प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया अब 86 वर्ष के हो चुके हैं। उनका जन्म प्रयागराज में हुआ था और अब वह मुंबई में रहते हैं। अभी भी बांसुरी वादन करते हैं और उनकी इच्छा है कि उम्र के सौ साल तक बांसुरी बजाते रहें। बांसुरी बजाते हुए उनका मन अभी नहीं भरा है और उनका उत्साह अभी भी वैसा ही है, जैसा तीस-चालीस साल पहले था। पेश है एक रात ज्ञानेश उपाध्याय से उनकी बातचीत विशेष अंश।
प्रश्न : आप बचपन में जन्माष्टमी कैसे मनाते थे?
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया : बचपन में प्रयागराज में जन्माष्टमी मनाने की स्मृतियां आज भी ताजा हैं। वह हल्दी-पानी से नहाना, खास तरह की खीर का बनना, ढेर सारे पकवान, वह भगवान के जन्म की धूमधाम, पर अब वैसा कहां? जब बांसुरी नहीं बजाता था, तब भी कृष्ण जन्मोत्सव पर बहुत उल्लास में रहता था। ईश्वर की कृपा से मैं अब कृष्ण का वाद्य ही मैं बजाता हूं। सामान्य बांस से संगीत की लहरियां फूटती हैं, तो लोग पहले भी चकित होते थे और आज भी आश्चर्य करते हैं।
प्रश्न : भगवान कृष्ण का वाद्य है बांसुरी, यह भाव क्या आपके मन में हमेशा रहता है?
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया : यह वाद्य विशेष है। भगवान कृष्ण के इस वाद्य में कहीं कोई चमड़ा नहीं है, कहीं कोई तार नहीं है, केवल बांस का एक टुकड़ा भर है, जिसमें पूरे संगीत की संभावना समाई हुई है। जिसे कभी कृष्ण ने बजाया था और उनकी कृपा से मैंने भी बजाया और अब दुनिया बजा रही है। कृष्ण ने ही इस वाद्य को चुना था और संसार को बताया था कि जो बात इस सामान्य से दिखने वाले वाद्य में है, वह किसी अन्य वाद्य में नहीं।
प्रश्न : समय के साथ जन्माष्टमी का रूप बदल रहा है। अब आप कैसे जन्माष्टमी मनाते हैं?
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया : आज मुझे 48 साल हो गए अपने घर, गुरुकुल में बहुत धूमधाम से जन्माष्टमी मनाते हुए। इस दिन लगातार बांसुरी का वादन होता है। मैं भी बजाता हूं और मेरे शिष्य भी लगातार बजाते हैं। मेरे वृंदावन के गुरुकुल में भी और भुवनेश्वर के भी गुरुकुल में लगातार बांसुरी वादन होता है। एक दोपहर को वादन शुरू होता है, तो दूसरे दिन दोपहर तक अनवरत चलता है। भगवान का वाद्य बजाकर उनकी ही पूजा की जाती है। आज भी खूब पकवान बनते हैं, भोग लगता है और सभी को मिलता है। सब खुशी मनाते हैं और इस दिन का साल भर इंतजार करते हैं।
मेरी इच्छा है कि मैं 100 साल तक बांसुरी की सेवा करता रहूं। 86 साल पूरे हो गए, अब 16 साल बचे हैं। भगवान की कृपा रही, तो ये 16 साल पूरे होंगे और तब भी मैं बांसुरी बजाऊंगा। मेरी यही इच्छा होती है कि सोते-जागते कानों में बस बांसुरी की आवाज घुलती रहे।
प्रश्न : श्रीकृष्ण के प्रति क्या आप कोई विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं?
