ज्ञानेश उपाध्याय
सिनेमा आज एक महा-विधा है, जिसमें कला, विज्ञान और वाणिज्य, तीनों अपनी पूरी व्यापकता के साथ निहित हैं। सिनेमा में जो कला है, उसमें भी अनेक कलाओं का समावेश है। उसके विज्ञान में भी अनेक विज्ञान शामिल हैं और हर सिनेमा में अनेक प्रकार के वाणिज्य भी जुड़े हुए हैं। विशालकाय दुनियादारी की व्यापकता में ही सिनेमा संभव होता है।
सिनेमा मात्र चित्र नहीं है अर्थात मात्र फिल्म नहीं है। सिनेमा मात्र चलचित्र नहीं है अर्थात मात्र ‘मूवी’ नहीं है। सिनेमा में शब्द, संवाद, स्वर और संगीत है। सिनेमा में पद्य अर्थात कविता भी है, कथा या गद्य भी है और नाट्य तो है ही। चित्र जब सिलसिलेवार मिलकर किसी एक भाव या एक स्थिति की अभिव्यक्ति करने लगते हैं, तब चलचित्र संभव होता है, पर जरूरी नहीं कि हर चलचित्र सिनेमा हो।
यह भी ध्यान रहे कि सिनेमा केवल नाट्य नहीं है। सिनेमा वास्तव में नाट्य से बहुत व्यापक है। नाट्य पर ग्रंथ लिखे गए हैं। यह माना जाता है कि भारतीय दार्शनिक भरत मुनि या भरतमुनि ने ईसा पूर्व 200 के आसपास नाट्यशास्त्र की रचना की थी। यहां यह याद रखना चाहिए कि जब नाट्यशास्त्र की रचना हुई, तब शायद सिनेमा की कल्पना नहीं थी। नाट्य था, रसरंजन के लिए नाट्य की आवश्यकता थी, तो नाट्यशास्त्र लिखने की जरूरत महसूस हुई। अब आधुनिक दौर में कला के अनेक पुष्पों को गुलदस्ता हो गया है सिनेमा, तो भारतीय सिनेमा-शास्त्र लिखने की जरूरत महसूस हो रही है, जिसे भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के आधार पर ही मनुष्यता की कला यात्रा को आगे बढ़ाते हुए लिखा जाना चाहिए। पता नहीं कौन लिखेगा? अपने समय में भरतमुनि जितने विस्तार से नाट्यशास्त्र लिख सकते थे, उन्होंने लिखा। उन्होंने किसी भी पहलू को अछूता नहीं छोड़ा। उन्होंने कला पर लिखा और अनेक जगह लिखते-लिखते वैज्ञानिक विवेचना करने लगे, पर उन्होंने नाट्य के व्यापार पर ज्यादा नहीं लिखा।
नाट्यशास्त्र में सिनेमा नहीं है, पर सिनेमा में कुछ मात्रा में नाट्यशास्त्र जरूर है। भरतमुनि का नाट्य संस्कार या व्रत केंद्रित है और आज का सिनेमा विलास केंद्रित। आज जो वाणिज्य को ध्यान में रखकर सिनेमा रचते हैं, उनके लिए भी सिनेमा विलास है और जो मात्र कला के नाम पर रचते हैं, उनके लिए बौद्धिक विलास है।
समाज में आधुनिक सिनेमा अभी अपनी सुस्थापित व्याख्या से काफी दूर है या हम कह सकते हैं कि सिनेमा की व्यापक समझ अभी समाज में सरेआम नहीं हुई है। सिनेमा के व्यापक स्वरूप को देखने के बजाय लोग अपने-अपने कोण से देखते हैं। ज्यादातर लोगों को कहानी चाहिए, कुछ लोगों के लिए कुछ गीत ही पर्याप्त हैं, पर सिनेमा कहानी या गीत भर नहीं है, सिनेमा व्यापक है। सिनेमा के प्रति समझ का ही अभाव है कि आज सिनेमाकार जैसे व्यापक शब्द का प्रयोग नहीं होता है, फिल्मकार नाम से ही काम चलाया जाता है। फिल्ममेकर के बजाय सिनेमामेकर शब्द का इस्तेमाल ज्यादा मुफीद है।
यह मान लेना चाहिए कि हमारे यहां नाट्यशास्त्र विकसित है और सिनेमा विकासशील। यह दुखद है कि आज का सिनेमा वाणिज्य से शुरू होता है और वाणिज्य पर खत्म। उसे कोई-कोई ही कला की दृष्टि से देखता है।
भरतमुनि की याद
नाट्य को भरत मुनि ने जैसी व्यापकता में देखा या नाट्य की गहराई में भरतमुनि जितना गए, उतना कोई वैरागी-मुनि ही जा सकता है। अद्भुत अभिनेता और रंग-निर्देशक रहे होंगे भरतमुनि। कैसे रहे होंगे भरतमुनि? इसे कुछ समझने के लिए हमें एक पुस्तक की शरण में जाना चाहिए। यह पुस्तक ‘रस भाव दर्शन’ अब अनुपलब्ध है। हिंदी सिनेमा के ख्यात अभिनेता सज्जन के प्रयासों से यह पुस्तक प्रकाशित हुई थी। भरतमुनि के नाट्य दर्शन में रचित आठ रसों के भिन्न-भिन्न भावों को अभिनेता सज्जन ने एक-एक कर अपने उर्वर मुखेड़े पर रचा था और वहां से भाव-चित्र फोटोग्राफर ओ पी शर्मा ने अपने कैमरे में उतार लिए थे। उसके बाद रस आधारित चित्रों से सुसज्जित पुस्तक सामने आई – रस भाव दर्शन।
यह पुस्तक देखकर स्पष्ट हो जाता है कि कैसे रहे होंगे भरतमुनि और कैसे उन्होंने भावों व रसों पर आधारित मुख मुद्राओं पर काम किया होगा? यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नाट्य केवल अभिनय नहीं है। अभिनय तो नाट्य का एक विशेष अंग मात्र है, किंतु इस छोटे से अंग या खंड को साकार करते हुए ही सज्जन ने जो रस भाव दर्शन पेश किए, उससे भरतमुनि की विशालता की एक झलक मिल गई।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में 37 अध्याय हैं। नाट्य दर्शन पर अनेक पुस्तकें हैं, जो भरतमुनि के दो अध्यायों पर ज्यादा केंद्रित रहती हैं। व्यापकता में देखें, तो भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर अभी व्यावहारिक ढंग से बहुत काम शेष है? अपने समय के चर्चित चरित्र अभिनेता सज्जन ने व्यावहारिक प्रयास किया था, जिससे पूरे सिनेमा जगत का थोड़ा सा गौरव बचा रह जाता है, अन्यथा हमारा सिने संसार तो भरतमुनि को भुला चुका है। मुंबइया सिनेमा को तो भरतमुनि की कोई जरूरत नहीं है। वहां सफल शास्त्रीय अभिनेता सज्जन एक अपवाद हैं और हमेशा रहेंगे।
कौन थे अभिनेता सज्जन? 
