग यहां मुश्किल से मिलते हैं। तो लेखों या अखबारों को पेशेवर रुख की बजाय कामचलाऊ रुख वाले लोगों से काम चलाना पड़ता है। जब अखबार के अंदर का समाज ही पूरी तरह से पेशेवर न हो, तो बाहर बैठे किसी स्वतंत्र लेखक से हम पेशेवर होने की उम्मीद अगर करें, तो क्या ज्यादती नहीं है?
प्रशिक्षण का अभाव
प्रशिक्षित लेखकों की कमी है। भारत में ज्यादातर लेखकों को कोई प्रशिक्षण नहीं मिला है। भारत में किसी जमाने में गुरु या उस्ताद रखने की परंपरा हुआ करती थी, लेकिन आज हर दूसरा कलम चलाने वाला खुद को गुरु मान बैठता है। ज्यादातर लेखों में रायता इतना फैला हुआ होता है कि पाठक को भी समेटने में जोर आता है। अपने देश में जो पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान चल रहे हैं, उन्होंने भी बढ़िया लिखने के प्रशिक्षण पर अभी तक ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। जो अच्छे लेखक तैयार हो रहे हैं, वे खुद की योग्यता या मेहनत के बलबूते ही तैयार हो रहे हैं। समाज या हमारी शिक्षा का ढांचा ऐसा बन गया है कि हमें अच्छे लेखकों की जरूरत ही नहीं है। मां-बाप भी बच्चों को अच्छा लिखने के लिए प्रेरित नहीं करते हैं। बस अभिव्यक्ति भर की भाषा लिखनी आ जाए, तो बच्चों या दूसरे लोगों का काम चल जाता है। मौलिक, कारगर, समाज-उपयोगी लेखन को लेकर कोई समूह नहीं है। चूंकि लेखकों का ऐसा कोई समूह नहीं है, कोई संगठन नहीं है, इसलिए सच्चा प्रशिक्षण एक स्वप्न है। दो-चार दिन की कार्यशालाओं के दम पर अच्छे लेखक तैयार नहीं किए जा सकते। पत्रकारिता संस्थानों को इस पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, ताकि अखबारों के लिए अच्छे समाचार, लेख और फीचर लिखने वालों की तादाद बढ़े।








