गांधी जी के चार पुत्रों का जीवन कैसा रहा?

बापू का जीवन एक तरह से प्रयोग था, इसमें उन्हें बड़ी सफलताएं मिलीं, तो कुछ अफसोस भी रह गए। विशेष रूप से उन्होंने अपने परिवार को जिस तरह से आगे बढ़ाया, उसे लेकर स्वयं उनके पुत्रों में असंतोष रहा। किसी भी पुत्र को औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं हुई और उनके लिए घर में ही पढ़ने की व्यवस्था की जाती थी। गांधी जी की छतरी इतनी विशाल थी कि उसके नीचे से उनके केवल एक पुत्र सबसे छोटे देवदास गांधी ही ठीक से निकल पाए। हां, इतना तय है कि बापू ने अपने किसी भी पुत्र को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं किया। परिवार और पुत्रों को उनके अपने हाल पर छोड़ दिया और स्वयं राजनीतिक जीवन में आगे बढ़ते चले गए। राष्ट्रसेवा की यह कीमत न केवल गांधी जी ने चुकाई, उनके पुत्रों को भी बहुत संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ा। पुत्रों ने कैसा जीवन बिताया और उनके परिवार कैसे आगे बढ़े? आइए, गांधी जी के चार पुत्रों के बारे में कुछ जानते हैं।

हरिलाल गांधी
(1888-1948)

मोहनदास करमचंद गांधी जी के सबसे बड़े पुत्र हरिलाल जी इंग्लैण्ड से वकालत करना चाहते थे, लेकिन पिता ने कड़ा विरोध जताया। पिता मानते थे कि अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा से भारतीय आंदोलन में कोई खास मदद नहीं मिलेगी। पिता के फैसलों से परेशान हरिलाल जी विद्रोही हो गए। 23 की उम्र में हरिलाल ने पिता का साथ और घर छोड़ दिया। और तो और, पिता को परेशान करने के लिए इस्लाम धर्म कबूल कर लिया। पिता को दुखी करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया। हालांकि, दूसरे नेताओं के समझाने पर वह बाद में हिन्दू धर्म में लौट आए।

इनका विवाह 18 की आयु में गुलाब वोहरा जी से हुआ था। साल 1918 में पत्नी की मृत्यु के बाद पिता से उनके सम्बंधों में खींचतान ज्यादा बढ़ गई थी। गांधी जी के बड़े पुत्र ज्यादातर भटकते ही रहे और उपेक्षा के शिकार हुए। कुल मिलाकर, इनका जीवन अच्छा नहीं बीता। गांधी जी की हत्या के चार महीने बाद ही लीवर की बीमारी से पीड़ित हरिलाल जी 18 जून 1948 को स्वर्ग सिधार गए। हरिलाल जी के जीवन पर ‘गांधी माई फादर’ नाम की फिल्म भी बनी है।  हरिलाल जी के दो पुत्र और दो पुत्रियां हुईं, जिनमें से तीन के परिवार आगे चल रहे हैं।

मणिलाल गांधी
(1892-1956)

मणिलाल गांधी ने अपने जीवनकाल में मुख्यतौर पर प्रेस का काम किया। पिता गांधी तो साल 2015 में भारत लौट आए, लेकिन मणिलाल दक्षिण अफ्रीका में ही रह गए। उन्होंने वहां गांधी आश्रम फिनिक्स फार्म को किसी तरह से संभाले रखा। चरित्र के मामले में गांधी जी उनसे खुश नहीं रहते थे। बताया जाता है कि पिता के भारत लौटने के बाद ही मणिलाल जी को आजादी मिली। बाद में मणिलाल जी पिता से मिलने भारत आए थे और अपने तीखे उलाहनों से उन्हें परेशान भी किया था। वह अपनी तमाम विफलताओं के लिए पिता को ही जिम्मेदार ठहराने में कोई संकोच नहीं करते थे।

इन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही ‘इंडियन ओपिनियन’ अंग्रेजी-गुजराती पत्रिका में वर्ष 1917 से काम शुरू किया। 1920 में इस पत्रिका के संपादक बने और साल 1956, मृत्यु पर्यंत इस पद पर रहे। साल 1927 में सुशीला मशरूवाला से उनकी शादी हुई थी, जिनका निधन 1988 में हुआ। इनके दो बेटियों और एक बेटे का परिवार आगे चल रहा है।

रामदास गांधी
(1896-1969)

गांधी जी के तीसरे पुत्र रामदास जी पिता के सच्चे भक्त थे। उन्होंने कभी भी पिता को नाराज करने वाले काम नहीं किए। उन्होंने पिता के अनुशासन में रहकर जीवन बिताया। गांधी जी रामदास जी को अपना सबसे अच्छा बेटा कहा करते थे। रामदास ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया, इस दौरान कई बार जेल भी गए। जिसके फलस्वरूप इनके स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ा।

इनकी शादी 1927 में गांधी जी की मर्जी से साबरमती आश्रम की सदस्या निर्मला से हुई थी। निर्मला को आश्रम में नीमू बहन के नाम से जाना जाता था। अपने पति की मृत्यु के बाद नीमू बहन ने साबरमती आश्रम में ही अपना जीवन बिताया। खास बात यह थी कि रामदास अपने तीनों भाइयों से ज्यादा दिन तक जीवित भी रहे। यह भी ध्यान देने की बात है कि इन्होंने ही अपने पिता को मुखाग्नि दी थी। इनकी दो बेटियों और एक बेटे का परिवार चल रहा है।

देवदास गांधी
(1900-1957)

देवदास गांधी का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ था और अपने यौवनकाल में भारत आए थे। गांधी जी के बेटों में ये सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे और लोकाचार में सबसे ज्यादा कुशल थे। भारतीय समाज में इनका दायरा गांधी जी के पुत्रों में सबसे ज्यादा था। स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदार रहे और जेल भी गए।

इन्होंने 1933 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पुत्री लक्ष्मी से प्रेम विवाह किया। इस विवाह का विरोध न केवल राजगोपालाचारी, बल्कि गांधी जी ने भी किया था। देवदास गांधी अपने समय के प्रतिष्ठित पत्रकार थे, हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक भी हुए। पिता के ब्रह्मचर्य सम्बंधी प्रयोगों का इन्होंने हमेशा विरोध किया, पिता की विराट छवि को लेकर सदा सजग रहे। अपने जीवन पर्यंत लगातार प्रयास में रहे कि पिता को लेकर किसी तरह का अप्रिय विवाद न खड़ा हो। इनकी एक बेटी और तीन बेटों का परिवार आगे चल रहा है।

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