वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत लिखने वाले के साथ क्या हुआ था?

(राष्ट्रगीत वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। इस गीत की पृष्ठभूमि कैसे तैयार हुई, पढ़िए)

बहुत मजबूरी के दिन थे। भारत में भी अंग्रेजों का यह गीत लोग गाने लगे थे, ‘भगवान हमारे दयालु राजा को बचाएं! / हमारे महान राजा अमर रहें!/ उसे विजयी बनाकर भेजें/ खुश और गौरवशाली/ हम पर लंबे समय तक शासन के लिए/ भगवान राजा को बचाएं।’ गीत में गुलामी का वास था। अंग्रेज इस गीत को पूरी दुनिया में पूरे भक्ति भाव से गाते और गवाते थे। गॉड सेव द किंग…। अंग्रेजों की सेवा में लगे अधिकारियों-कर्मचारियों-सेवकों को भी यह गीत गाना ही पड़ता था।
कोलकाता के पास नैहाती के एक बंगाली परिवार के पिता भी ब्रिटिश राज्य के अधिकारी थे और पुत्र भी पंद्रह साल से सेवा में लगे थे। पढ़ने-लिखने में परिवार खूब तेज था, जैसी बांग्ला, वैसी ही संस्कृत और उससे भी बेहतर अंग्रेजी। नौकरी में रहते हुए ही पुत्र ने अंग्रेजी और बांग्ला में तीन से अधिक उपन्यास रच दिए थे। नौकरी पूरी ईमानदारी से करते थे और उसके बाद साहित्य-संस्कृति के संसार में उतर जाते थे। उस दिन शाम वह दफ्तर से निकले थे और कहारों से कहा था, ‘घर चलो।’ कहारों ने पालकी कंधों पर उठा ली थी और चल पड़े थे कि बाबू साहब को जल्दी घर पहुंचा देना है। अपने-अपने घर पहुंचने की कहारों को भी जल्दी थी। उन्होंने लंबा रास्ता छोड़ा और मैदान वाला रास्ता पकड़ा। बेरहामपुर बैरक के मैदान पर उस दिन अंग्रेज क्रिकेट खेल रहे थे। मैदान के एक किनारे से जब पालकी गुजरने लगी, तब एक अंग्रेज सैन्य अफसर भड़ककर सामने आ खड़ा हुआ। कहार सन्न रह गए। अंग्रेज ने बाबू साहब को पालकी से नीचे खींच उतारा। न काम पूछा न नाम, न कोई सवाल-जवाब। सीधे हाथ उठा दिया।  बाबू साहब जमीन पर थे और अंग्रेज चीख रहा था, ‘तुमने हमारा खेल खराब कर दिया।’ औचक अपमान से बाबू साहब की आंखें भर आईं, उन्होंने बहुत हिम्मत कर नजरों को उठाया, तो कुछ दूर कई अंग्रेज अफसर, जज, भारतीय अधिकारी देख रहे थे। किसी ने कुछ नहीं कहा, अंग्रेज मुक्के बरसाने के बाद भी शांत नहीं हुआ। ऐसी हिमाकत, एक गुलाम काला आदमी ब्रिटिश अधिकारियों का खेल खराब करेगा?
हकबकाए कहार जल्दी-जल्दी पालकी मैदान से बाहर ले गए, पर बाबू साहब का अपमान वहीं सरे-मैदान रह गया। नजर उठाए न उठे, दिल ऐसे बैठने लगा, मानो उससे सारी हसरत ही छीन ली गई हो। दिसंबर का वह दिन ढल गया था, ठंडी रात चढ़ चली थी, पर अपमान का ताप उतरने को तैयार न था। ऐसा लगता था कि शरीर पर अपमान की एक स्याह मोटी परत चढ़ गई हो। पालकी, मैदान, अपमान, लात-घूसे को कैसे भुला दिया जाए? बार-बार वही दृश्य धिक्कारने लगता था। उन्होंने ठान लिया कि इस अपमान को ऐसे ही नहीं जाने देंगे।

दूसरे ही दिन कस्बे में खबर आग की तरह फैल गई, डिप्टी कलेक्टर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अदालत में कर्नल डफिन के खिलाफ मुकदमा ठोक दिया है। अंग्रेजों को लगा था, पहले की तरह ही कोई भी गवाह बनने की हिम्मत नहीं करेगा और मामला रफा-दफा हो जाएगा, पर यहां तो सौभाग्य से कुछ गवाह खड़े हो गए। कर्नल डफिन को सजा तय दिखने लगी। सजा से बचने के लिए वह खुली अदालत में माफी मांगने को तैयार हो गया। बंकिम बाबू भी यही चाहते थे कि दोषी अंग्रेज सबके सामने हाथ जोड़ने के लिए मजबूर हो जाए। यही हुआ।
अपमान एक सम्मान में बदल गया, पर हृदय के कुछ घाव होते हैं, जो मरहम के बावजूद टिसते रह जाते हैं। ऐसे ही घाव ने बंकिम बाबू को प्रेरित किया कि जो उनके साथ हुआ, वह और किसी के साथ न हो। भारतीयों के मन में मान-स्वाभिमान जागे और वे रोजमर्रा के अपमान के विरुद्ध उठ खड़े हों। इस सोच ने एक रोमांटिक उपन्यासकार को राष्ट्र निर्माता में बदल दिया। अपमान और सम्मान के उन्हीं दिनों में साहित्य में राहत की खोज साकार हुई। गुलामी में जकड़ी मातृभूमि के प्रति भक्ति तरल होकर शब्दों में बह चली – सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् सस्य श्यामलाम् मातरम् . .वंदे मातरम् …।
यह गीत रक्त में उबाल लाने वाला मंत्र बन गया। बंगाल में एक आंदोलन बनकर देश भर में फैल गया। जब यह देश स्वाधीन हुआ, तब सबसे पहले यही गीत गाया गया। यह भारतीयों का परम प्रिय आधिकारिक राष्ट्रीय गीत बन गया।
26 जून को जन्मे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (1838-1894) और संत रामकृष्ण परमहंस के बीच बहुत स्नेह था। बताते हैं कि एक बार परमहंस जी ने मजाक में बंकिम बाबू से पूछा था, ‘तुम्हारा नाम बंकिम है, तो तुम्हें किसने झुकाया या टेढ़ा किया।’ तब बंकिम बाबू ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, ‘था एक अंग्रेज और उसके जूते वाली लात थी।’

(हिन्दुस्तान में प्रति सप्ताह रविवार को प्रकाशित होने वाले मेरे वो लम्हा कॉलम से)

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