जोधपुर जफर बिना… जंचै ई कोनी

जफर खान सिंधी को श्रद्धा अर्पित

आजकल कुछ ऐसे लोग गए हैं, जो मेरे अंदर से भी कुछ ऐसा ले गए हैं कि शब्द कम पड़ने लगे हैं। लिखने के लिए कलम की नीब को ठोस होना पड़ता है, पर जब नीब ही पिघलने लगे, तो क्या कैसे लिखा जाए बीते सप्ताह जफर खान सिंधी भी चले गए, चंद शब्दों में कहें, तो वह आवाज के जादूगर थे। अगर कहीं जन्नत होगी, तो वहां पैगंबर, देवता, गंधर्व की ऐसी ही आवाज होगी। मिसाल के लिए, ऐसी ही एक आवाज गायिकी में जगजीत सिंह थे। जफर साहेब को मैंने गाते तो नहीं सुना, पर उनका बोलना किसी गायिकी से कतई कम था।

एक जिंदा आवाज क्या होती है, खुद में एक आजाद वजूद, एक पूरी देह और उसका सुंदर आरोह, अवरोह, घाटियां और वादियां। जफर साहेब की आवाज में वह सबकुछ था, जो एक मुकम्मल आवाज में होना चाहिए। शायद उन्होंने अपनी आवाज के साथ रियाज किया था, जब ऑल इंडिया रेडियो पर उनकी आवाज गूंजती थी, तो मानो झंकृत कर देती थी। क्या मजाल की वह कुछ बोल रहे हों और उनकी आवाज केवल आपके पास से बचती हुई गुजर जाए! उनकी आवाज स्पर्श करती थी, इतनी प्यारी कि अनायास दिल से लिपट जाती थी। लाड़ लगाती आवाज, जैसे हिन्दी बोलते थे, वैसे ही मायड़।

आज जफर नहीं हैं, तो जोधपुर में कुछ घट गया है। वहां मजबूत किले मेहरानगढ़ को अपनी आवाज से अब कौन सहलाएगा, कौन जगाएगा वहां महलों, हवेलियों की भव्यतादिव्यता को?

अब बीते हुए को मैं याद करने से बचने लगा हूं, पर क्या करूं, अभी जोधपुर बहुत याद रहा है। याद है, जोधपुर की एक और शान हरदिल अजीज शाइर शीन काफ निजाम साहेब ने एक बार मुझसे कहा था, अच्छा कवि या शाइर वह है, जो एहसास को लफ्जों में उतार देता है और अच्छा गायक वह है, जो लफ्जों को फिर एहसास में बदल देता है।

तो इस तर्ज पर यह कहा जा सकता है कि जफर अपनी आवाज से लफ्जों को एहसास में बदल देते थे। उनकी तारीफ करने वालों में उनके ही शहर के प्रिय नेता अशोक गहलोत के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे, तो कोई आश्चर्य नहीं। उनकी आवाज ऐसी थी कि कान में भरपूर घुलने के बाद मानो यह सवाल भी करती थी कि सुन रहे हो ना…, ठीक से सुन लो और सब यहीं मत खर्च कर देना, कुछ साथ घर भी ले जाओ।

उनकी आवाज यारबाज थी। आप बेहद सुलझे हुए प्यारे इंसान जफर के प्यार में भले पड़ें, लेकिन उनकी आवाज के मोहपाश से आप बच नहीं सकते।

अब उनके जैसा जोधपुर के पास कौन है?

जोधपुर में कोई भी बड़ा कार्यक्रम होता, तो उनकी आवाज वहां सगुन की तरह मौजूद मिलती थी। पहली बार मैंने भी एक उच्चस्तरीय कार्यक्रम में उन्हें आवाज से ही जाना था।

जोधपुर में उम्मेद भवन पैलेस के बारादरी लॉन में मारवाड़ के हिज हाइनेस पूर्व महाराजा गज सिंहजी की 68वीं यौमे पैदाइश के जश्न का मौका था। जोधपुर शहर और देश के चुनिंदा लोग जुटे थे। मायड़ या मारवाड़ी में बेहद प्यारा बखान चल रहा था। मायड़ भाषा के शब्दों को पहली बार मैंने करीने से लहरातेबलखातेठुमकतेइतराते देखा। वजनदार खनकदार मखमली आवाज बरबस लिपटती चली जा रही थी। आवाज में ऐसा प्राकृतिक डीजे इफेक्ट था कि बारादरी की घास से लेकर उम्मेद भवन की दीवारों तक में कंपन सा महसूस होता था। उनकी आवाज यह एहसास करा देती थी कि शब्द वाकई ब्रह्म होते हैं।

वहीं उनसे पहली मुलाकात हुई। मैं राजस्थान पत्रिका के स्थानीय संपादक के रूप में उनके करीब हुआ। उन्होंने उस राजसी शाम की कुछ तस्वीरें भी फेसबुक पर साझा की थीं, याद है, एक तस्वीर में मैं साफाधारी, साफ सफेद वस्त्र के मुरीद जफर को अभीभूत भाव से देख रहा हूं। सहसा लगा कि यह इंसान मुंबई में होना चाहिए था, लेकिन जोधपुर के साथियों ने मेरा यह भ्रम भी दूर कर दिया। दरअसल, जोधपुर वाले बाहर जाना पसंद नहीं करते, मजाक किया जाता है कि जोधपुर वालों के लिए दुनिया में दो ही शहर हैं, एक टोक्यो और दूसरा जोधपुर। कहा जाता है कि यहां जैसा मिर्ची बड़ा कहीं और नहीं बनाया जा सकता, ठीक उसी तरह से यहां जैसे चतुर्भुज गुलाबजामुन कहीं नहीं बन सकते। मतलब, जोधपुर छोड़ दीजिए, तो फिर कहीं वह मिठास है और वह चटपटापन। तो अठै है, और कठै कोनी।

फिर तो जफर साहेब को जाने कितने टॉक शो में आमंत्रित किया। अनेक मौकों पर मिलना हुआ। जोधपुर में जब पहली बार राजस्थान पत्रिका साहित्य उत्सव की योजना बनी, तब यह पहले से ही तय था कि उद्घाटन सत्र का संचालन तो जफर खान सिंधी ही करेंगे। वह प्यारसम्मान खोजते थे, तो उन्हें बहुत प्यारसम्मान से बुलाया गया। वह बहुत सजधज के साथ आए और दो दिवसीय महोत्सव की बुनियाद को अपनी बुलंद आवाज से पुख्ता कर गए।

एक और अच्छी बात थी कि वह अपनी आवाज का मूल्य समझते थे और उसके सम्मान में कभी कोताही नहीं करते थे। कुछ मौकों पर वह अड़े, तो मेरा मन मंदमंद मुस्कराया, उनके लिए सम्मान और बढ़ा।

एक बार जोधपुर ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन से मेरे इंटरव्यू का सीधा प्रसारण था, वहां पहुंचकर मुझे पता चला कि जफर खुद इंटरव्यू लेंगे। रेडियो स्टेशन के आला अधिकारी साथी रविदत्त मोहता जी भी वहां थे, लेकिन वह मुझे जफर के हवाले कर गए। जफर और मैं अलगअलग कमरे में बैठ गए, जाहिर है, रिकॉर्डिंग साइड पर वह थे। जफर साहेब में छिपा बैठा चतुर पत्रकार जाग गया, सिनेमा, समाज, पत्रकारिता, जोधपुर और जाने कितने सवाल उन्होंने मुझसे किए। प्रसारण के बाद उन्होंने कमरे आकर मेरा हाथ थाम लिया, कहा, मुझे अंदाजा नहीं था, आप पढ़ेलिखे हैं।

मैंने मुस्कराते हुए कहा था, जफर भाई, हमें आदत है, आप खूब रगड़िए, हम चुपचाप निखरनेनिखारने को तैयार हैं।

दुर्भाग्य, उस सीधे प्रसारण को जफर भाई ने रिकॉर्ड नहीं किया, एक बटन दबाना वह भूल गए। उनके सामने मेरी आवाज की कोई औकात नहीं। मेरी आवाज खो जाए। जफर भाई, आपकी आवाज हमेशा रहेगी और उसे हमेशा रहना चाहिए। उसके बिना कुछ अधूरा सा है जोधपुर।

मुझे याद है, आप एक कविता सुनाते थे,

मरद मूंछ बिना, डांगरो पूंछ बिना, ब्राह्मण चोटी बिना, पहलवान लंगोटी बिनाजंचै कोनी।

घर लुगाई बिना, सावण पुरवाई बिना, हिंडो बाग बिना, शिवजी नाग बिनाजंचै कोनी।

और इसी लय में अबक्यों कहा जाए

जोधपुर जफर बिनाजंचै कोनी।

2 thoughts on “जोधपुर जफर बिना… जंचै ई कोनी”

  1. रामलाल डिडेल

    अद्भुत सर।
    जोधपुर से जुड़ी यादों की एक लम्बी फेहरिस्त है आपके पास। यही अमूल्य धरोहर भी है। जोधपुर में आपके चाहने वाले आज भी आपको बहुत याद करते हैं। इस शहर में मुसाफिर बनकर रहने को तो लाखों लोग आते हैं पर अपने व्यवहार और व्यक्तित्व से कुछ लोग स्मृति पटल पर अनूठी छाप छोड़ जाते हैं, उनमें से एक आप हैं। कभी फुर्सत में इस शहर की सुध लेने पधारिए जरूर, यह आज भी आपको बहुत ‘मिस’ करता है।

  2. शानदार सर, आप के साथ बिताया हरेक क्षण मेरे लिए जन्नत से कम नहीं है।

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