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया : कृष्ण के यहां जो ज्ञान, भक्ति और प्रेम है, उसमें संगीत भी पूरी मधुरता लिए शामिल है। शास्त्रों में लिखा है कि जब वह बजाते थे, तब गोपियां सुध-बुध खो बैठती थीं। कई बार सोचता हूं, श्रीकृष्ण बहुत व्यापक हैं, उन्हें जानने के लिए मेरा एक जन्म काफी नहीं, मुझे कई जन्म लेने पड़ेंगे, बांसुरी से सेवा करनी पड़ेगी, तब मैं कृष्ण तत्व को शायद पूरी तरह समझ पाऊंगा।
बचपन में भी लोग मुझे हरि कहते थे और बाद में बांसुरी बजाने लगा, तो लोगों ने पूछना शुरू कर दिया कि आपका नाम हरि किसने रखा। मुझे लगता है, यह संयोग है या भगवान का आशीर्वाद है कि मुझे बांसुरी के माध्यम से सेवा का अवसर मिला। बांसुरी बजाना केवल वादन नहीं है, यह पूजा है। जब भी इसका वादन होगा, तो कृष्ण को याद किया जाएगा और जब कृष्ण को याद किया जाएगा, तो बांसुरी की भी याद अनायास आएगी। अटूट अद्भुत संबंध है बंशीधर और बांसुरी का।
प्रश्न : दूसरे वाद्य से अगर तुलना करें, तो बांसुरी में और क्या खास है, जो आपको अच्छा लगता है?
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया : कृष्ण का वाद्य बांसुरी एक बहुत सुरक्षित वाद्य है। संसार में कहीं चले जाइए, सुरक्षा की बड़ी चिंता होती है। हर जगह एयरपोर्ट पर पहुंचते ही साजो-सामान की कड़ी जांच शुरू हो जाती है। तबला, सितार इत्यादि वाद्य देखते ही मांग होने लगती है कि खोलकर दिखाओ कि इसके अंदर क्या है, पर बांसुरी के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं। भगवान का यह वाद्य कहीं भी बहुत सुविधा से पहुंच जाता है।
प्रश्न : आप दुनिया भर में जाते हैं और आपको सुना जाता है। दुनिया आज बांसुरी को कैसे देखती है?
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया : विदेश में भी सबसे सुंदर और सुरीले भाव से बांसुरी को देखा जाता है। लगभग पांच दशक पहले मैंने बजाना शुरू किया था, तब से मैंने दुनिया में बांसुरी को खूब विकसित होते देखा है। मेरा तो पूरा जीवन ही बांसुरी के नाम रहा है। सोते-उठते बांसुरी साथ रहती है। शिष्य भी निरंतर बजाते रहते हैं। कानों में बांसुरी की मधुर ध्वनि पड़ती ही रहनी चाहिए।
बांसुरी बजाना योग करने से कम नहीं है, यह भी संयोग या हमारा सौभाग्य ही है कि श्रीकृष्ण दुनिया के श्रेष्ठतम योगी कहे जाते हैं। दुनिया उन्हें आदर्श मानती है, कला क्षेत्र में भी वह आदर्श हैं और भक्ति-ज्ञान के क्षेत्र में भी वह अडिग स्तंभ की तरह हैं। हर युग में वह हमें भटकने से बचाते आ रहे हैं और आगे भी बचाएंगे। मेरा मानना है, श्रीकृष्ण का वाद्य बांसुरी जन-जन तक पहुंचना चाहिए, यह केवल वाद्य या संगीत का अंग ही नहीं है, यह योग से जुड़ी विद्या है। यह हमारे अच्छे स्वास्थ्य और सुकोमल मन से जुड़ी विद्या है।
प्रश्न : क्या आप बांसुरी को भविष्य का वाद्य मान रहे हैं? बांसुरी की जरूरत क्यों है?
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया : आज संसार का कोई भी इंसान हो, कोई अभिनेता हो या नेता हो, सबके हाथों में एक बांसुरी की जरूरत है। किसी के हाथों में बंदूक-तलवार न हो। जब भी मौका मिले, जितना भी समय हो, संगीत की सेवा जरूर हो। संगीत से संसार सही राह पर आ सकता है। आज जगह-जगह संघर्ष हैं, युद्ध हैं, अनाचार है, इनका स्थिर समाधान भी जरूरी है। इसके लिए मन और सांस की आवाजाही को संयमित करना जरूरी है। सबके हाथों में अगर सबसे किफायती वाद्य बांसुरी पहुंच जाए, तो सबका कल्याण संभव है। भगवान कृष्ण भी संसार में शांति और मैत्री चाहते थे, शायद इसलिए उन्होंने बांसुरी को अपने होंठों से लगाया और हम आज भी मंत्रमुग्ध हैं और हमेशा रहेंगे।








