टैगोर के बागबां ने बना दिया गुलजार

(भारत के एक महान गीतकार गुलजार पर लिखे गए वो लम्हा कॉलम से, यह कॉलम हिन्दुस्तान समाचार पत्र में प्रति रविवार प्रकाशित होता है)

अब चार आना मतलब चवन्नी मतलब पच्चीस पैसे का कुछ नहीं आता, पर तब बहुत कुछ आता था। जब यह देश आजाद हुआ था, सत्ताईस पैसे में ही एक लीटर पेट्रोल मिल जाता था। आम लोगों के लिए पच्चीस पैसे बहुत मायने रखते थे और उस लड़के को भी पच्चीस का भाव मालूम था। बंटवारे बाद उसका परिवार झेलम के पास से सब लुटाकर दिल्ली आया था। तब हर जगह से उधड़ी जिंदगियां पैबंद लगाती फिर खड़ी हो रही थीं।

नई जिंदगी तलाशते लोग नए-नए कामों में खुद को लगा रहे थे, पुराने काम पीछे रह गए थे। उस लड़के ने भी तबाही के दर्द और ऊब से निकलने के लिए किताबों से दिल लगा लिया था। किताबें एक छोटे पुस्तकालय से हासिल हो जाती थीं, पाकिस्तान से ही आए एक शौकीन ने खूब पुस्तकें जुटा रखी थीं। पच्चीस पैसे महीना में जितनी चाहो, उतनी किताबें पढ़ने देता था। उस लड़के को जासूसी कहानियों की लत लग गई थी। हर रात एक किताब का सिलसिला था। हर रोज पुस्तकालय पर पढ़ाकू जनाब हाजिर हो जाते थे कि लाओ, नई किताब। पुस्तकालय वाला भी तंग आने लगा था। लोग सप्ताह में एक-दो बार आते हैं, पर यह तो रोज ही टपक जाता है। पढ़ी गई किताबें बढ़ती गईं और न पढ़ी गई किताबें घटती गईं। पुस्तकालय वाले ने परेशान होकर उस लड़के के लिए ऊपर रैक से एक किताब उतारी, शीर्षक था – माली । महाकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की रचना द गार्डनर का उर्दू अनुवाद। पुस्तकालय वाले ने पीछा छुड़ाते हुए कहा, ‘यह ले जाओ, जब तक इसे पूरा नहीं कर लेते, वापस न आना।’

लड़का वह किताब सीने से लगाए लाया और लाते ही उसमें डूब गया। चंद पन्नों ने ही कमाल कर दिया। उस रचना में एक-एक लफ्ज करीने से आ सजे थे, रत्नों की तरह खिल उठे थे। माली कितनी हसरत लिए रानी से गुहार लगा रहा है, ‘मैं अपना दूसरा काम छोड़ दूंगा। मैं अपनी तलवारें और भाले धूल में मिला देता हूं। मुझे दूर के दरबार न भेजो; नई विजय पाने के लिए मेरी बोली न लगाओ। मुझे अपने फूलों के बगीचे का माली बना लो।’ महाकवि की जादुई पंक्तियों ने बांध लिया, ‘मैं तुम्हारे बिस्तर के बगल में जलने वाले दीपक को सुगंधित तेल से भर दूंगा, और तुम्हारे चरणों की चौकी को चंदन और केसर के लेप से अद्भुत डिजाइनों में सजा दूंगा। …मुझे अपने बगीचे का माली बना लो।’ वाह, क्या कविता है या कथा है, जहां ‘दो जोड़ी उत्सुक आंखें अपनी चुप्पी तोड़ने और बोलने के लिए संगीत की भीख मांगती हैं। …शाम का तारा गायब हो जाता है। शांति की चिता की चमक धीरे-धीरे खामोश नदी किनारे मर जाती है। घिसे-पिटे चांद की रोशनी में सुनसान घर के आंगन से गीदड़ कोरस में रोते हैं। …अगर कोई आवारा, घर छोड़कर, रात देखने के लिए यहां आए और सिर झुकाकर अंधेरे की बड़बड़ाहट को सुने, तो कौन है, जो उसके कानों में जीवन रहस्य फुसफुसाए…। कुछ लोगों के पास मुस्कान, प्यारी और सरल होती है, और कुछ की आंखों में चालाकी भरी चमक होती है। कुछ के आंसू दिन के उजाले में उठते हैं, और दूसरे के आंसू अंधेरे में छिपे रहते हैं।’

महाकवि टैगोर के माली  ने उस लड़के को अलग ही दुनिया में ला खड़ा किया। साहित्य ऐसा भी होता है, गर्मजोशी भरा, सांस लेता, प्यार से सहलाता, बतियाता। उस किताब को पढ़ते हुए मन ही नहीं भरता था, हर बार कुछ नया दिख जाता था, मानो वह किताब सिर्फ एक खिड़की भर हो और उसके अंदर-बाहर की दुनिया हरपल सजीव, सक्रिय हो, जब देखो, नई दिखे।

महाकवि के माली  या बागबां  ने संपूर्ण सिंह कालरा नाम के उस लड़के को गुलजार बना दिया। उस किताब से ऐसी मोहब्बत हुई कि गुलजार ने उसे कभी नहीं लौटाया। खूब पढ़ते रहे, आगे बढ़ते रहे। बाद में पुस्तकालय वाले ने भी पूछना छोड़ दिया। गुलजार सहर्ष स्वीकार करते हैं कि ‘रवींद्रनाथ टैगोर ने मुझे चोर बना दिया।’ काव्य का ऐसा रस चखाया कि लिखने-पढ़ने की पूरी आदत बदल गई। माली को उसकी मूल भाषा में पढ़ने के लिए पंजाबी गुलजार ने बांगला सीखी। उनके गुरु बिमल राय, दोस्त आर डी बर्मन से लेकर पत्नी राखी तक, बंगालियों की संगत में वह खूब रमे। गुलजार को आज कौन नहीं जानता। 7 मई को जब टैगोर की जयंती मनाई जाती है, तो गुलजार भी याद आते हैं। उनके साहित्य में जो मिठी नदी बहती है, वह आज भी टैगोर के यहां से निर्मल बहती आती है।

टैगोर से हासिल मिठास को गुलजार ने किस खूबसूरती से बयान किया है, देखिए, ‘…धूप चढ़ी और सूरज की गर्मी पहुंची, तो गुड़ की भेली बहने लगी, मासूम देहाती हैरान था माथे से मीठे-मीठे कतरे गिरते थे और वह जीभ से चाट रहा था। मैं देहाती मेरे सर पर ये टैगोर की कविता भेली किसने रख दी?’

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