कभी मत भूलिए, अगर आप अपने पहले ही वाक्य से पाठक के दिमाग पर असर नहीं डालते हैं, तो दूसरा वाक्य लिखने की कोई जरूरत नहीं है।
– आर्थर ब्रिसबन
अगर भारत में अच्छे लेखकों का टोटा नहीं है, तो बुरा लिखने वालों की भी गिनती कम नहीं है। अच्छा लिखना तो अलग बात है, पत्रकारों की बिरादरी में अच्छे लेखन की समझ भी दुर्लभ ही कही जाएगी। अच्छे लेखक के सम्मान व मानदेय की बात पर ज्यादा चर्चा से बचा जाता है। यहां तक कि पेशेवर लेखक भी मानदेय और अपने सम्मान के बारे में बात करने में हिचकते हैं, वास्तविकता से मुंह चुराते हैं। हिन्दी अखबारों में जितने लोग छपते हैं, उन पर अगर गौर किया जाए, तो अनुमान के अनुसार, अच्छे पेशेवर हिन्दी लेखकों की संख्या शायद 100 भी नहीं होगी। अखबार अपने-अपने क्षेत्र में लेखक तैयार करने को अपना काम नहीं समझते हैं, उन्हें तो केवल बने-बनाए ऐसे लेखक चाहिए, जिन पर मेहनत करने की जरूरत न पड़े। बहुत कम ऐसे स्वतंत्र पत्रकार होंगे, जो केवल अच्छा लिखकर रोजी-रोटी चला रहे होंगे।
यह सच्चाई है, कई पत्रकारों को ढेर सारा साधारण लेखन भी करना पड़ता है। कई बार \’क्वालिटी\’ पर \’क्वांटिटी\’ मतलब गुणवत्ता पर मात्रा हावी हो जाती है। अच्छा लिखने की क्षमता वाले अनेक पत्रकार कई बार अपने लेख फीचर को ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं और अनजाने में हल्का लिखने लगते हैं। यह अच्छे संस्थान या अच्छे संपादकों की जिम्मेदारी है कि वे पत्रकारों को केवल अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करें, अपना सौ फीसदी देने के लिए प्रेरित करें। आम तौर पर संस्थान और संपादक अच्छा लिखने की क्षमता रखने वालों पर जरूरत से ज्यादा काम डाल देते हैं, इस वजह से भी अच्छे लेखन की मात्रा घट जाती है।
अच्छे और बुरे का फर्क समझना जरूरी है। जबरदस्ती लिखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगर हम संपादकीय पृष्ठ या विशेष पृष्ठों पर छपने वाले लेखों की बात करें, तो ऐसे पृष्ठ के संपादकों को रोज कई लेख प्रकाशन के लिए मिलते हैं, लेकिन दस में से एक या दो लेख ही छापने लायक निकलते हैं।
अलग-अलग लेखक अलग-अलग मकसद से लिख रहे हैं, कुल मिलाकर हिन्दी में स्थिति सराहनीय नहीं है। दक्षिण भारत के अखबारों और अंग्रेजी में हिन्दी की तुलना में कुछ बेहतर स्थिति है। हिन्दी में विगत दस-पंद्रह वर्षों में सुधार हुआ है, लेकिन किसी-किसी अखबार में। जो पत्रिकाएं निकल रही हैं, उनमें स्थिति कुछ ठीक है, लेकिन अखबारों में अभी बहुत काम बाकी है। खैर, अच्छा कैसे लिखा जाए, हम इस पर बात करेंगे और अच्छे लेखन की जरूरतों को समझने की कोशिश करेंगे।
अच्छे लेखन का फार्मूला
अच्छे लेखन के बारे में संस्कृत में ज्यादा बेहतर ढंग से सोचा और कहा गया है। संस्कृत में भाषा पर ज्यादा विचार हुआ है, जबकि हिन्दी एक नई भाषा है और उसका रूप भी बदलता रहा है, इसलिए उसका अपना कोई निश्चित विचार ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता है। आजादी के तुरंत बाद एक ऐसी पीढ़ी हमारे देश में रही, जिसने कहा, \’प्लीज, नो संस्कृत, वी आर सेक्यूलर ।\’ तो जो लाभ हम संस्कृत से ले सकते थे, वो हमने नहीं लिए। संस्कृत आधुनिक भारतीय मानस से अछूती भाषा बन गई। उस संस्कृत को पिछड़ी भाषा मान लिया गया, जिससे हमें भाषा के संस्कार ग्रहण करने थे। जिन भारतीय भाषाओं ने संस्कृत से ज्यादा संस्कार लिए हैं, उनकी स्थिति आज ज्यादा बेहतर है। उनमें कम से कम अच्छे और बुरे का भेद आसानी से किया जा रहा है, लेकिन हिन्दी के अखबारों ने संस्कृत का कोई लाभ नहीं लिया। हालत यह है कि बुरे लेखन के लिए हिन्दी के अखबारों को कोसा जाता है। यह नहीं सोचा जाता कि आखिरी हिन्दी की यह अवस्था क्यों है। आप ज्यादातर हिन्दी के बड़े लेखकों को ले लीजिए, संस्कृत की बजाय उन्होंने अंग्रेजी और पश्चिमी भाषाओं से ज्यादा संस्कार ग्रहण किए हैं। प्रेमचंद जैसे लेखक सम्राट भी संस्कृत से संस्कार नहीं लेते। फारसी के प्रभाव वाले गालिब की शायरी को सबसे ज्यादा रटा जाता है, लेकिन संस्कृत के श्लोक कम ही काम में लिए जाते हैं।
अंग्रेजी में आज भी भारतीय संस्कार नहीं आ पाया है और न कभी आ पाएगा। अंग्रेजी से जानकारी मोल लेकर हमने संस्कृत के ज्ञान को भुला दिया। अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है और हमेशा रहेगी, लेकिन जो हमारे भारतीय ज्ञान, संपर्क, संवाद, उत्थान की भाषा है, उसे सांप्रदायिक ठहराकर हमने गंवाया ज्यादा और पाया कम है।
खैर हम सीधे मुद्दे पर आते हैं। अच्छे लेखन का फार्मूला संस्कृत में है :- उपक्रमोपसंहार अभ्यासोपूर्वता फलम्।
अर्थात
उपक्रम+ उपसंहार +अभ्यास+ अपूर्वता +फल
अर्थात
पूरी तैयारी के साथ शुरुआत कीजिए, कम और जरूरी शब्दों में अपने विषय या अपनी बात को अभिव्यक्त कीजिए, पुनः पुनः सुधारकर बेहतर लिखिए। जो भी लिखिए, उसमें नयापन हो और यह भी कि आपका लेखन फलदायी हो।