सज्जन अर्थात सज्जनलाल पुरोहित, भारत के एक बेहतरीन अभिनेता थे। वह कबूतरों के चौक, जोधपुर से मुंबई गए थे। सज्जन (जीवनकाल – 1921-2000)। आम सिने दर्शकों को सज्जन ‘जॉनी मेरा नाम’ फिल्म में हेमा मालिनी के पिता और दूरदर्शन पर कभी प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘विक्रम-वेताल’ के वेताल के रूप में याद हैं। करीब 15 फिल्मों में वह अभिनेत्री हेमा मालिनी के पिता बने थे, यह संयोग भी उनकी एक पहचान है। अभिनय की अतुलनीय क्षमता वाले सज्जन ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के आधार पर 8 रसों के 49 भावों को अपने उर्वर चेहरे के सहारे पेश किया था। कहना ही चाहिए कि ऐसी और पुस्तकों की जरूरत है। साथ ही, अभिनय केंद्रित ज्यादा सामग्रियों का प्रकाशन होना चाहिए। विशेष रूप से नाट्यशास्त्र केंद्रित विद्या का प्रचार-प्रसार जरूरी है, इससे समाज में व्यक्तित्व निर्माण को बल मिलेगा। युवा पीढ़ी ज्यादा मुखर होगी और स्वयं को अभिव्यक्त करने में ज्यादा सुविधा होगी। सबसे बड़ी और गर्व की बात यह कि नाट्यशास्त्र एक पुख्ता भारतीय विधा है, जिसमें हर भारतीय को कम या ज्यादा पारंगत होना चाहिए। दब्बू राष्ट्र बनने से बचने के लिए भी नाट्यशास्त्र जरूरी है।
वस्तुत: अभिनय भाव का भ्रष्टाचार होता है, मतलब, आप अंदर से दुखी हैं, लेकिन जब अब मंच पर आएंगे, तो हो सकता है, आपको हंसने का अभिनय करना पड़े। अभिनेता वही सफल है, जो अपनी व्यक्तिगत भावनाओं पर नियंत्रण करके अभिनय करने में सक्षम हो।
यह कोई असत्य बोलने या किसी को ठगने की विधा नहीं है, यह स्वयं को समझने और अपनी भावनाओं को ज्यादा बेहतर ढंग से संभालने और प्रकट करने की विधा है। अत: नाट्यशास्त्र का प्रचार-प्रसार होना चाहिए।
एक छोटा सा प्रयास मैंने जोधपुर में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका का स्थानीय संपादक रहने के दौरान किया था। अभिनेता सज्जन व ‘रस भाव दर्शन’ से प्रेरणा लेकर उनके अपने ही शहर में मैंने नाट्य आधारित एक कॉलम ‘अभिनय दुनिया’ की शुरुआत की थी। साल 2015-16 में प्रकाशित कॉलम में जोधपुर के लगभग सभी दिग्गज अभिनेताओं को अभिनय या नाट्य का जौहर दिखाने और अभिनय के बारे में कुछ बताने का अवसर मिला था। हर बार कॉलम में अभिनेता से नाट्य व नाट्यशास्त्र पर चर्चा होती थी और अभिनेता अपने मुखड़े पर चार रस भाव प्रस्तुत करते थे, जिनका फोटो प्रकाशन कॉलम में होता था। अभिनेताओं में एक अलग ही जुनून था और शहर के आम लोगों को भी नाट्य की थोड़ी-बहुत जानकारी हासिल होने लगी थी। इसी बहाने लोग नाट्यशास्त्र को भी जानने लगे थे। वरना सच यही है कि आम भारत ने अपने नाट्यशास्त्र को लगभग भुला ही दिया है।
(यह लेख कला मर्मज्ञ-साहित्यकार मित्र डॉक्टर राजेश कुमार व्यास के आग्रह पर लिखा गया है )
क्रमश:








